राकेश कुमार आर्य
(पिछले दिनों 26 मार्च को अपनी बार एसोसिएशन के अधिवक्ता साथियों के साथ फतेहपुर सीकरी जाने का मुझे सौभाग्य मिला। हमारे 46 सदस्यीय यात्री दल का नेतृत्व बार एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री महीपाल सिंह भाटी कर रहे थे। जिसमें मुझसे अलग अधिवक्ता साथियों में प्रमुख नाम थे-श्री जयपाल सिंह नागर, श्री ऋषिपाल भाटी, श्री राजपाल सिंह नागर, श्री अनुज नागर, श्री रामनिवास आर्य, श्री रामवीर शर्मा, श्री मणिन्द्र मोहन शर्मा, श्री अनिल भाटी, श्री दयानंद नागर, श्री मनोज भाटी आदि व बैनामा लेखक संघ के अध्यक्ष श्री गजेन्द्र नागर सहित श्री ओमवीर शर्मा, श्री मैनपाल सिंह, श्री शिवनारायण भाटी, श्री समर सिंह नागर आदि। आगरा होते हुए सायंकाल लगभग सवा चार बजे हमारा यात्री दल फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरबाजे पर पहुंचा। -लेखक )
इस दरवाजे के विषय में प्रचलित इतिहास की पुस्तकों में हमें पढ़ाया जाता है कि सन 1575 में सम्राट अकबर ने इसे गुजरात की विजय के उपरांत निर्मित कराया था। कहा जाता है कि सम्राट ने इसे पृथ्वी तल से 176 फीट ऊंचा तथा इसके सामने बने चबूतरे से 136 फीट ऊंचा बनवाया था। जो कि एशिया का सबसे ऊंचा दरवाजा है। हमें यह भी पढ़ाया जाता है कि सम्राट अकबर ने यहां एक नगर बसाया जिसका नाम फतेहपुर रखा, और पड़ोस में सीकरी गांव होने के कारण यह फतेहपुर सीकरी के नाम से कालांतर में प्रसिद्घ हो गया। सम्राट अकबर ने यहां 6 किमी. गोलाई की एक दीवार बनवाई थी जो आज भी विद्यमान है। इसी दीवार के भीतर ही कभी सम्राट की राजधानी हुआ करती थी। उसी समय के सारे महल, भवन, मस्जिद आदि हमें आज तक भी मिलते हैं। शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से सम्राट को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। अपने आध्यात्मिक गुरू से मिले इस प्रसाद को पाकर अकबर अत्यंत प्रसन्न हुआ था और इसलिए अकबर ने अपने पुत्र का नाम भी सलीम ही रखा। शेख की मृत्यु के उपरांत यहां बादशाह ने एक दरगाह का निर्माण कराया, जिस पर लोग आज भी मन्नतें मांगने आते हैं।
कहानी का एक पक्ष ये है तो दूसरा पक्ष कुछ अलग ही है। यदि समकालीन इतिहास लेखकों को पढ़ा जाये तो ज्ञात होता है कि फतेहपुर सीकरी सम्राट अकबर से भी पूर्व से ही विद्यमान रही है और यहां के लगभग सभी भवन आदि मुगल बादशाह द्वारा निर्मित न होकर पूर्व से ही निर्मित होने के कारण हिंदू शासकों द्वारा निर्मित रहे हैं। तनिक इन तथ्यों पर भी विचार कर लिया जाए।
अकबर का शासनकाल भारत में 1556 ई. से प्रारंभ होकर 1605 ई. तक रहा। इसका अभिप्राय है कि अकबर ने भारत पर 49 वर्ष शासन किया। जब वह सिंहासन पर बैठा था तो उस समय उसकी अवस्था तेरह-चौदह साल की थी। 1542 ई. में जब उसका जन्म हुआ तो उसके पिता हुमायूं के पास उस समय कोई साम्राज्य नही था, उल्टे हुमायूं अपने पिता बाबर द्वारा स्थापित अपने राज्य को भी गंवा चुका था। परंतु समय ने करवट ली और 1556 ई. में जब हुमायूं मरा तो उसके पास अपने पिता बाबर के राज्य का कुछ हिस्सा लौट आया। अब अकबर की बारी थी कि उसे अपने पिता और पितामह द्वारा स्थापित राज्य का विस्तार कैसे करना है? अकबर ने इसके लिए कितने ही युद्घ किये और इन युद्घों के पश्चात उसे जहां-जहां विजय मिली उसने भी हिंदू राजाओं के पुराने भवनों, किलों और निर्माणों पर अवैध कब्जा करके उन्हें अपने ढंग से (जिसे मुगलिया निर्माण शैली का काल्पनिक नाम दे दिया गया है) अपने लिए रहने योग्य बनाया। किसी भवन में उसने दरगाह बना दी, किसी में स्वयं रहकर शासन करना आरंभ कर दिया तो किसी को कब्जा कर उस पर कुरान की आयतें खुदवाकर ऐसा भ्रम उत्पन्न किया कि जैसे ये उसी के द्वारा निर्मित हैं।
बात फतेहपुर सीकरी की करें, तो अकबर से भी सदियों पूर्व इसके होने की सूचना हमें कर्नल टॉड के ”राजस्थान का इतिहास” नामक ग्रंथ से मिलती है। कर्नल टॉड हमें बताता है कि राजपूतों के सिकरवाल राजकीय वंश का सीकरी से ही संबंध रहा है। अब यह सिकरवाल वंश तो अकबर से सदियों पूर्व से चला आ रहा था, और आज भी है। कर्नल टॉड से हमें पता चलता है कि अकबर से पूर्व इस स्थान को फथपुर कहा जाता था। बहुत संभव है कि अकबर ने इस फथपुर का नामकरण ही फतेहपुर कर दिया हो। परंतु इस नये नामकरण के उपरांत भी लंबे समय तक लोग फतेहपुर को पुराने नाम अर्थात फथपुर से ही पुकारते रहे।
सीकरी एक स्वतंत्र राज्य था, इसका प्रमाण हमें कर्नल टॉड की इस साक्षी से मिलता है-”राणा सांगा (जिन्हें राणा संग्राम सिंह भी कहा जाता है) मेवाड़ के सिंहासन पर सन 1509 में बैठा। 80,000 अश्व, सर्वोच्च पदाधिकारी सात राजा, नौ राव और रावल, उप रावत नाम के 104 प्रमुख सरदार अपने चार सौ हाथियों सहित युद्घ क्षेत्र में उसके साथ गये। मारवाड़ और अंबर के राजकुमारों ने उसके प्रति राजनिष्ठा की शपथ ली, और ग्वालियर, अजमेर, सीकरी, रायसेन काल्पी, चंदेरी, बूंदी, गगरोन, रामपुर तथा आबू के रावों ने उसकी सहायता की।”
यहां पर सीकरी का नाम अकबर से लगभग 150 वर्ष पूर्व के वर्णन में स्पष्ट किया गया है।
पी.एन. ओक हमें बताते हैं कि फतेहपुर सीकरी के संबंध में एक और संदर्भ जुलाई सन 1405 का है, जो अकबर के सत्तारूढ़ होने से 151 वर्ष पूर्व और उसके जन्म से 137 वर्ष पूर्व का है। इसके अनुसार-”पहले ही धावे में इकबाल खान परास्त हो गया और भाग गया। उसका पीछा किया गया, उसका घोड़ा उसके ऊपर गिर गया, जिससे वह घायल हो गया और बचकर आगे नही भाग सका। वह मार डाला गया और उसका सिर फतेहपुर भेज दिया गया।”
यह सुल्तान महमूद के समय में हुआ। जिसका अभिप्राय है कि फतेहपुर सीकरी उस समय भी शाही स्थल थी। ऐसी ही एक अन्य जानकारी हमें इसी तिथिवृत्त से और भी मिलती है। जिसमें बताया गया है कि ”सैय्यद वंश का संस्थापक खिज्रखान फतेहपुर में ही रहा और दिल्ली नही गया।”
ऐसे और भी प्रमाण हैं जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि फतेहपुर सीकरी का अस्तित्व अकबर से पूर्व से ही था। लेकिन हमें अपनी इतिहास पुस्तकों में जो पढ़ाया जा रहा है हम उसे ही सत्य मानकर चल रहे हैं, उन प्रमाणों और साक्ष्यों की ओर हमारा ध्यान नही जा रहा है, या हम ले जाना नही चाहते हैं। ये प्रमाण वर्तमान इतिहास में आरोपित किये गये
Untitledझूठ को जड़ से नकारने का डिण्डिम घोष कर रहे हैं। अब यह विचारणीय बात है कि जिस स्थान पर राजकीय वंशों के पूर्व से ही शासन करने के प्रमाण हमें मुस्लिम लेखकों के माध्यम से ही मिल रहे हों, तो उन हिंदू राजाओं के राजमहल, उनके भवन, उनके किले और उनके द्वारा निर्मित इमारतें आज कहां हैं? जब कुछ विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत के कुछ नगरों को कब्जाया गया और उन्हें झूठ-मूठ अपने द्वारा स्थापित कराने का मिथ्या वर्णन किया गया है तो इन नगरों में स्थापित भवनों, किलों, राजमहलों को कब्जाकर उन्हें भी अपने द्वारा स्थापित या निर्मित करने का झूठ क्यों नही फैलाया जा सकता? आज इसी दृष्टिकोण से इन ऐतिहासिक स्थलों का निरीक्षण किये जाने की आवश्यकता है। लगभग एक घण्टा रूकने पर हमारा यात्री दल बुलंद दरवाजे से बाहर निकला और हम अपने-अपने घरों के लिए वापस चल दिये।

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