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राजनीति

263 अपराधी भी जीत गये तो क्या होगा

राकेश कुमार आर्य
नई दिल्ली। अपनी बात दो प्रसंगों से आरंभ करते हैं। पहला प्रसंग है शहीदे आजम भगत सिंह का। भगत सिंह अभी बालक ही थे और विद्यालय में अपनी पढ़ाई कर रहे थे। एक दिन वे अपनी कक्षा में विचार मग्न मुद्रा में चुपचाप बैठे थे। तभी उनकी कक्षा का निरीक्षण करने हेतु अधिकारी आ गये। अधिकारी को अपने सामने खड़ा देखकर सभी विद्यार्थी सम्मानवश खड़े हो गये। परंतु बालक भगत सिंह अब भी उसी विचारमग्न अवस्था में ज्यों के त्यों ही बैठे रहे। तब उस अधिकारी ने बड़ी सहजता से पूछा-
”बेटे! क्या सोच रहे थे?”
भगत सिंह ने गंभीरता से कहा-”अपने देश की आजादी के बारे में सोच रहा था।”
अधिकारी ने पुन: दूसरा प्रश्न कर दिया-”तुम देश की आजादी के मिलने को इतना आसान समझते हो?”
बालक भगत सिंह ने कहा-”कोई भी काम आसान होता नही, उसे आसान बनाया जाता है।” अधिकारी ने बालक के दृढ़ निश्चय को देखकर कहा-”सचमुच बेटा तुम आजादी का मूल्य समझते हो?”
दूसरा प्रसंग है स्वातंत्रय वीर सावरकर का। वीर सावरकर को बिना किसी अपराध के आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी। जेल की कोठरी में ले जाते समय उनके गले में एक तख्ती लटका दी गयी, जिस पर लिखा था-‘1910 में दण्डित, रिहाई 1960 में’।
साथ चल रहे एक गोरे अधिकारी ने व्यंग्य से कहा कि घबराओ नही, 50 वर्ष होते ही ब्रिटिश सरकार तुम्हें रिहा कर देगी।
वीर सावरकर सिंह-गर्जना कर दहाड़े-अरे मूर्ख क्या स्वयं ब्रिटिश सरकार भारत में पचास साल टिक सकेगी।’
दहाड़ सुनकर गोरा निरूत्तर था।
देश की स्वाधीनता के लिए ऐसे कितने ही देशभक्त थे, जिन्होंने बालक भगत सिंह की सी अवस्था में देश की स्वाधीनता के लिए गंभीर सपने बुने और जिन्होंने सावरकर की भांति पूर्ण निश्चय कर लिया था कि अपने जीवनकाल में ही देश को स्वाधीन करा लिया जाएगा।
और सचमुच 1947 की 15 अगस्त को इन ‘भगतसिंहों’ और ‘सावरकरों’ का सपना साकार हो गया। देश आजाद हो गया। आज उस ऐतिहासिक घड़ी को बीते लगभग 67 वर्ष होने को आये, हमने इन 67 वर्षों में बहुत कुछ किया है। पर एक जो सबसे बड़ा काम जो हमें नही करना चाहिए था, पर हमने कर दिया है, और वो ये है कि भारत की राजनीति को और देश की व्यवस्थापिका को अपराधियों के हवाले कर दिया है। क्या अर्थ रह गया है अब इस गाने का-
कर चले हम फिदा जानोतन साथियो।
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो।।
देश की लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं एक सर्वे के अनुसार लोकसभा की कुल 543 सीटों के लिए कुल उम्मीदवारों में से 15 प्रतिशत अर्थात 321 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं या मुकदमे चल रहे हैं। जबकि कुल उम्मीदवारों का दस प्रतिशत अर्थात 204 उम्मीदवार ऐसे हैं जिन पर गंभीर आपराधिक मामले न्यायालयों में विचाराधीन हैं।
ऐसे दागी प्रत्याशी सबसे अधिक संख्या में तमिलनाडु में 103 हैं। अन्य प्रांतों में इनकी संख्या इस प्रकार है-महाराष्टï्र 68, बिहार 38, उत्तर प्रदेश 27, मध्य प्रदेश 27, झारखण्ड 19, छत्तीसगढ़ 12, पश्चिम बंगाल 11, असम 8, राजस्थान 7, पांडिचेरी 6, जम्मू कश्मीर 01।
इस संख्या को देखकर दुख होता है। सवा अरब की आबादी के लिए यदि इन अपराधियों में से आधे भी संसद में प्रवेश कर गये तो कुल 525 सदस्यों के योग में से 263 सांसद अपराधी होंगे। यह गिनती बहुमत के लिए अपेक्षित 272 के आंकड़े से केवल 9 की संख्या में कम होगी। आप तनिक कल्पना करें कि जिस देश की संसद के निचले सदन में अपेक्षित बहुमत लगभग अपराधिuntitledयों से पूर्ण हो रहा हो, उन्हें संसद से बाहर करना कितना कठिन होगा? और यह भी कि क्या देश में प्रतिभाएं समाप्त हो गयीं हैं, या एक षडयंत्र के अंतर्गत उन्हें ऊपर आने से रोका जा रहा है?
आवश्यकता इन अपराधियों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए ये है कि इन्हें भीतर का रास्ता ही न दिखाया जाए। इसलिए चुनाव सुधार के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक दागी को हर हर पार्टी उपेक्षित करे। अपराधी कभी शासक नही होते हैं, क्योंकि शासन अपराधियों को नियंत्रित करने के लिए लाया जाता है। यदि अपराधी कभी शासक बन गये तो शासन ही अपराधी हो जाएगा और वह दिन देश के लिए महाविनाशकारी होगा। जब अपराधी लोकसभा में जा पहुंचे तो इनके शासक बनने में ही कितनी देर या दूरी है? आज यह प्रश्न ही विचारणीय है। समय रहते कठोर पग उठाये जायें, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा।

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