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भारत को क्या सीखना चाहिए इजराइल से

भारत और इजरायल –
कश्मीर महापलायन 19 जनवरी की वर्षी पर।
चित्र मे 162 इथोपिया के यहूदी लोग दिखाए गए हैं जो इसी सप्ताह इथोपिया से इजरायल लाए गए हैं। परन्तु क्या भारत के हिन्दू इससे कोई सीख लेंगे? भारत की पहचान हिन्दू है तो इजरायल की पहचान यहूदी। दोनों को ही E+स्लामिक जुल्मों का सामना करना पड़ा। बस अन्तर इतना था कि यहूदियों को अपना वतन छोडना पड़ा परंतु हिन्दू किसी तरह इस 1000 साल की J+हादी बर्बरीयत से बच गए।

ग्रीक दंतकथाओं मे एक पक्षी फीनिक्स विवरण आता है जो अपनी राख़ से दोबारा उत्पन्न हो जाता है। यहूदी भी इसी फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी राख़ से उठ गए परन्तु हिन्दू नहीं उठे।
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स्वतन्त्र भारत मे हिंदूओ का सामूहिक उत्पीड़न
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1- कश्मीर 1947

शेख अब्दुल्ला ने नियम बनाया कि जो लोग 1944 तक
पाकिस्तान से भारत के कश्मीर मे आ गए केवल उन्हे नागरिकता मिलेगी। 1948 मे जान बचा कर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जान बचा कर आए लाखों हिंदूओ को 2020 तक इन 5 लाख हिंदूओ को नागरिकता व वोट का अधिकार नहीं मिला।
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2 – कश्मीर 1954
पंजाब से हजारों वाल्मीकि परिवारों को लाकर बसाया गया। कानून मे लिख दिया कि ये वाल्मीकि औए इनके वंशज केवल मैला ढोने का काम करेंगे। 2020 तक इन 2.5 लाख वाल्मीकि हिंदूओ को भी नागरिकता नहीं मिली।
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3 – कश्मीर 1990

19 जनवरी की रात निराशा और अवसाद से जूझते लाखों कश्मीरी हिन्दुओं का साहस टूट गया। उन्होंने अपनी जान बचाने के लिये अपने घर-बार तथा खेती-बाड़ी को छोड़ अपने जन्मस्थान से पलायन का निर्णय लिया। इस प्रकार लगभग 3,50,000 कश्मीरी हिन्दू विस्थापित हो गये।
विस्थापन के पांच वर्ष बाद तक कश्मीरी हिंदुओं में से लगभग 5500 लोग विभिन्न शिविरों तथा अन्य स्थानों पर काल का ग्रास बन गये। इनमें से लगभग एक हजार से ज्यादा की मृत्यु ‘सनस्ट्रोक’ की वजह से हुई; क्योंकि ये दिल्ली की गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाए।
कश्मीरी हिन्दुओं के मकानों, दुकानों तथा अन्य प्रतिष्ठानों को चिह्नित कर उस पर नोटिस चस्पा कर दिया गया। नोटिसों में लिखा था कि वे या तो 24 घंटे के भीतर कश्मीर छोड़ दें या फिर मरने के लिये तैयार रहें। आतंकियों ने कश्मीरी हिन्दुओं को प्रताड़ित करने के लिए मानवता की सारी हदें पार कर दीं। यहां तक कि अंग-विच्छेदन जैसे हृदयविदारक तरीके भी अपनाए गये। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा यह थी कि किसी को मारने के बाद ये आतंकी जश्न मनाते थे। कई शवों का समुचित दाह-संस्कार भी नहीं करने दिया गया।
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4
युगांडा —4 अगस्त, 1972, को युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने युगांडा में वर्षों से रह रहे 60000 एशियाइयों (गैर मुस्लिम मुख्यतः हिन्दू) को अचानक देश छोड़ देने का आदेश दे दिया है. उन्हें देश छोड़ने के लिए सिर्फ़ 90 दिन का समय दिया जाता है। हर व्यक्ति को अपने साथ सिर्फ़ 55 पाउंड और 250 किलो सामान ले जाने की इजाज़त थी.

निकाले गए 60000 लोगों में से 29000 लोगों को ब्रिटेन ने शरण दी. केवल वे 11000 लोग भारत आ सके जबकि इनमे से अधिकांश भारतीय गैर मुस्लिम थे। 5000 लोग कनाडा गए । कितने बेघर मारे गए उसका कोई रिकार्ड नहीं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने उन हिन्दुओ को भारत लाने की कोई सार्थक कोशिश नहीं की।
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5
वर्ष 1979, जनवरी का महीना था। पश्चिम बंगाल के दलदली सुंदरबन डेल्टा में मरीचझापी नामक द्वीप पर बांग्लादेश से भागे करीब 40,000 शरणार्थी एकत्रित हो चुके थे। मुख्यतः नामशूद्र जाति के दलित हिंदुओं का यह समूह उस महापलायन के क्रम में छोटी-सी एक कड़ी थी जिसमें बंग्लादेश बन जाने के बाद से लगभग 1 करोड़ उत्पीड़ित हिंदू भारत आकर विभिन्न स्थानों पर बस चुके हैं।
26 जनवरी 1979, जब पूरे देश में गणतंत्र दिवस का पर्व था और बंगाल में सरस्वती पूजा भी मनाई जा रही थी, मीडिया पर प्रतिबंध लगा, मरीचझापी में धारा 144 लागू कर दी गई और टापू को 100 मोटरबोटों से घेर लिया गया। दवाई, खाद्यान्न सहित सभी वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी गई।

पाँच दिन बाद, 31 जनवरी 1979 को पुलिस फायरिंग में शरणार्थियों का बेरहमी से नरसंहार हुआ। सरकारी आँकड़ों में केवल दो मौतें दर्ज हुईं पर प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मृतकों की संख्या सैकड़ों में थी। लाशों को लाँचों द्वारा पानी में इधर-उधर फेंक दिया गया।

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