स्टार्टअप की दृष्टि से भारत बन गया है दुनिया का तीसरा देश

केंद्र सरकार द्वारा बनायी गयी सरकारी नीतियों के चलते ही स्टार्ट-अप कम्पनियों को भारत में अपना व्यवसाय प्रारम्भ करने में आसानी हो रही है। ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के विभिन्न मदों में हुए सुधार के चलते भी स्टार्ट-अप कम्पनियों की बहुत मदद हो रही है।

भारत के लिए यह दशक भारतीय स्टार्ट-अप कम्पनियों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (एमएनसी) में परिवर्तित करने का है। भारत में पिछले कैलेंडर वर्ष 2020 में 11 स्टार्ट-अप कम्पनियां, यूनीकॉर्न कम्पनियों में परिवर्तित हुई हैं। यूनिकॉर्न कम्पनी उस स्टार्टअप कम्पनी को कहा जाता है जिसका बाज़ार मूल्यांकन 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का हो गया हो। भारत में इन कम्पनियों में निवेश तेज़ रफ़्तार से बढ़ा है। ये स्टार्ट-अप कम्पनियां अभी तक भारत के बाज़ार पर अधिक ध्यान देकर चल रही हैं परंतु इन्हें अब भारत के बाहर भी पैर फैलाने चाहिए और अपने आप को बहुराष्ट्रीय कम्पनी में परिवर्तित करना चाहिए। भारतीय कम्पनियां विदेशी बाज़ारों में अपना स्थान बनायें, इससे भारतीय ब्राण्ड विकसित होगा इसलिए इन कम्पनियों के लिए अपने उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का रखना अब बहुत ज़रूरी हो गया है। भारत में स्टार्ट-अप कम्पनियां अब केवल भारतीय बाज़ार के लिए नहीं बल्कि वैश्विक वैल्यू चैन को भी ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। अभी हाल ही के समय में भारतीय कम्पनियां विदेशों में भी कई कम्पनियों को ख़रीद रही हैं, विशेष रूप से दवा एवं सूचना प्रौदयोगिकी के क्षेत्र में।

केंद्र सरकार द्वारा बनायी गयी सरकारी नीतियों के चलते ही स्टार्ट-अप कम्पनियों को भारत में अपना व्यवसाय प्रारम्भ करने में आसानी हो रही है। ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस के विभिन्न मदों में हुए सुधार के चलते भी स्टार्ट-अप कम्पनियों की बहुत मदद हो रही है एवं इसके कारण विदेशी निवेश के साथ-साथ अब भारतीय कम्पनियां भी इन स्टार्ट-अप में निवेश करने लगी हैं। आज भारत, स्टार्ट-अप की दृष्टि से, दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। इस क्षेत्र में अब विदेशी निवेश भी तेज़ी से बढ़ रहा है। इससे अन्य देशों का भारतीय बाज़ार पर विश्वास झलकता है।

वर्ष 2020 में तो कोरोना वायरस की महामारी के चलते भी भारत में 1200 सौदों के माध्यम से स्टार्ट-अप कम्पनियों में 1014 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ है। हालांकि यह निवेश वर्ष 2019 में हुए 1450 करोड़ अमेरिकी डॉलर से कम है परंतु सौदों की संख्या में वर्ष 2020 के दौरान 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। भारत आज 130 करोड़ से अधिक की जनसंख्या एवं तेज़ गति से आगे बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था के सहारे काफ़ी अधिक संख्या में स्टार्ट-अप कम्पनियों को आकर्षित कर रहा है।

1 मार्च 2020 को भारत में 28,979 स्टार्ट अप में 3.37 लाख लोग कार्यरत थे। भारत की 50 प्रतिशत आबादी 27 वर्ष के नीचे है अतः भारत एक युवा देश है जिसका पूरा पूरा फ़ायदा भारत को नए स्टार्ट-अप के रूप में मिल रहा है। अब इन नए नए क्षेत्रों में प्रारम्भ हो रहे स्टार्ट अप के चलते भारत विश्व में होने वाली नई औद्योगिक क्रांति में अपनी विशेष भूमिका निभा सकता है। न केवल विदेशी निवेश बढ़ रहा है बल्कि नवोन्मेष भी हो रहा है। मेक इन इंडिया भी स्टार्ट अप के विकास में महती भूमिका निभा रहा है।

भारत में तेज़ी से आगे बढ़ रहे स्टार्ट-अप में शामिल हैं, फ्लिपकार्ट (वर्ष 2007 में स्थापित, 25000 से अधिक रोज़गार के अवसर एवं वर्ष 2019 में 43,615 करोड़ रुपए की आय), पेटीएम (वर्ष 2010 में स्थापित, 9000 से अधिक रोज़गार के अवसर एवं वर्ष 2019 में 3,579 करोड़ रुपए की आय), ओयो (वर्ष 2013 में स्थापित), ओला (वर्ष 2010 में स्थापित) पॉलिसी बाज़ार (वर्ष 2008 में स्थापित), स्विगी (वर्ष 2014 में स्थापित), ज़ोमेटो (वर्ष 2008 में स्थापित) एवं रिविगो (वर्ष 2014 में स्थापित), आदि।

भारत में वर्ष 2020 के दौरान स्टार्ट-अप के क्षेत्र में हुए कुल निवेश का 90 प्रतिशत हिस्सा बैंगलोर, दिल्ली एवं मुम्बई में स्थापित किए गए स्टार्ट-अप कम्पनियों में हुआ है। जबकि आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में टायर-2 एवं टायर-3 शहरों में भी स्टार्ट-अप कम्पनियां प्रारम्भ की जायें क्योंकि देश में टैलेंट की कोई कमी नहीं है परंतु इन छोटे-छोटे शहरों में बस रहे टैलेंट पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है।

वर्ष 2020 के दौरान स्टार्ट-अप कम्पनियों में सबसे अधिक निवेश ई-कामर्स क्षेत्र के स्टार्ट-अप कम्पनियों में हुआ है। द्वितीय स्थान पर वित्तीय तकनीक से सम्बंधित स्टार्ट-अप कम्पनियां एवं तृतीय स्थान पर एड तकनीक से सम्बंधित स्टार्ट-अप कम्पनियां रही हैं। आज जबकि आवश्यकता इस बात की है कि कृषि क्षेत्र, टूरिज़म, लॉजिस्टिक, ट्रांसपोर्ट, ट्रैवल, शिक्षा आदि क्षेत्रों में अधिक से अधिक स्टार्ट-अप प्रारम्भ होने चाहिए क्योंकि इन क्षेत्रों में रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।

यूनिकॉर्न कम्पनियों के व्यवसाय करने की सारी व्यवस्था पर हमारे देश में अभी भी ध्यान देने की बहुत ज़रूरत है। यूनिकॉर्न कम्पनियों की ओर यदि देखा जाये तो पता चलता है कि ये निजी निवेश अथवा विदेशी निवेश के दम पर ही आगे बढ़ रहे हैं कोई भारतीय बैंक अथवा देशी निवेश इनकी सहायता में बहुत कम ही आगे आ पा रहे हैं। इस तरह की कमियों को दुरुस्त करने की आज आवश्यकता है। करों की दर भी तुलनात्मक रूप से भारत में अधिक है इसलिए ये कम्पनियां बनती तो भारत में हैं लेकिन अपने आप को रजिस्टर विदेशों में, विशेष रूप से सिंगापुर में, कराती हैं। हमारे देश में न्याय व्यवस्था में भी सुधार करने की बहुत ज़रूरत है। एक बार कोई केस कोर्ट में जाता है तो इसके निपटान में बहुत समय लगता है, यह बात विशेष रूप से विदेशी निवेशकों को बहुत अखरती है। अतः देश में न्यायिक प्रक्रिया को सरल बनाए जाने की भी अत्यधिक आवश्यकता है।

प्रहलाद सबनानी

प्रहलाद सबनानी

लेखक भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवर्त उप-महाप्रबंधक हैं।

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