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प्राचीन काल में हम जिसे आर्यत्व की उच्चतम साधना के नाम से जानते थे वही आधुनिक सन्दर्भ में हिन्दुत्व है। हिन्दू की जीवन शैली का नाम हिंदुत्व है, और भारत की प्राचीन जीवन शैली का नाम आर्यत्व है। हिंदुत्व को वर्तमान समय में हमारे न्यायालय और अनेकों विद्वानों ने भारत की चेतना के सबसे अधिक निकट माना है। यदि इसे ऐसे भी कहा जाए कि भारत की चेतना और हिंदुत्व दोनों का अन्योन्याश्रित संबंध है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सृष्टि के प्रारंभ में वेद हमारी चेतना की के मूल स्रोत के रूप में प्रस्फुटित हुए । ईश्वरीय वाणी वेद किसी देश या किसी देश के लोगों के लिए नहीं बनाए गए थे, बल्कि वे सारे संसार के भले के लिए बनाए गए थे। जब तक वेदों की यह शुद्ध और कल्याणकारी परंपरा संसार में काम करती रही तब तक वेद संसार के संविधान के रूप में कार्य करते रहे और उन्हीं के अनुसार सारे संसार की जीवन चर्या चलती रही। उस समय संपूर्ण भूमण्डल आर्यों की वैदिक संस्कृति के अधीन रहकर एकमत होकर कार्य करता था । वास्तव में इसी काल को भारत और संसार का वैदिक काल कहा जा सकता है। इस विषय में हमें उस भ्रांत धारणा से बाहर निकलना चाहिए जो भारत के इतिहास के सन्दर्भ में हम पर थोप दी गई है कि एक समय विशेष पर जब वेदों की रचना हुई तो उस काल को वैदिक काल माना जाना चाहिए । वास्तव में वैदिक काल उसे माना जाना चाहिए जिस काल में वेदों की व्यवस्था के अनुसार समस्त भूमण्डल शासित और अनुशासित हो रहा था। भारत के विश्वगुरु होने का यही काल था। भारत की मूल चेतना में आज भी भारत भक्त लोगों के हृदय में विश्वगुरु बनने का विचार बार-बार आता है। इस विचार को वैदिक संस्कृति द्वारा प्रदत्त भारत का मौलिक संस्कार माना जाना चाहिए।
वेदों ने हमारी संस्कृति को विश्व संस्कृति बनाने में सहयोग प्रदान किया। वैदिक संस्कृति के कारण सारे संसार में सर्वत्र शांति व्यवस्था बनी रही। वेदों की आदर्श जीवन शैली और उनके गूढ़ ज्ञान को उपनिषदों के ऋषियों ने भी अपनाया । उन्होंने भारत की इतिहास परंपरा में उपनिषदों के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया । वेदों के विद्वान ऋषियों ने उपनिषदों के माध्यम से कई कहानियों के द्वारा बहुत गूढ़ विषयों को लेकर लोगों को बड़ी बातों को सरल ढंग से समझाने का अनुपम कार्य किया।
यही कारण रहा कि पश्चिम के विद्वानों ने भी उपनिषदों के विषय में खुलकर प्रशंसा की। कितने ही विद्वानों को भारत के उपनिषदों ने बड़ी गहराई से प्रभावित किया। यहाँ तक कि क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब के भाई दारा पर भी उपनिषदों का गहरा प्रभाव था । उसने उपनिषदों का अरबी फारसी में अनुवाद भी करवाया था । कई विद्वानों ने पश्चिम से आकर उपनिषदों का गहन अध्ययन किया और अपने जीवन को धन्य किया।
हमारे ऋषियों और पूर्वजों की जीवन शैली के बारे में मैथिलीशरण गुप्त जी की इन पंक्तियों पर हमें विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए :-

वे सजग रहते थे सदा दुःखपूर्ण तृष्णा भ्रांति से,
जीवन बिताते थे सदा संतोष पूर्वक शांति से।।
इस लोक में उस लोक से वे अल्पसुख पाते न थे हंसते हुए आते न थे रोते हुए जाते न थे।।

भारत के लोगों की आदर्श जीवन शैली और चिंतन शैली से प्रभावित होकर वेबर ने लिखा है कि :- ”भारतीय उपनिषद ईश्वरीय ज्ञान के महानतम ग्रंथ हैं, इनसे सच्ची आत्मिक शांति प्राप्त होती है। विश्व साहित्य की ये अमूल्य धरोहर हैं।”
वेद संसार के सारे ज्ञान का स्रोत हैं, इसलिए वेदों को अखिल ज्ञान का मूल कहा जाता है। हमने वेदों के मंत्रों के माध्यम से ऊर्जा की साधना की है। जिसे संसार ने आज तक भी यथार्थ अर्थों में समझने का प्रयास नहीं किया। हमारे ऋषि पूर्वजों के द्वारा ऊर्जा की साधना करने के कारण ही भारत ने प्राचीन काल में ऐसे अनेकों वैज्ञानिक आविष्कार किए, जिन्हें आज का विज्ञान समझ ही नहीं पा रहा है । उनकी दृष्टि में मनुष्य आज भी विकासवाद के माध्यम से यहाँ तक पहुंचा है ।यही कारण है कि वह बंदर या किसी अन्य प्राणी से विकसित होते – होते मनुष्य के आधुनिक स्वरूप को जानते पहचानते हैं। इस संदर्भ में हमें भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ सत्यपाल सिंह द्वारा कही हुई यह वैज्ञानिक बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम बंदरों की नहीं बल्कि ऋषियों की संतानें हैं। हमने डॉक्टर सतपाल सिंह को यहाँ पर इसलिए उद्धृत किया है कि भारत की राजनीति में वैज्ञानिक सोच रखने वाले बहुत कम राजनीतिज्ञ हैं ,जो उन जैसा साहस करके संसार की विचारधारा के विपरीत जाकर वैज्ञानिक सत्यमत को प्रकट करने का साहस रख सकते हैं।
‘सत्यमेव जयते’ की परंपरा को लेकर हमने संसार को विज्ञान के इस सत्य से अवगत कराया कि यदि असत्य झूठ या मिथ्याचार को अपनाओगे तो संसार में कभी भी शांति प्राप्त नहीं कर पाओगे। ‘सत्यमेव जयते’ के साथ-साथ हमने ही संसार को यह बताया कि जहां धर्म है अर्थात नैतिकता ,न्याय और एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने का भाव है, वहीं जय होती है। संस्कृत भाषा हमारे लिए ही नहीं बल्कि सारे संसार के लिए इसीलिए वंदनीय और सम्मान के योग्य है कि इसके वैज्ञानिक चिंतन ने संसार को बहुत कुछ दिया है। इसी भाषा को संसार की सभी भाषाओं की जननी कहा जाता है। यह हमारा परम सौभाग्य है कि हम भारत के आर्यजन आज भी संस्कृत भाषा के प्रति सम्मान रखते हैं । हमारे यज्ञ यागादि संस्कृत वेदमंत्रों के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। हमारे कितने ही संस्थानों, मंत्रालयों व संगठनों के आदर्श ध्येय वाक्य भी संस्कृत मूलक हैं।
संस्कृत के उच्च चिंतन ने ही हम भारतीयों के पूर्वजों को एकात्म मानववाद और भारतीय राष्ट्रवाद की अनुपम विचारधारा से प्रेरित कराया। इसी चिंतन के माध्यम से आज के संसार में शांति स्थापित की जा सकती है । ऐसा विश्व के अनेकों विद्वानों का भी मत है कि भारत की वैदिक संस्कृति में ही विश्व शांति के बीज निहित हैं। उपनिषदों की शिक्षाएं हमें वेद की विश्व शांति की ओर तो संकेत करती ही हैं साथ ही मानव के भीतर लगी आग को भी शांत करने की पर्याप्त क्षमता रखती हैं।
भारत के सोलह संस्कार देवत्वीकरण और समाजीकरण की पवित्रतम प्रक्रिया का पाठ पढ़ाने का काम करते हैं। सोलह संस्कारों को अपनाकर संसार के लोग सही दिशा और सही सोच पर आगे बढ़ सकते हैं। आज के विश्व समाज के लिए सबसे बड़ा संकट इसी बात का है कि उसके चिंतन से देवत्वीकरण और समाजीकरण की पवित्रतम प्रक्रिया का लोप हो गया है। भारत ने 16 संस्कारों को अपना कर अपने जीवन को पवित्रतम अवस्था तक ऊंचा उठाया ।इस प्रकार भारत के 16 संस्कारों का चिंतन भी हिंदुत्व की चेतना का एक स्वर है।
16 संस्कार भारत की चेतना के आवश्यक तत्व हैं। इनके बिना भी भारतीय संस्कृति की संरचना हो पाना असंभव है । भारतीय ऋषियों ने चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष मनुष्य जीवन की सफलता और सार्थकता के लिए निर्धारित किए हैं।
यदि हम राजनीति की ओर जाएं तो वहाँ पर भी हमारे ऋषियों ने राष्ट्रनीति, राष्ट्रधर्म और राष्ट्रनायक का अद्भुत समन्वय स्थापित किया। इसी को हम आज राजा, राजनीति और राजधर्म के नाम से जानते हैं। इनकी कैसी स्थिति होनी चाहिए? क्या इनका धर्म होना चाहिए? – इस पर भी हमारे ऋषियों का चिंतन विश्व के अन्य सभी विद्वानों की अपेक्षा उत्कृष्ट है।
भगवदगीता में जिस प्रकार श्री कृष्ण जी ने निष्काम कर्म का उपदेश दिया है वह भी सारे संसार के लिए कौतूहल का विषय है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि संसार के लोग आज भी गीता के निष्काम कर्म को समझ नहीं पाए हैं। जबकि श्री कृष्ण जी के इस अद्भुत संदेश को ग्रहण कर भारतवर्ष में लाखों-करोड़ों लोगों ने अपने जीवन का उद्धार करने में सफलता प्राप्त की है। इस प्रकार भगवदगीता का निष्काम कर्म संदेश भी हम भारतीयों के लिए गर्व और गौरव का विषय है ।
भारत की शास्त्रार्थ परंपरा भी भारत की उस अद्भुत और अलौकिक परंपरा की ओर संकेत करती है जिसके द्वारा भारत के महान लोग सत्यार्थ के लिए शास्त्रार्थ किया करते थे । सत्य को स्वीकार करना और असत्य को छोड़ देना भारत का प्राचीन मौलिक संस्कार रहा है। इसी को यदि भारत के नागरिकों का मौलिक अधिकार और साथ ही साथ मौलिक कर्तव्य भी स्वीकार किया जाए तो बहुत अच्छी बात होगी। हमारा मानना है कि इसे इस रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए । आज देश में हम सत्यार्थ के लिए शास्त्रार्थ होते नहीं देखते अपितु सत्यार्थ के लिए लड़ाई झगड़े होते देखते हैं । जिससे सर्वत्र अशांति ही अशांति दिखाई देती है। सत्यार्थ के लिए शास्त्रार्थ आर्य परंपरा है, जबकि सत्यार्थ के लिए संघर्ष व लड़ाई झगड़े करना राक्षसी परंपरा है।
हम भारत के लोगों ने पश्चिम के विद्वानों की भांति जीवन को एक संघर्ष नहीं माना है। इसके विपरीत हम भारत के लोगों ने जीवन को एक उत्सव के रूप में देखा है। उत्सव का अर्थ है कि प्रत्येक परिस्थिति में आपको निराश नहीं होना है । आशावादी बने रहना है और आशावादी बने रहकर जीवन की समस्याओं का समाधान ढूंढते रहना ही जीवन को एक उत्सव के रूप में मनाना है । जीवन के उतार-चढ़ाव को सबके रंगों के साथ मनाते रहने की भारत की अद्भुत परंपरा को संसार के लोग न तो समझ पाए हैं और न समझ सकेंगे। यद्यपि भारत के लोगों ने अपने राष्ट्र के मूल्यों का सम्मान करना प्राचीन काल में ही सीख लिया था। आज भी हमारे लिए यह बहुत ही उचित होगा कि हम हिंदुत्व के या वैदिक संस्कृति की चेतना के मूल स्वरों को समझें और उसके अनुसार अपना जीवन बनाएं- आज के परिवेश में हमारे लिए यह भी बहुत अधिक विचारणीय हो गया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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