शपथ समारोह के आमंत्रण में कूटनीति

नरेन्द्र देवांगन

नरेंद्र मोदी ने पड़ोस के सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों/सरकार प्रमुखों को अपने शपथ समारोह में आने का निमंत्रण भेजा है। ऐसा न्योता भारत की ओर से पहली बार गया है। कुछ राष्ट्राध्यक्षों ने कार्यक्रम में आने की स्वीकृति भेज दी है और कुछ अभी कूटनीतिक विचार-विमर्श में जुटे हैं। मोदी की यह सामान्य पहल है, या इसके कोई गहरे मायने हैं? अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति में माहौल का अपना महत्व होता है। दो देशों के नेताओं की आपसी केमिस्ट्री भी उतना ही मायने रखती है। ये दोनों अनुकूल हों, तो अक्सर आपसी रिश्तों में पड़ी गांठों के खुलने का रास्ता निकल आता है। इसीलिए ये उम्मीद पैदा हुई है कि नवनियुक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क के सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करना दीर्घकालिक महत्व की पहल साबित हो सकती है।

नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रहित को देखकर ही कदम उठाया है। भारत के उसके निकट पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक-सामाजिक रिश्ते हैं, जो निभाने चाहिए। नरेंद्र मोदी ने अमरीका या चीन को तो कोई न्योता नहीं भेजा है। सिर्फ पड़ोसियों को ही तो बुलाया है। जिनका हमसे पुराना संबंध रहा है। अगर इस तरह ही हमारे आपसी रिश्ते मधुर हो जाएं तो हमारी सुरक्षा के लिए ही बेहतर होगा। और गौरतलब बात यह है कि शपथ ग्रहण समारोह सिर्फ एक कार्यक्रम है, यह कोई पारस्परिक मुलाकात नहीं है। शपथ समारोह में सभी 8 सार्क देशों को बुलाया गया है, जिसमें पाकिस्तान और श्रीलंका को बुलाने पर बवाल हो रहा है। लेकिन हमें समझना चाहिए कि ये एक रस्मी समारोह है, जिसमें हम सार्क संगठन को बुला रहे हैं, अब इसमें जितने भी देश होंगे, उन्हें जाहिर तौर पर निमंत्रण भेजना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि हम छह या सात देषों को बुलाएं और बाकियों को आमंत्रित न करें।

इस कदम से मोदी ने साफ किया है कि उनकी विदेष नीति संबंधी प्राथमिकताओं में पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्ते बनाना सर्वप्रमुख है। इससे नेपाल, भूटान और मालदीव जैसे देशों में नया भरोसा पैदा होगा, जिनके साथ भारत का कोई गंभीर विवाद नहीं है। अफगानिस्तान में इससे संदेश जाएगा कि वहां पुनर्निर्माण और सुरक्षा संबंधी गतिविधियों केे प्रति भारत की वचनबद्धता नई सरकार के कार्यकाल में भी बनी रहेगी। नरेंद्र मोदी एक तरह से दुनिया को संदेश देना चाहते हैं कि वे भविष्य में अपने पड़ोसियों को साथ लेकर चलना चाहते हैं।

बड़ा फर्क श्रीलंका से रिश्तों में पड़ सकता है। ये यूं ही नहीं है कि जिन नेताओं ने मोदी के न्योते पर तत्परता से सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई, उनमें श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे भी हैं। मोदी के हक में स्थिति यह है कि उनकी सरकार तमिलनाडु की किसी पार्टी के समर्थन पर निर्भर नहीं है। श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर इस राज्य की पार्टियों में जारी प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति से द्रमुक के समर्थन पर टिकी निवर्तमान सरकार की नीति प्रभावित हुई थी। उसका खराब असर दोनों देशों के रिश्तों पर पड़ा। बहरहाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मोर्चों पर हालात ज्यादा उलझे हुए हैं। बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल बंटवारे और बस्तियों की अदला-बदली का समझौता कार्यरूप नहीं ले सका, तो इसका कारण ममता बनर्जी के साथ-साथ भाजपा का विरोध भी था। क्या अब ममता झुकेंगी? क्या भाजपा अपना नजरिया बदलेगी? या वह अपने नजरिए के बारे में बांग्लादेश सरकार को समझाने में सफल होगी? आगे बांग्लादेश से भारत के रिश्ते क्या मोड़ लेते हैं, यह इन सवालों के जवाब पर निर्भर करेगा। पाकिस्तान का मामला सबसे अलग है। उसके मामले में प्रतीकात्मक प्रयास ज्यादा कारगर नहीं होते। अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा और फिर जनरल मुशर्रफ को आगरा आमंत्रित कर दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने की कोशिश की थी। मगर बात नहीं बनी तो इसलिए कि कश्मीर और सीमा पार आतंकवाद की समस्याएं केवल सदिच्छा से हल नहीं हो सकतीं। इसके लिए दोनों देशों में समान इच्छाशक्ति और यथार्थवादी समझ चाहिए। पाकिस्तान में भारत के विरोध में अपने वजूद को परिभाषित करने और विभाजन का कथित अधूरा एजेंडा पूरा करने की मानसिकता जब तक कमजोर नहीं पड़ती, आपसी रिश्तों की राह पथरीली बनी रहेगी। शरीफ अगर भारत के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं तो उन्हें मजबूत कदम उठाना होगा। शरीफ ने कहा भी था कि वे भारत के साथ व्यापार करना चाहते हैं। अगर दोनों देशों को आगे जाना है तो शरीफ को मोदी के निमंत्रण पर भारत आना चाहिए। यह उनके लिए भी एक किस्म का बोनस ही होगा। उधर मोदी ने पहले से ही साफ कर दिया था कि व्यापार और लोगों के आपसी संबंध अच्छी बात है, लेकिन बम और गोलियों के बीच बातचीत नहीं हो सकती है। इसलिए उनका संकेत साफ है कि शरीफ भी आतंकवादियों का समर्थन छोड़ें।

आज सार्क के लगभग सभी देश विकास की साझी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। यह दुनिया के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है जहां संपर्क का अभाव है। ऐसे में यदि यह क्षेत्र एकजुट रहता है तो विकास की संभावनाएं बढ़ेगी। मोदी के शपथ समारोह में जितने भी राष्ट्राध्यक्ष आ रहे हैं, उनके भी अपने हित भारत के साथ जुड़े हुए हैं।

भारत उभरती हुई आर्थिक शक्ति है। भारत विदेशी सामानों का एक बड़ा बाजार है। ऐसे में भारत के पड़ोसी देश अपने संबंध हमसे बेहतर बनाना चाहते हैं। दरअसल, आर्थिक विकास के लिए स्थिर विदेश नीति जरूरी है और जिसके लिए भारत की सॉफ्ट स्टेट वाली छवि को तोडऩा होगा।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
hititbet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano