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स्वर्णिम इतिहास

राजा पुरुवास अर्थात पोरस का गौरवमयी इतिहास

 

 

प्राचीन काल से ही भारतभूमि का इतिहास काफी रोचक रहा है। हमारे देश में सत्ता प्राप्त करने एवं मिली हुई सत्ता सुरक्षित रखने के लिए कई युद्ध हुए हैं, जिनसे जुड़ी जानकारी हमें इतिहास की किताबों के माध्यम से मिलती है। लेकिन इतिहासकारों ने बहुत सी बातों को या तो अधूरा ही रखा है या फिर तोड़मरोड़ कर एक अलग ही तरह से पेश किया है। कुछ इतिहासकारों ने इतिहास में घटित घटनाओं को मिथ्या की चाशनी में इस तरह से डुबोया है कि वो सभी घटनाएं सत्य प्रतीत होते हैं। ऐसी ही एक घटना को मिथ्या की चाशनी में डुबोया था ग्रीक इतिहासकारों ने जिसे आधुनिक इतिहासकार बड़े चाव से हमें परोसते हैं। हम बात कर रहे हैं 2300 वर्ष पूर्व की, जब विश्वविजय का सपना लिए भारतभूमि पर सिकंदर आया जिसे महाप्रतापी राजा पोरस से कठिन चुनौती मिली। इन दोनों ताकतवर राजाओं के बीच झेलम नदी के किनारे भीषणयुद्ध हुआ जिसे आज भी याद किया जाता है।

👉 आज हम अपने इस लेख में आपको इस युद्ध और राजा पोरस के बारे में वो जानकारी देने जा रहे हैं, जो सम्भवतः आपने कभी पढ़ा ही नहीं हो। क्यों कि हमें यह तो पढ़ाया गया है कि सिकंदर कितना महान था। यहाँ तक कि उसे महान बताने के लिए एक कहावत भी निर्मित हो गई है- ‘जो जीता वही सिकंदर’। लेकिन क्या सिकंदर सचमुच महान था? या फिर ग्रीक इतिहासकारों के प्रभाव से लिखी गई पश्चिम के इतिहास की किताब को दुनिया ने आँख मूँदकर मान लिया है। किंतु जब हम ईरान एवं चीन के बचे हुए ऐतिहासिक श्रोतों के नजरिए से देखते हैं तो असलियत कुछ और ही नज़र आती है। आइए पढ़ते हैं उस महान राजा के बारे में जिसकी उपलब्धि को धत्ता बता, यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर को महिमामण्डित किया और ऐसा करके उन्होंने अपने योद्धा और देश के सम्मान को बचा लिया और दुनियाभर में सिकंदर को महान साबित कर दिया।

*✍️ ● कौन थे राजा पुरुवास*

राजा पोरस के बारे में अधिकांश जानकारी जो प्रचलित है वो यूनानी इतिहासकारों द्वारा लिखित है। उनके अनुसार राजा पोरस का समय 340 ईसापूर्व से 315 ईसापूर्व तक का माना जाता है। पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। राजा पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। इतिहासकार के.पी.दुबे लिखते हैं कि यूनानी लेखकों ने राजा पोरस के बारे में 25 वर्ष की आयु के होने तक कुछ लिखा ही नहीं है। दुर्भाग्यवश हमारे देश के बारे में जो लिखित इतिहास था वो नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बख्तियार ख़िलजी द्वारा लगाई हुई आग में भस्म हो गया। इसके अलावा सन 50 ईसा पूर्व में अलेक्सांद्रिया के पुस्कालय में लगी आग में समसामयिक इतिहास जलकर राख हो गया। हालांकि कुछ इतिहासकार कहते हैं कि जब अलेक्सांद्रिया का पुस्तकालय जल रहा है तब उस क्षेत्र में रहने वाले ईरान एवं चीनी लोगों ने कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों को बचा लिया और अपने अपने देश ले गए। उन दस्तावेजों में भारतीय इतिहास का भी विवरण मिलता है। स्रोतों के अनुसार पोरस या राजा पुरुवास का जन्म सिंध प्रान्त पंजाब में हुआ था। वो राजा बमनी और अनुसुइया के पुत्र थे। गांधार का राजा आम्भी उनका मामा था, जिनका साम्राज्य झेलम नदी से चेनाब नदी फैला हुआ था। लेकिन राजा बमनी से आम्भी के सम्बंध अच्छे नहीं थे। कहते हैं कि राजा पोरस की शारीरिक रचना भी अद्भुत थी, उनकी उचाई 7.5 फिट थी।एक कुशल राजा होने के साथ ही वे अपने राज्य की प्राकृतिक और भौगोलिक जानकार भी थे। राजा पोरस का समय कार्यकाल 340 ईसापूर्व से 315 ईसापूर्व तक माना जाता है।

*✍️ ● राजा पोरस के समकक्ष सिकंदर*

उधर सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले व चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद यूनान के मेसेडोनिया के सिन्हासन पर बैठ गया। इसके पश्चात अपनी अतिमहत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। उसकी खास दुश्मनी ईरानियों से थी। इसलिए सिकंदर ने सबसे पहले ईरान के पारसी राजा दारा(डराइस) को पराजित कर किया और और स्वंय को विश्व विजेता घोषित कर दिया। इतिहासकार कहते हैं कि राजा दारा भले ही हार गया था लेकिन उसने बड़ी चतुराई से सिकंदर से बचने का रास्ता निकाला। दारा ने कहा, तुम मुझे हराकर स्वयं को विश्वविजेता समझ रहे हो, जब कि असलियत में मुझसे कई गुना बड़ा साम्राज्य हिन्द है। जब तक तुम उस पर कब्ज़ा नहीं कर लेते तुम्हे विश्व विजेता कहलाने का कोई हक नहीं है। कहते हैं कि यहीं से उसकी भूख बढ़ गई। अब वो जल्द से जल्द हिन्द को हथिया कर विश्व विजेता का तमगा हासिल करना चाहता था। सिकंदर को भारत में घुसने से पहले काफ़ी संघर्ष करना पड़ा और जन-धन की हानि उठानी पड़ी। सिकंदर विश्व विजय के लिए निकला था, लेकिन ये उसके लिए आसान नहीं था।”

सिकंदर ने जब भारत पर चढ़ाई की तो तक्षशिला और अभिसार के राजाओं ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार ली। इसके बाद राजा पोरस का राज्य था, जिसने सिकंदर की अधिपत्यता स्वीकारने से मना कर दिया। राजा पोरस द्वारा सिकंदर की अधीनता न स्वीकारने पर दोनों की सेना में युद्ध होना निश्चित था। इसके बाद सिकंदर ने पोरस को हराने के लिए सेना तैयार किया जिसमें उसकी मदद तक्षशिला नरेश आम्भी ने की जो पोरस को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता था। सिकंदर ने आम्भी को अपनी सेना में लाकर झेलम नदी पार की और युद्ध के लिए आगे बढ़ा क्यों कि झेलम को पार किये बगैर राजा पोरस के राज्य में दाखिल होना नामुमकिन था। सिकंदर जानता था कि पोरस जैसे पराक्रमी राजा को हराना इतना आसान नहीं है। इसलिए उसने चालाकी से काम लिया। झेलम नदी के किनारे पर उसने अपनी सेना खड़ी कर दी और ऐसा दिखावा करने लगा कि मानो वे लोग नदी पार करने का रास्ता ढूंढ रहे हों। कई दिन इस तरह बीत जाने पर पोरस के पहरेदार कुछ कम चौकन्ने हो गए।

इसी बीच सिकंदर नदी की दिशा में करीब 17 मील ऊपर जाकर हज़ारों सैनिकों और घुड़सवारों के साथ नदी पार कर गया। उधर राजा पोरस की सेना अभी भी यही मान रही थी कि सिकंदर नदी पार करने का रास्ता ढूंढ रहा है जब कि सिकन्दर दूसरी ओर से खुद उनके समीप पहुँच चुका था। सिकंदर के 60000 सैनिक अब पोरस के राज्य में घुस गए, जिसके बाद भयंकर युद्ध की शुरुआत हुई। इस युद्ध में पहले ही दिन सिकंदर को पोरस के पराक्रम का एहसास हो गया क्यों कि पोरस की सेना के पास बलशाली गजसेना के साथ अद्भुत हथियार भी सम्मिलित थे जिनका जवाब यूनानी सेना के पास नहीं था। राजा पोरस की सेना के पास एक ऐसा भी अस्त्र था जिससे एक ही सैनिक कई शत्रु सैनिकों और घुड़सवार सैनिकों को मार सकते थे।

युद्ध में सिकंदर की सेना को बहुत नुक्सान पहुंचा, हालांकि पोरस के सैनिक भी हताहत हुए एवं वीरगति को प्राप्त हुए। इसी बीच तेज़ बारिश ने सिकंदर की मुश्किलें बढ़ा दी। वो अपने घोड़े को तेजगति से भगाने में अक्षम हो रहा था, तभी राजा पोरस के भाई अमर ने अपने युद्ध कौशल से सिकंदर के घोड़े भवक्पाली (bukifilus) का वध कर दिया और सिकंदर को युद्धभूमि पर गिरा दिया। सिकंदर अपनी मृत्यु से क्षनिक दूर था, उसे राजा पोरस के हाथों की कृपान में अपना काल दिख रहा था। तभी सिकंदर के अंगरक्षकों ने एक किस्म का पदार्थ जमीन पर बिखेर दिया जिससे निकले गन्ध ने राजा पोरस को भ्रमित कर दिया। इस परिस्थिति का फ़ायदा उठाकर सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहाँ से ले गए। अपनी मौत को इतने सामने से देखने बाद सिकंदर बुरी तरह से डर गया था, हालांकि वो चाहता था कि उसके सैनिक पोरस को हराने के लिए उसके साथ रुकें। लेकिन महीनों से युद्ध लड़ते हुए सैनिक थक चुके थे, साथ ही उन्हें अब अपने देश यूनान की याद आ रही थी इसलिए उन सैनिकों ने सिकंदर की बातों को मानने से इनकार कर दिया। इतिहासकार कहते हैं कि सिकंदर ने सैनिकों पर रुकने के लिए ज़ोर भी नहीं दिया, सम्भवतः ऐसा करने पर उसे विद्रोह की आशंका थी। मन मसोसकर सिकंदर यूनान की ओर लौट गया, जहां 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन के पास ही किसी बीमारी से उसकी मृत्यु हो गई।

*✍️ ● सिकंदर-पोरस युद्ध को अलग तरीके से पेश किया यूनानियों ने*

हम सिकंदर-पोरस के बारे में जो कुछ भी आज जानते हैं वो यूनानियों द्वारा लिखित इतिहास है। जिसमें उन्होंने सिकंदर एवं अपने देश को महान बताने के लिए कहानियां गढ़ी है। उन्होंने लिखा है कि सिकंदर विश्व विजेता बनने के लिए मकदूनिया से निकला था, इसके बाद उसने बड़े-बड़े राजाओं को अपने समक्ष झुकने पर मज़बूर कर दिया। और जिन्होंने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की उसे सिकंदर ने युद्ध में परास्त किया। लेकिन फ़ारसी इतिहासकार इसका पूरी तरह से खंडन करते हैं। फ़ारसी इतिहासकार लिखते हैं कि सिकंदर को बेवजह ही महान बनाया गया है जबकि उसमें महान बनने के लिए कोई असाधारण गुण मौजूद नहीं था। फ़ारसी कृति ‘शाहनामा’ में सिकंदर को एस्कंदर-ए-मक्दुनी (मॅसेडोनिया का अलेक्ज़ेंडर, एस्कन्दर का अपभ्रंश सिकन्दर है) कहा गया है। जहां उसे एक क्रूर सनकी राजकुमार से अधिक महत्ता नहीं दी गई है। जिस विश्व विजय का वो सपना लेकर निकला था, उसे तो उस विश्व के बारे में जानकारी भी नहीं थी। वो तो समझता था कि फारस का सम्राज्य जीतकर ही वो विश्व विजेता बन जायेगा।(फारस का सम्राज्य मकदूनिया से 40 गुना अधिक बड़ा था, एवं शक्तिशाली एवं सम्पन्न था।) यूनानी इतिहासकार लिखते हैं कि अपनी मृत्यु तक सिकंदर ने विश्व के आधे से अधिक भूमि पर विजय हासिल कर लिया था। लेकिन सत्य ये है की वह पृथ्वी के मात्र 5 प्रतिशत हिस्से को ही जीत पाया था, क्योंकि प्राचीन यूनानियों को धरती के भौगोलिक क्षेत्र के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। कई यूनानी लेखों में तो फारस की खाड़ी को धरती का छोड़ बताया गया है, जिसके उधर एक दूसरी दुनियां मौजूद है।

सिकंदर और पोरस के बीच हुए युद्ध को यूनानी ‘Battle of the Hydaspes’ कहते हैं। यह युद्‍ध मई 326 ईसा पूर्व में लड़ा गया था। सिकंदर की सेना में 50 हजार पैदल सैनिक, 7 हजार घुड़सवार थे तो वहीं पोरस के पास 20 हजार पैदल सैनिक, 4 हजार घुड़सवार, 4 हजार रथ और 130 हाथी थे। सिकंदर अपने चुने हुए 11 हजार आम्भी की सेना भारतीय और सिकंदर की सेना के यूनानी सैनिकों को लेकर झेलम की ओर चला था। इस युद्ध में पोरस ने पराक्रम दिखाया लेकिन वो सिकंदर के सामने टिक नहीं पाया और अंततः उसे हार का सामना करना पड़ा। यूनानियों ने इसपर एक और कहानी गढ़ी जिसे सत्य माना जाता है। उन्होंने लिखा है कि युद्ध हारने के बाद पोरस को सिकंदर के समक्ष पेश किया गया। जहाँ सिकंदर ने पोरस से सवाल किया कि तुम्हारे साथ कैसा बर्ताव किया जाए। इस सवाल के जवाब में पोरस ने बड़े आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ कहा कि ठीक वैसा ही, जैसा कि एक शासक दूसरे शासक के साथ करता है।

👉 सिकंदर को पोरस का आत्मविश्वास से भरा जवाब पसंद आया और उसके बाद सिकंदर ने खुश होकर पोरस को उसका राज्य वापस कर दिया। राज्य लौटाने के बाद सिकंदर ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सेनापति सेल्युकस निकेटर को नियुक्त कर दिया और स्वयं सैनिकों को लेकर मकदूनिया की ओर निकल गया, जहां बेबीलोन के पास किसी बीमारी की चपेट में आकर 32 वर्ष की आयु में सिकंदर की मृत्यु हो गई।

*✍️ ● निष्पक्ष इतिहासकारों की दृष्टि से सिकंदर-पोरस युद्ध का परिणाम*

तक्षशिला एवं अभिसार हासिल करने के बाद राजा पुरु के शत्रु लालची आम्भी की सेना लेकर सिकंदर ने झेलम पार कर लिया। लेकिन इधर राजा पुरु पहले से आक्रमण के लिए तैयार थे। राजा पुरु जिसे स्वयं यवनी( यूनानी) 7 फुट से ऊपर का बताते अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े। पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे थे। सिकंदर और उसके सैनिकों ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी। इतिहासकार लिखते हैं कि भारत के पास विदेशी को मार भगाने की हर नागरिक के हठ, शक्तिशाली गजसेना के अलावा कुछ अनदेखे हथियार भी थे जैसे सातफुटा भाला जिससे एक ही सैनिक कई-कई शत्रु सैनिकों और घोड़े सहित घुड़सवार सैनिकों को भी मार गिरा सकता था। इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली। सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए। यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया। कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है। राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर को युद्धभूमि में घुसते देखा और आगे से घेरकर उसके घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया। कहते हैं कि ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी ऐसा होते हुए नहीं देखा था।

इतिहास को निष्पक्ष तौर पर पेश करने वाले यूनानी प्लूटार्क ने अपने लेख में लिखा है कि उस दिन सिकंदर एवं उनकी सेना ने लगभग 8 घन्टे तक पोरस की सेना से भीषण युद्ध किया लेकिन नियति ने उस दिन उनका साथ नहीं दिया। प्लूटार्क के इस कथन से उन प्राचीन यूनानी लेखों का खंडन होता है जिनमें सिकंदर को महान बताया गया था। वहीं भारत के कई इतिहासकारों का मानना है कि इस युद्ध में राजा पोरस की विजय हुई थी। चूंकि सिकंदर की सेना भारत आने से पहले युद्ध लड़कर थक गई थी। इसके साथ ही जब सिकंदर भारत आया तो वो पोरस की सेना को देखकर दंग रह गया, उसने लड़ाई लड़ी लेकिन वो परास्त हो गया और अंततः सैनिकों के दबाव में उसे वापस लौटना पड़ा। इसके अलावा विशाखदत्त द्वारा रचित मुद्राराक्षस में पश्चिमी भारत के प्रतापी राजा प्रवर्तक नामक का उल्लेख आता है जिसने आचार्य चाणक्य की मदद से विदेशी आक्रमण को रोका था। इसके बाद राजा प्रवर्तक ने धनानंद के साम्राज्य को खत्म कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना करने में आचार्य चाणक्य के शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य की मदद की। कहते हैं कि राजा प्रवर्तक कोई और नहीं राजा पोरस ही थे, जिन्हें अलग अलग नामों से जाना जाता है। लेकिन इन सबमें राजा पोरस की मृत्यु के विषय में भी ज्यादा कुछ ज्ञात नहीं है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार सिकंदर के सेनापति युदोमोस ने ही राजा पोरस की हत्या की थी परन्तु इस बात के कोई पुख्ता स्त्रोत नहीं है। कुछ इतिहासकारों में मत तो यह भी हैं कि आचार्य चाणक्य ने ही विषकन्या के द्वारा पोरस की हत्या करवाई थी क्यों कि चन्द्रगुप्त के साम्राज्य विस्तार में बाधक बन सकते थे। जबकि अन्य इतिहासकारों के अनुसार 315 ईसा पूर्व के आसपास राजा पोरस अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हुए।

*टिप्पणी* : इतिहास में वर्णित घटनाओं में सिकंदर-पोरस युद्ध सबसे अधिक विवादास्पद है क्यों कि इसके बारे में जो कुछ भी हमें पता है वो एक कहानी के तौर पर गढ़ा गया है। किंतु इस कहानी को लोग सत्य ही मानते हैं। हम सिकंदर के विजय को कहानी इसलिए कह रहे हैं क्यों कि वो सब लिखा गया था सिकंदर के साथ चलने वाले उसके दरबारी लेखकों द्वारा। इसमें कोई शंका नहीं है कि वो अपने राजा को बड़ा दिखाने के लिए बढ़ा-चढ़ा कर ही लिखेंगे। उन चाटूकारों ने ऐसा ही किया और जो कुछ भी सिकंदर के युद्ध अभियान में लिखा, उसे सिकंदर की मृत्यु के तुरंत बाद मकदूनिया भेज दिया। जहाँ उन लेखों में और बातों को जोड़कर इतिहास के रूप में पेश किया गया। सिकंदर की मृत्यु के 500 साल बाद तक ये इतिहास मकदूनिया के लोगों के अलावा विश्व में भी फैलने लगा था। जिसे आगे चलकर पश्चिमी देशों द्वारा सत्यापित कर दिया गया और इस तरह हारा हुआ सिकंदर विश्व विजेता बन गया और विजयी राजा पोरस को एक पराजित योद्धा के रूप में पेश किया गया। हमारे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि नालन्दा विश्वविद्यालय में मुस्लिम आक्रान्ता बख्तियार ख़िलजी ने आग लगा दी और हमारे देश का बहुमुल्य इतिहास उसमें जलकर राख हो गया। वरना आज हम प्रमाण के साथ कह सकते थे कि राजा पोरस कितने महान थे, जिन्होंने सिकंदर को हरा उसे उसके देश वापस लौटने पर विवश कर दिया।

*वन्देमातरम्*
*भारत माता की जय*
🙏🚩🇮🇳🔱🏹🐚🕉️

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