लाल किले का ही नहीं देश का भी चौकीदार

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गणतंत्र दिवस पर हुई राष्ट्र विरोधी घटना से आहत भारत भक्तों का ह्रदय द्रवित और आक्रोशित हो उठा है। राष्ट्रीय पर्व पर राष्ट्रीय शौर्य के भव्य प्रदर्शन से विश्व को भारत की शक्ति के परिचय के स्थान पर उग्रवादियों का अनेक स्थानों पर हुए हिंसात्मक प्रदर्शन ने हमारी गणतंत्र की परम्परा को कलंकित किया है।आज करोड़ों देशवासी सोचने को विवश है कि “मैं भी चौकीदार” क्यों न बनू।

क्या हजारों की संख्या में कील,गडांसे,फरसे आदि लगे डंडे,लोहे की रॉड व तलवार आदि लेकर आने वाले किसान थे? क्या बैरोकेडिंग, डिवाइडर, रैलिंग व बसें तोड़ कर दिल्ली में ट्रैक्टरों पर बैठकर कानून तोड़ कर घुसने वाले किसानों को उपद्रवी कहना अनुचित होगा? कानूनों का पालन करने वाले पुलिसकर्मियों व पत्रकारों को घायल करने वाली इस भीड़ में कितने किसान होंगे? लाल किले पर राष्ट्र व राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करके खालिस्तानियों को उकसाने के लिए उनका ध्वज लगाने वालो को क्या कोई किसान कह सकता ? लोकतंत्र के प्रतीक व गौरव के रूप में स्थापित लालकिले की गरिमा को गिराने वाले ऐसे दंगाइयों को कभी देशभक्त नहीं कहा जा सकता है? ये केवल देशद्रोहियों की ही टोलियां हो सकती है।

ऐसा कहना भी अनुचित नहीं होगा कि पुलिस प्रशासन व किसान नेताओं के समझौते के बाद भी ट्रैक्टर परेड का रूट बदला गया और फिर लालकिले को घेर कर उस पर एक धर्म विशेष का झण्डा (निशान साहब) लहराये जाने का कोई गुप्त एजेंडा इन विद्रोहियों ने तय किया होगा? जबकि यह सर्वविदित है कि सिख फ़ॉर जस्टिस नामक प्रतिबंधित आतंकी संगठन ने अपने न्यूयॉर्क स्थित कार्यालय से 11 जनवरी को जारी एक पत्र में 26 जनवरी को खलिस्तानी झंडा लगाने पर ढाई लाख डॉलर का पुरस्कार देने की भी घोषणा कर रखी थी। निःसंदेह किसान आंदोलन की आड़ में खालिस्तानियों ने देशद्रोहियों के साथ मिलकर हमारे देश के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय षडयन्त्र रचा है। बीसवीं सदी के अंत में देशद्रोही खालिस्तानियों को जड़ से मिटाने वाले भारत माँ के अमर सपूत तेज तर्रार वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्व.के.पी.एस.गिल की आक्रामक शैली को अपना कर देशद्रोही शक्तियों को मिटाना क्या राष्ट्रहित में अनुचित होगा? खालिस्तानियों के पुनः सक्रिय होने से आज उनकी आत्मा अवश्य आक्रोशित व पीड़ित होगी।

क्या यह भारत विरोधी शक्तियां व सत्ताहीन विपक्षी नेताओं की मोदी सरकार को असफल करने की जी-तोड़ कोशिश का ही दुष्परिणाम है कि ट्रैक्टर परेड को उग्रवादियों ने टेरर परेड बना दिया? निःसंदेह राष्ट्रीय पर्व को शर्मसार करके भारत माता के घायल होने पर खालिस्तानियों, पाकिस्तानियों, चीनियों व देश में छुपे गद्दारों को कुछ ठंडक अवश्य मिली होगी। लेकिन देश के मानबिंदु व संप्रभुता के प्रतीक लालकिले पर झण्डा फहराने वाले तत्वों को क्षमा नहीं किया जा सकता।अनेक देशद्रोही व राजनैतिक दलों ने इस आन्दोलन को राष्ट्रविरोधी बना दिया है। यह कृषि कानूनों का विरोध नहीं यह राष्ट्रद्रोह है।

स्वतंत्र भारत को कलंकित करने वाली इस ऐतिहासिक घटना ने “मैं भी चौकीदार” कह कर गर्व करने वाले करोड़ों भारत भक्तों के समक्ष अनेक प्रश्न खड़े कर दिये हैं। क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कि लालकिले पर विद्रोही तत्वों का जमावाड़ा पहुँच गया और पुलिस अधिकारियों को इसका कोई पूर्वानुमान ही नहीं था__? दिल्ली को बंधक बनाने व अराजक तत्वों के प्रति आक्रामक न होकर संयम बरतते हुए सामान्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होते देखने वाला प्रशासन क्यों विवश था _? ऐसे में देश की कानूनी व्यवस्था को बनाये रखने का दायित्व किसका होना चाहिए__? क्या इन प्रतिकूल परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय के इस आक्रामक अड़ियल आन्दोलन पर ढुलमुल व उदासीन निर्णय की कोई आलोचना करने का साहस कर सकता है__? क्या दिल्ली पुलिस का गणतंत्र दिवस पर परंपरागत परेड की व्यस्तता व मुस्लिम आतंकवादियों के सम्भावित संकटों के उपरांत भी आंदोलनकारियों को दिल्ली के अंदर ट्रैक्टर परेड की अनुमति देना उचित था__?

यह क्यों नहीं सोचा गया कि जब बार-बार ऐसे समाचार आ रहे थे कि दिल्ली की सीमाओं पर बैठे इन किसान आन्दोलनकारियों के मध्य अनेक अराजक तत्व घुसपैठ कर चुके हैं। खालिस्तानियों के समर्थन में नारे लगाना व उनके नेताओं के पोस्टर आदि का व्यापक रूप से प्रदर्शन करने के अतिरिक्त देशद्रोह के अपराधियों की रिहाई की मांग करने वालों को कम से कम किसान मानने की गलती तो नहीं करनी चाहिये थी? देश के प्रधानमन्त्री मोदी जी की मौत के लिए दुआ करते हुए गीत गाना क्या किसी किसान के बोल हो सकते हैं? इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के अतिरिक्त सोशल मीडिया में नित्य आने वाली सूचनाओं से यह भलीभांति स्पष्ट हो रहा था कि किसान आन्दोलन में अधिकांश विद्रोही तत्वों की संलिप्तता बढ़ती जा रही है।

इसी संदर्भ में जब 12 दौर की सरकार व 5 दौर की पुलिस प्रशासन से हुई किसान नेताओं की वार्ताओं एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति के सामूहिक प्रयासों से भी ये उग्र आंदोलनकारी कोई शांति पूर्ण समाधान के लिए आगे नही आ रहे थे तो क्या यह सनक भटकी हुई भीड़ को उपद्रवी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं थी? ध्यान रहे जब उपद्रवियों की हिंसक भीड़ आक्रामक ही बनी रहे और वार्ताओं का कोई महत्व नहीं तो उस विपरीत स्थितियों में कानूनों का पालन करते हुए जन-धन व आत्म सुरक्षा में हिंसा ही एकमात्र विकल्प शेष है। इसी संदर्भ में बहुत पुरानी कहावत है कि “लातों के भूत बातों से नहीं मानते”।

इसपर भी वर्तमान विकट स्थितियों में विचित्र कूटनीतिज्ञ ज्ञान यह है कि देश की प्रतिष्ठा पर धब्बे लगते रहे और निर्दोष पुलिसकर्मियों का बलिदान होता रहे फिर भी पुलिस के धैर्य व संयम की सराहना होती है। जबकि नागरिकों के मौलिक व संविधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सशक्त कानूनों का सहारा लिये जाने का दायित्व तो प्रशासन को निभाना ही चाहिये। यह कहना कि हिंसा किसी समस्या का हल नहीं हो सकता तो क्या हिंसक तत्वों को निर्दोष सुरक्षाकर्मियों व देशवासियों के नरसंहार की खुली छूट दे कर सार्वजनिक संपत्ति को भी क्षतिग्रस्त होने दे? यह कहा तक उचित होगा कि कुशल समर्थ प्रशासन उपद्रवियों की हिंसक भीड़ पर मौन रहकर गांधीगीरी की अहिंसक नपुंसकता को अपना कर संविधान का उल्लंघन होने दे? अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने कहा था कि “अगर हम अपमान से बचना चाहते है तो उसका जवाब देना आना चाहिये: अगर हम शांति चाहते हैं तो सबको मालूम होना चाहिये कि हम हर समय युद्ध के लिए तैयार है।”

शासन को बहुत गम्भीरता से चिंतन करना होगा कि जब अनेक कृषि विशेषज्ञों के द्वारा बार-बार इन कृषि अधिनियमों का सभी छोटे-छोटे किसानों तक को लाभकारी बताया जा रहा हो फिर भी कुछ अड़ियल किसान नेताओं को यह स्वीकार नहीं, क्यों? उनको क्या किन्हीं विशेष संदिग्ध शक्तियों से ऐसा विद्रोह करने में कोई बड़ा प्रतिफल प्राप्त हुआ है? क्या ऐसी शक्तियों का मुख्य लक्ष्य यह तो नहीं है कि इन कृषि सुधारों के नाम पर देश की प्रगतिशील व्यवस्था में बाधा उत्पन्न की जाय ? यह भी सोचना चाहिये कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए वर्तमान सरकार संसद में कोई अधिनियम पारित करती है तो उसके विरुद्ध होने वाले आन्दोलनों में अनेक पराजित नेता अप्रत्यक्ष व प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय हो जाते हैं।

अतः पुनः यह चिंतन करना होगा कि जब तक टुकड़े-टुकड़े गैंग व भारत की बर्बादी तक जंग का ऐलान करने वालो और शाहीनबाग धरना व दिल्ली दंगों के दोषियों पर कठोर वैधानिक कार्यवाही नहीं होगी तब तक राष्ट्रद्रोही शक्तियों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। क्या देशवासियों को नक्सलियों, वामपंथियों, पाकिस्तानियों व खालिस्तानियों आदि से सुरक्षित रहने के लिए केवल प्रशासन के भरोसे रहना चाहिये? आत्म निर्भर भारत के सम्मान व ऐसे तत्वों से बचने के लिए सामान्य नागरिको को भी सैनिक प्रशिक्षण लेना होगा। “मैं भी चौकीदार हूँ” कहना व लिखना अब पर्याप्त नहीं, क्योंकि आज हम लालकिले पर तिरंगे झंडे के सम्मान की भी रक्षा नहीं कर पाए। अब तो इस नारे को आत्मसात करके लाल किले की ही नहीं हमें अपने सम्पूर्ण राष्ट्र की रक्षार्थ चौकीदारी करने का दायित्व तो निभाना ही होगा।

विनोद कुमार सर्वोदय

(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)

गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)

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