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राजनीति

राजनीति पर बदनुमा दाग लगाने वाले हमारे राजनेता

नदीम

राजनीति क्या इतनी बुरी चीज है? जेहन में यह सवाल इसलिए आया कि हमने जब तब अपने शीर्ष नेताओं को यह कहते हुए सुना है कि ‘इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।’ कई बार तो ऐसा लगा कि हो सकता है राजनीति गंदी ही होती हो, तभी तो हमारे नेता लोग किसी गंभीर या संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति न करने की हिदायत देने लगते हैं। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी सवाल का जवाब न मिल रहा तो फिर नया सवाल खड़ा हो जाता है। वही हुआ इस बार भी।

जेहन में नया सवाल कौंध गया कि राजनीति अगर इतनी ही गंदी चीज है तो नेता लोग उसमें अपने को स्थापित करने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने को क्यों तत्पर रहते हैं? खुद तो रहते ही राजनीति में हैं फिर अपनी आने वाली पीढि़यों के लिए भी जगह बनाने में जुट जाते हैं। कोई भी मां-बाप अपने बच्चों का बुरा नहीं चाह सकता न? मान लिया वे किसी मजबूरी में या परिस्थितिवश गंदी जगह आ भी गए तो वे अपने बच्चों को उसमें लाने को इतना लालायित क्यों रहते हैं? नेताओं का शजरा देखिए न, पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति में ही गुजरती चली आ रही है। अगर राजनीति इतनी ही गंदी है, तो फिर उसमें उन्हें होना ही नहीं चाहिए था। लेकिन हैरत यह कि जिस राजनीति के जरिए वे सब शीर्ष पर पहुंचते हैं, उन्हें वह तब गंदी लगने लग जाती है कि जब वह जवाबदेही के चक्रव्यूह में खुद को घिरा पाते हैं और उससे बच निकलने का उनके पास एक ही जवाब होता है कि ‘इस मु्द्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।’ ऐसे मौके पर कोई यह सवाल करने वाला नहीं होता है कि अरे भाई, राजनीति क्यों नहीं होनी चाहिए? अगर राजनीति इतनी ही गंदी है तो फिर यह सवाल भी उठता है कि इसे गंदा बनाया किसने? वह इतनी गंदी तो थी नहीं क्योंकि इसी राजनीति के जरिए शासकों की जवाबदेही तय होती रही है और उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाई जाती रही है।

जवाबदेही से बचने का प्रयास
महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं को पीट-पीट कर मार डालने की घटना हो या यूपी के बुलंदशहर में मंदिर परिसर में दो साधुओं की हत्या की, दोनों मामलों में सिस्टम फेल हुआ लेकिन दोनों जगहों की सरकारों से जब यह पूछा जाने लगा कि इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार कौन है, तो बेचारगी भरा एक जैसा ही जवाब लगभग दोनों जगहों से सुनने को मिला कि ‘यह मौका राजनीति करने का नहीं है।’ स्थिति यह है कि अब बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है, जब भी कहीं नेताओं को यह कहते सुना जाए कि यह मौका राजनीति करने का नहीं है तो समझ लेना चाहिए या तो वे जवाब देने से बचना चाह रहे हैं या उनके पास उस सवाल का कोई जवाब है ही नहीं।

अगर राजनीति नहीं होगी तो फिर लोकतंत्र कैसे होगा? राजनीति की ही बुनियाद पर तो भारत के लोकतंत्र की इमारत दुनिया के तमाम देशों के लिए मिसाल बनी हुई। रावण पर फतेह हासिल करने के बाद जब राम ने अयोध्या आकर राज्य संभाला और उसके बाद उनकी पत्नी सीता के चरित्र पर मात्र एक व्यक्ति ने सवाल उठाया तो वे यह कह कर उसे खारिज कर कर सकते थे कि यह मौका राजनीति का नहीं है या किसी महिला के चरित्र को लेकर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और खुद को जवाबदेही की कसौटी पर कसे जाने के लिए आगे कर दिया। तभी तो वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए। रेलमंत्री रहते लाल बहादुर शास्त्री भी रेल दुघर्टनाओं को लेकर उठने वाले सवालों को यह कहकर आसानी से नजरअंदाज सकते थे कि- ‘इस तरह के मौकों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ लेकिन वह तब ईमानदारी की इबारत नहीं बन पाते। उनकी नैतिकता पर भी दिखावे का ही मुलम्मा चढ़ा होता। ईमानदारी और सादगी की मिसाल के रूप में उनका नाम लोगों की जुबान पर खुद ब खुद न आता।
कड़वा-कड़वा थू
कांशीराम की गिनती उन विरले नेताओं में की जा सकती है जो बगैर लागलपेट अपनी बात कहने के लिए जाने जाते रहे हैं। वह कहा करते थे कि- ‘मैं किसी को खुश करने के लिए राजनीति में नहीं हूं।’ उनका जिक्र यहां इसलिए कि उनके जरिए राजनीति को लेकर नेताओं के दोहरे नजरिये को समझना आसान हो जाता है। एक बार उन्हीं की पार्टी में उनकी नंबर दो मायावती के खिलाफ पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने बगावत कर दी थी। बगावत के असर को खत्म करने के लिए लखनऊ में उन्होंने एक पब्लिक मीटिंग की थी, जिसमें खुले मंच से कहा था कि ‘कुत्ते जब तक इनके ( मायावती) तलुवे चाटते हैं तो इन्हें अच्छा लगता है लेकिन जब दांत गड़ा देते हैं तो उसकी शिकायत लेकर मेरे पास आती हैं।
फिर उनके पास उनके कुत्तों को घर से बाहर का रास्ता दिखाने के कोई रास्ता नहीं बचता।’ वह मानते थे, राजनीति वह स्थिति में पहुंच चुकी है, जहां नेता मीठा-मीठा तो गप्प कर जाते हैं और कड़वा-कड़वा थूक देते हैं। उनकी इस एक लाइन से नेताओं का राजनीति को लेकर नजरिया समझना आसान हो जाता है। राजनीति उनके लिए वहां तक तो अच्छी है, जहां तक उन्हें ‘पावर’ की प्राप्ति होती रहती है, लेकिन जिस बिंदु से उन पर जवाब देने का दबाव बढ़ना शुरू हो जाता है, वह उन्हें नहीं सुहाता। यही वजह है कि सत्ता तक पहुंचने की होड़ के दौरान उन्हें कभी यह कहते नहीं सुना गया कि ‘राजनीति नहीं होनी चाहिए।’ अगर सच में राजनीति इतनी ही गंदी चीज होती तो देश में ढाई हजार से ज्यादा रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियां नहीं होतीं, पार्टियों से टिकट पाने के लिए इतनी जोड़ तोड़ नहीं होती, नेता चुनाव जीतने के लिए इतनी मश्क्कत नहीं करते और चुनाव में वोट डालने के लिए जनता में इतना उत्साह नहीं देखा जाता।

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