भारत के महान ज्योतिष आचार्य – वराह मिहिर

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महान् ज्योतिषाचार्य — वराहमिहिर

वराहमिहिर का जन्म पाँचवीं शताब्दी के अन्त में लगभग 556 विक्रमी संवत् में तदनुसार 499 ई. सन् में हुआ था। इनका स्थान उज्जैन (मध्य प्रदेश) से 20 किलोमीटर दूर कायथा (कायित्थका) नामक स्थान पर हुआ था।

इनके पिता का नाम आदित्य दास और माता का नाम सत्यवती था। इनके माता-पिता सूर्योपासक थे।

वराहमिहिर ने कायित्थका में एक गुरुकुल की स्थापना भी की थी।

वराहमिहिर ने 6 ग्रन्थों की रचना की थीः—
(1.) पञ्चसिद्धान्तिका (सिद्धान्त-ग्रन्थ),
(2.) बृहज्जातक (जन्मकुण्डली विषयक),
(3.) बृहद्यात्रा,
(4.) योगयात्रा (राजाओं की यात्रा में शकुन) ,
(5.) विवाह पटल ( मुहूर्त-विषयक),
(6.) बृहत् संहिता (सिद्धान्त तथा फलित)।

इनमें से पञ्चसिद्धान्तिका और बृहद् संहिता सर्वाधिक प्रसिद्ध है। बृहत् संहिता में 106 अध्याय हैं। इस कारण यह विशाल ग्रन्थ है। इसमें सूर्य चन्द्र, तथा अन्य ग्रहों की गतियों एवं ग्रहण आदि का पृथिवी तथा मानव पर प्रभाव, वर्षफल (गोचर), ऋतु के लक्षण, कृषि-उत्पादन, वस्तुओं के मूल्य, वास्तुविद्या में ज्योतिष् का महत्त्व इत्यादि विविध विषय संगृहीत है। सिद्धान्त ज्योतिष् और फलित ज्योतिष् का यह संयुक्त ग्रन्थ है। इसमें भारतीय भूगोल का भी निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थ पर भट्टोत्पल की टीका मिलती है। उसने इस पर 966 ई. में अपनी टीका लिखी थी।

पञ्चसिद्धान्तिका में उन्होंने पाँच सिद्धान्तकों का वर्णन किया हैः—-
(1.) पौलिश,
(2.) रोमक,
(3.) वशिष्ठ,
(4.) सौर,
(5.) पितामह।

वराहमिहिर एक महान् ज्योतिषाचार्य थे। वे एक खगोल विज्ञानी भी थे। पञ्चसिद्धान्तिका के प्रथम खण्ड में उन्होंने खगोल विज्ञान पर विस्तार से चर्चा की है। चतुर्थ अध्याय में उन्हों त्रिकोणमिति से सम्बन्धित विषय पर विस्तृत चर्चा की है।

वराहमिहिर ने 24 ज्या मान (R sin A value) वाली ज्या सारणी (sine Table) दी है।

अपने बृहत् संहिता ग्रन्थ में संचय ज्ञात करने के लिए उन्होंने एक पद्धति विकसित की है, जिसे “लोष्ठ-प्रस्तार” कहा जाता है। यह सारणी पास्कल त्रिकोण से मिलती जुलती है।

सुगन्धित द्रव्य तैयार करने के लिए वराहमिहिर ने 4 गुणा 4 पेंडियागोनल जादुई वर्ग ( Pandiagonal Magic Square) का उपयोग किया है।

वराहमिहिर ने इसके अतिरिक्त नक्षत्र विद्या, वनस्पति विज्ञान, भूगोल शास्त्र, प्राणीशास्त्र और कृषि विज्ञान पर भी चर्चा की है।

इन ग्रन्थों में हमें प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं अनुसन्धान वृत्ति का ज्ञान प्राप्त होता है।

वराहमिहिर की बहुमुखी प्रतिभा के कारण उनका स्थान विशिष्ट है।

उनका निधन लगभग 644 विक्रमी संवत् अर्थात् 587 ई. सन् में हुआ था।

— कोन है पुराना —
न्यूटन (1642-1726)
या
वराहमिहिर ( 57 BC ) रचित “पञ्चसिद्धान्तिका”

* वराहमिहिर के वैज्ञानिक विचार तथा योगदान –
बराहमिहिर वेदों के ज्ञाता थे मगर वह अलौकिक में आंखे बंद करके विश्वास नहीं करते थे। उनकी भावना और मनोवृत्ति एक वैज्ञानिक की थी। अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिक आर्यभट्ट की तरह उन्होंने भी कहा कि पृथ्वी गोल है। विज्ञान के इतिहास में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि कोई शक्ति ऐसी है जो चीजों को जमीन के साथ चिपकाये रखती है। आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते है।
वराहमिहिर ने पर्यावरण विज्ञान (इकालोजी), जल विज्ञान (हाइड्रोलोजी), भूविज्ञान (जिआलोजी) के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की। उनका कहना था कि पौधे और दीमक जमीन के नीचे के पानी को इंगित करते हैं। आज वैज्ञानिक जगत द्वारा उस पर ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने लिखा भी बहुत था। अपने विशद ज्ञान और सरस प्रस्तुति के कारण उन्होंने खगोल जैसे शुष्क विषयों को भी रोचक बना दिया है जिससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। उनकी पुस्तक पंचसिद्धान्तिका (पांच सिद्धांत), बृहत्संहिता, बृहज्जात्क (ज्योतिष) ने उन्हें फलित ज्योतिष में वही स्थान दिलाया है जो राजनीति दर्शन में कौटिल्य का, व्याकरण में पाणिनि का और विधान में मनु का है।

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