सच्चाई का प्रतीक होते हैं

आँसू

– डॉ. दीपक आचार्य

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आँसू और पवित्रता के बीच गहरा रिश्ता है। ये एक-दूसरे के पर्याय हैं। आँसू अपने आप में इतने पवित्र होते हैं कि इनसे ज्यादा शुचिता किसी और द्रव में कभी हो ही नहीं सकती। ये केवल बूँदें नहीं होती बल्कि इंसान के मन-मस्तिष्क का वो सार होती हैं जिसमें सच्चाई का खजाना छिपा होता है।

आँसू आना भी अपने आपमें ईश्वरीय कृपा का ही परिणाम है अन्यथा कोई कितना ही चाहे आँसू नहीं आ सकते।  आँसुओं का अपना कोई मध्यम मार्ग नहीं होता। ये दो ही अवस्थाओं में बनते और छलकते हैं। चरम खुशी हो या फिर चरम दुःख की कैसी भी अवस्था सामने आने पर आँसुओं का सृजन और निर्झरण अपने आप आरंभ हो जाता है और संवेदनाओं का वेग बाहर निकाल कर अपने आप रुक भी जाता है।

किसी के कहने-सुनने या सुख-दुःख अनुभव करने से आँसू नहीं आ जाते बल्कि आँसू तभी बनते और आँखों से बाहर निकलते हैं जब तत्कालीन परिस्थितियों में सुख या दुख दोनों में से कोई सी  सच्चाई सारे आवरण छोड़कर बाहर आ जाती है।

आँसुओं के आने का ही मतलब यह है कि व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण सहजावस्था और मौलिक गुणधर्म वाली स्थिति में आ गया है। ऎसी स्थिति में सब कुछ चरम पर होता है। वेदनाओं और संवेदनाओं का उभार पूर्ण उच्चावस्था में आ जाता है और ऎसे में मनुष्य अपने मानवी अहंकार को इतना विगलित कर देता है कि उसे उस समय लगता है कि इस समय वह स्रष्टा न होकर मात्र द्रष्टा है और इस द्रष्टा भाव में न कोई विकार होता है न आसक्ति का कोई भाव। मन में जो जैसा अनुभव होता है वह आँसुओं के रूप में घुलकर पिण्ड से ब्रह्माण्ड तक का सफर शुरू करने के लिए बाहर को निकल आता है।

संवेदनाओं के जाने कितने सूक्ष्म महासागरों के रस में पग कर निकलने वाले ये आँसू इस बात के गवाह हैं कि जो  कुछ हो रहा है वह शाश्वत सत्य का प्रकटीकरण है और इसमें किसी भी अंश में कोई मिलावट नहीं है। अपनी आँखों से निकलने वाला हर अश्रु अपने आप में किसी विराट कल्पना या सत्य का बीज तत्व होता है  जो दिखने में भले ही द्रव की छोटी सी बूँद हो मगर पंचतत्वों की माया से निर्मित हर किसी जीव को भीतर तक प्रभावित कर परिवेश में महापरिवर्तन की साक्षी बनता है। स्ति्रयों में यह विशेषता ज्यादा दिखाई देती है क्योंकि आँसू अपने आप में महान शक्ति होते हैं और यह शक्ति तत्व शक्ति में ही समाहित रहता है। यही तत्व द्रवीभूत होकर आँसुओं के रूप में ढल जाता है। स्त्री अपने आप में प्रकृति है और प्रकृति मौलिक तथा शुद्ध भावभूमि लिऎ हुए होती है।

जहाँ कहीं शुद्ध भावभूमि होगी वहाँ आँसुओं की फसल कभी भी लहलहा सकती है। हम अक्सर देखते हैं कि कई सारे स्त्री-पुरुष ऎसे होते हैं जिनकी आँखों से उस समय आँसुओं की धारा फूट पड़ती है जब चरम प्रसन्नता या चरम दुःख का कोई क्षण उनके सामने आ जाता है। कई लोग भगवान की मूर्ति के सामने हों या किसी आस्था स्थल पर मत्था टेक रहे होते हैं तब यकायक अश्रुपात होने लगता है।

आँसुओं के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मनुष्य जब आत्मस्थिति में होता है, सत्य से उसका साक्षात होता है, परम सत्ता का भान होता है अथवा मनुष्य होने का अपना अहंकार शून्यावस्था को प्राप्त हो जाता है, उसी स्थिति में आँसुओं की धारा फूट पड़ती है।

कई सारे लोग आत्मीयता दर्शाने और दिखावे के लिए  आँखों में आँसू ले आते हैं और रूमाल लेकर पोंछने की मुद्रा में सबके सामने होते हैं, लेकिन ऎसे लोगों के शब्दों, मुद्राओं और भावों से साफ झलक जाता है कि ये लोग दिखावा कर रहे होते हैं।

जो लोग पापी, मक्कार, भ्रष्ट, खुदगर्ज, स्वार्थी और आत्मकेन्दि्रत होते हैं वे लोग इस प्रकार की हरकतें करने के आदी होते हैं मगर इनकी आँखों में न आँसू बन पाते हैं न बाहर निकल पाते हैं। जबकि दूसरी ओर जो लोग समाज और देश के लिए जीने-मरने का ज़ज़्बा लेकर काम करने वाले होते हैं उनके साथ अक्सर ऎसा होता है कि जब भी संवेदनाओं का कोई चरम अवसर उपस्थित होता है इनकी आँखें अपने आपको रोक नहीं पाती और आँसुओं का दरिया उमड़ पड़ता है।

जिन लोगों के आँसुओं में सच्चाई और शुचिता होती है उनके अश्रुपात को देखकर दूसरे सारे संवेदनशील लोग भी अपने आपको रोक नहीं पाते, चाहे वे लाख छिपाने की कोशिश करें। जो लोग शुद्ध चित्त होते हैं उन लोगों के आँसुओं में इतना भारी दम होता है कि वे दूसरों की आँखों में भी आँसुओं को ला सकते हैं जबकि जो लोग घड़ियाली आँसू बहाते हैं वे सिर्फ और सिर्फ खुद की आँखों में ही कृत्रिम आँसू दर्शा सकते हैं, दूसरों को प्रभावित कभी नहीं कर सकते।

असली लोगों की आँखों में ही आँसू आ सकते हैं। आँसूओं का निर्माण शुद्ध हृदय में ही होता है और इनका प्रभाव अपने आस-पास के लोगों को भी द्रवित करने का पूरा सामथ्र्य रखता है।  इसलिए जिन लोगों की आँखों में आँसू आते हैं उनके बारे में मानना चाहिए कि वे संवेदनशील हैं और अपने लिए नहीं बल्कि औरों के लिए जीने वाले हैं तथा समाज और देश के लिए सर्वस्व समर्पण की भावना उनमें हिलोरें लेती है।

जिनकी आँखों में करुणा, प्रेम और ममत्व है, समाज और देश जिनके लिए सर्वोपरि हैं, आत्मीयता, सेवा और परोपकार है ऎसे संवेदनशील लोगों की आँखों के आँसू यह दर्शाते हैं कि वे उन लोगों में हैं जो औरों को कभी रोने का मौका नहीं देंगे।

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