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जिसे हम अण्डमान द्वीप कहते हैं वो था कभी हनुमान द्वीप

आचार्य रामस्वरूप गौसेवक और एक समाजसेवी व्यक्ति हैं। उनका जन्म स्थल अजमेर (राजस्थान) का एक छोटा सा गांव है। स्वभाव से शांत और निभ्र्रान्त दीखते आचार्यवर साधु स्वभाव वाले मनुष्य हैं। अध्ययन शीलता और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी गहन आस्था ने उन्हें बहुत कुछ सीखने के लिए प्रेरित किया है। पिछले दिनों उनसे हमारी मुलाकात हुई तो बहुत कुछ ऐसा सुनने को मिला जो हमारे प्रिय पाठकों के लिए भी उपयोगी हो सकता है। इसलिए प्रस्तुत हैं, उनसे हमारी बातचीत के कुछ अंश :-सह-प्रबंध संपादक)
प्रश्न : आचार्य जी आप देश में घूमते रहते हैं आपको भारत में कौन-कौन सी ज्वलंत समस्याएं खड़ी नजर आती हैं?
उत्तर:देखिए यूं तो समस्याएं चुनौतियों के रूप में हमारे सामने काफी हैं, परंतु मुख्य समस्या है संस्कारों में आ रही गिरावट की, जिससे सामाजिक मूल्य प्रभावित हो रहे हैं और हमारे समाज में भीतर ही भीतर अशांति का लावा धधक रहा है।
प्रश्न : इसका उपाय क्या है?
उत्तर : संस्कारों को प्रबल बनाने के लिए देश में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे। यदि गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली पुन: लागू कर दी जाए और शिक्षा केवल मानव-निर्माण को अपना लक्ष्य घोषित कर दे तो स्थिति में सुधार आ सकता है। हम मजहबी शिक्षा की बात नही कर रहे हैं, अपितु हम धार्मिक शिक्षा की बात कर रहे हैं। मजहबी शिक्षा साम्प्रदायिक होती है, वह किसी वर्ग या सम्प्रदाय विशेष को लक्ष्य बनाकर उसके प्रचार एवं प्रसार के लिए दी जाती है, जबकि धार्मिक शिक्षा मानवीय होती है और वह केवल मानवता के प्रचार प्रसार के लिए दी जाती है।
प्रश्न: वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आप क्या कमियां देख रहे हैं?
उत्तर:देखिए बात कमियों की नही है, बात मानव-निर्माण की है, जहां तक वर्तमान शिक्षा की कमियों की ही बात है तो इसने हम पर अपनी बहुत सी मनमानी मान्यताएं थोपने का प्रयास किया है और हमारे इतिहास व भूगोल तक को बदल देने का प्रयास किया है, जिसे उचित नही कहा जा सकता। बहुत से स्थानों के नामों तक को बदल दिया गया और उनके नाम बदल देने से हमारे इतिहास का विलोपीकरण होने लगा।
प्रश्न : कैसे?
उत्तर : जैसे आप देखें कि भारत के उड़ीसा व बंगाल प्रांतों की ओर स्थित बंगाल की खाड़ी है, इसका यह नाम अंग्रेजों ने रख लिया, इससे पूर्व हमारे इतिहास में इसका ये नाम कहीं नही आता, आज भी स्थानीय लोग इस सागर को गंगा सागर के नाम से पुकारते हैं। इसी प्रकार पश्चिम में जहां अरब सागर है वह हमारे देश में बहती रहने वाली सिंधु नदी के नाम से सिंधु सागर कहा जाता रहा है। जिसे स्थानीय लोग आज भी इसी नाम से पुकारते हैं। अब चूंकि अंग्रेजों ने इन्हें अपने ढंग से पुकारा तो वैसे ही लिखा भी और लिखा गया तो वही हमारे द्वारा रटा गया। परिणाम स्वरूप हमारी परंपरा समाप्त हो गयी और दूसरों की एक गलत मान्यता हम पर सवार हो गयी।
प्रश्न: और क्या उदाहरण दे सकते हैं आप?
उत्तर : ऐसे उदाहरण तो बहुत हैं, पर एक उदाहरण मैं और देना चाहूंगा। वह है अण्डमान निकोबार द्वीप समूह का। अण्डमान मलयालम भाषा का शब्द है। मलयालम में ‘औण्डुमान’ हनुमान को कहा जाता है। स्पष्ट है कि यह अण्डमान शब्द हनुमान का ही पर्यायवाची है। बचपन में हनुमान को ठोड़ी में चोट लगी थी और ठोड़ी को संस्कृत में हनु कहते हैं, इसीलिए उनका नाम हनुमान पड़ गया था। स्थानीय लोगों ने हनुमान जी के समुद्र पार जाने के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए इस द्वीप का नामकरण उनके नाम से कर दिया हो, ऐसा संभव है। इसलिए यह द्वीप औण्डुमान (हनुमान) द्वीप के नाम से स्थानीय लोगों में प्रसिद्घ रहा। कालांतर में अंग्रेजों ने इसे अण्डमान उच्चारित किया। जो आज तक यथावत बना हुआ है।
प्रश्न : ….तो क्या इसे फिर हनुमान द्वीप बोला जाए?
उत्तर : अच्छा तो यही होगा, जैसे मद्रास का चैन्नई, बम्बई का मुंबई और कलकत्ता का कोलिकाता कर दिया गया है उसी प्रकार इतिहास के सच को समझकर अण्डमान का भी शुद्घ नामकरण किया जाना चाहिए। गंगासागर और सिंधु सागर जैसे शब्दों में भी हमारा संस्कृति बोध व इतिहास बोध झलकता है, इसलिए उनके नामकरण को भी शुद्घ किया जाना चाहिए।
प्रश्न:ऐसे नामकरणों से लाभ क्या हेाता है?
उत्तर : लाभ होता है, यदि आप अपने पूर्वजों के विषय में कुछ भी जानकारी नही रखते हैं या रखना भी नही चाहते हैं तो लोग आपको जैसे चाहे गुमराह कर सकते हैं जैसा कि भारत के विषय में हुआ भी है। हर चीज पर जब विदेशी छाप आप देखेंगे तो लगेगा कि हमें तो जो मिला है वह विदेशियों से ही मिला है, और जब इस विदेशीपन को मिटाकर स्वदेशीकरण की पहल की जाएगी तो लगेगा कि हम भी कुछ थे और कुछ हैं भी। यह ‘कुछ हैं भी’ ही वह मोती है जो किसी देश के लोगों में आत्मस्वाभिमान पैदा किया करता है और हमें इसकी आज आवश्यकता है।

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