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इक्कीसवीं शताब्दी शाकाहार की-7

environment-0गतांक से आगे….
बर्ड फ्लू भी इसी क्षेत्र में फेेलता है। दुनिया का यह सबसे घनी आबादीवाला क्षेत्र है। इसलिए प्रकृति किसी-न-किसी प्रकार इनसानों की जनसंख्या को संतुलित रखना चाहती है। जब आदमी अपनी संख्या को मर्यादित नही करता है तो फिर माल्थस का सिद्घांत लागू होता है। कुदरत अपने ढंग से अपना काम करती है और जितनी जनसंख्या चाहिए, उसे सीमित और मर्यादित करने के लिए मनुष्य को मौन भाषा में अपना संदेश देती है। भिन्न भिन्न बीमारियों से लोग मरने लगते हैं। कहा जाता है कि बर्ड फ्लू नामक बीमारी इन्फ्लुएंजा के अतिरिक्त कुछ भी नही है। मुरगी की इस बीमारी के कीटाणु उसके मल में होते हैं। किसी भी चिकन शॉप पर जाकर देख लीजिए जिस पिंजरे में पचास मुरगियों के रहने का स्थान होता है वहां आपको दुगुनी मिल जाएं तो आश्चर्य नही। चिकिन शॉप कितनी गंदी होती है। मुरगी की टांगे, आंत, पंख और मुंडियां उसमें पड़ी रहती हैं। इस गंदगी से कीटाणुओं का जन्म लेना, बढऩा और फेेलना स्वाभाविक है। जिस पोल्ट्री फार्म में ये कीटाणु हैं, वहां से इस गंदगी को गाड़ी में भरकर इनसानों की बस्ती में लाया जाता है। इन पर कोई कानून लागू नही होता। न तो उनके अलग से मार्केट हैं और न ही उनकी साफ सफाई का कोई प्रबंध। इन बीमार मुरगियों का मांस बड़े पैमाने पर खाया जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बकरे के मांस की तुलना में यह सस्ता है। मुरगी छोटा प्राणी है, इसलिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने ले जाने में कोई कष्टï नही होता। उसका भाड़ा भी सस्ता होता है। इसलिए मांसाहारी उसका बड़े पैमाने पर उपयोग करते हैं। जब यह बीमारी फेेली उस समय 70 लाख लोग मुरगी का मांस खाने से बीमार हुए। उक्त आंकड़ा एक अंतर्राष्टï्रीय संस्था ने दिया है। बीमार मुरगी का अंडा भी इन कीटाणुओं से प्रभावित हुए बिना नही रहता। केवल एशिया में प्रतिदिन तीन करोड़ मुरगियों को कत्ल किया जाता है। अंडे खाने वालों की तादाद पचास करोड़ से भी अधिक है। विश्व में मुरगी और उसके अंडे का सर्वाधिक सेवन होता है। बीमार पक्षी उसे आरोगने वाले के स्वास्थ्य की रक्षा किस प्रकार कर सकेगा, यह निजी नही बल्कि राष्टï्रीय और मानवीय चिंता का सवाल है। पांच वर्ष पूर्व ब्रिटेन में गायों को पागल कर देने वाली बीमारी फेेली। बतलाया जाता है कि कुल दो लाख गायों का कत्ल हुआ। उक्त बीमारी, जिसका नाम ‘मेड काऊÓ दिया गया, इंग्लैंड तक ही सीमित नही रह सकी बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी फेेल गयी। पागल गायों का कोई मांस खाएगा तो परिणाम यही होगा कि खाने वाला भी पागल हो जाएगा। क्रमश:

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