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आर्थिकी/व्यापार

भारत की आर्थिक समृद्धि का स्वरूप, भाग — 2

 

*भारत के महान व्यापारी*

भारत के सौदागरों (व्यापारियों) के बारे में उनकी सम्पदा और उनके प्रतिष्ठित व्यापार के बारे में यूरोपीय कम्पनियों ने जो विवरण दिए हैं, उनमें भी इस विषय में भरपूर प्रकाश पड़ता है। ‘ये व्यापारी विशाल तादाद में व्यापार करने में सक्षम थे। यूरोपीय कम्पनियों का इनसे ही मुकाबला था।Ó ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के अभिलेखों में भारत के महान व्यापारियों के अनेक उल्लेख एवं संदर्भ हैं। उदाहरणार्थ- दक्षिण भारतीय व्यापारी कसा वीरोना और सूरत के वीरजी वोरा का, ‘जिनकी प्रतिष्ठा दंतकथाओं का विषय बन चुकी हैं, ‘1936 में वीर जी वोरा की आर्थिक शक्ति ऐसी प्रबल थी कि इंग्लिश काउंसिल यह मानने को विवश हो गई कि यदि वीरजी वोरा किसी खास श्रेणी का व्यापार स्वयं करना तय करते हैं, तो सूरत का कोई भी अन्य व्यापारी उनके मुकाबले में खड़े होने का साहस नहीं करेगा। यहाँ तक कि कम्पनी के भारत स्थित दलाल ने भी कम्पनी के माल भारत आयातित करने के लिए वोरा के सिवाय कोई अन्य ग्राहक इंग्लैंड की फैक्टरी में लेकर आने से इनकार कर दिया यद्यपि वह दलाल वीर जी वोरा की सद्भावना का मोहताज नहीं था। दो साल पहले, बढिय़ा किस्म के मूँगा (प्रवाल) को कम्पनी वालों ने वीरजी वोरा को न बेचकर एक अन्य सौदागर को बेचा क्योंकि फैक्टरी चाहती थी कि इस तरह से महान व्यापारी वीर जी वोरा का बाजार से एकाधिपत्य तोडऩे में मदद मिलेगी। परन्तु वह सौदागर उन मँूगों को ले ही नहीं गया। माल कम्पनी के गोदाम में पड़ा रहा।Ó ऐसे दिग्गज व्यापारी देश में भरे पड़े थे।
एक अंग्रेज एलेग्जेंडर हेमिल्टन जो सूरत के व्यापारियों के बारे में जानकारी रखते थे, वहाँ के एक बड़े सौदागर का उल्लेख करते हैं, ‘जिनका मुख्यालय किसी बड़े निर्यात-केन्द्र में या देश के किसी बड़े वाणिज्य-केन्द्र में था और जिसके एजेन्टों और डीलरों का ‘नेटवर्कÓ विराट था जिससे कि वह दूर-दूर तक के उत्पादकों तक पहुँच सकता था। वह अर्थपति ‘एक बिल्कुल अलग ही वर्ग का था।Ó हेमिल्टन का संकेत अब्दुल गफूर की तरफ हैÓ, ‘जो इंग्लिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के कुल व्यापार के बराबर का व्यापार करता था। मैं उसे साल भर से अच्छी तरह जान रहा हूँ। उसके अपने 20 से ज्यादा समुद्रीय जहाज हैं, जो 300 से 800 टन तक का। माल वहन करने की सामथ्र्य वाले हैं। उनमें से हर एक में 10,000 पौंड से अधिक का स्टाक रहता है। वह सारा स्टाक विदेश भेजने के बाद, वह देश के भीतर भी आगामी वर्ष के बाजार-व्यापार के लिए अपने पास इससे भी कहीं ज्यादा स्टाक जमा रखना जरूरी मानता था।Ó अब्दुल गफूर का खानदान 18वीं शती ईस्वी के मध्य तक फलता-फूलता रहा।
जिन अन्य बड़े व्यापारियों के नाम के उल्लेख कम्पनी अभिलेखों में मिलते हैं, वे हैं- सूरत के अहमद चेलानी, बंगाल में आर्मेनियाई मूल के खोजा सरहद और खोजा वाजिद, कोरोमंडल समुद्रतट के संघाराम चेट्टी और ‘विश्वविख्यात सौदागरÓ जगत सेठ, जो एक ही हुंडी से बंगाल का समस्त राजस्व दिल्ली हस्तांतरित कर सकते थे।
यूरोपीय सौदागरों की बहियों और टिप्पणियों में उल्लिखित ये छिटपुट सन्दर्भ भी सम्मोहक हैं, क्योंकि इनसे अनुमान होता है कि देशभर में विविध व्यापार-वाणिज्य केन्द्रों में और भी बड़े- बड़े व्यापारिक घराने रहे होंगे तथा एशिया में अन्य देशों में भी ऐसे ही सम्पन्न घराने होंगे। जॉन हेनरी ग्रोज 18वीं शती ई. के मध्य में सूरत गया था। वहाँ ‘उसने धीर प्रशांत हिन्दू सौदागर देखे, जिनमें से एक-एक अकेले ही किसी यूरोपीय जहाज का सारा माल आधे घंटे के भीतर मोल-तोल के बाद, खड़े-खड़े खरीद लेते थे और तुरन्द नगद भुगतान कर देते थे। व्यापार की दुनिया में, इतनी बड़ी धनराशि के नगद भुगतान की क्षमता रखने या माल के बड़े भंडार की खरीदी कर तत्काल भुगतान की क्षमता रखने का मतलब बहुत कुछ होता है। मोचा स्थित इंग्लिश फैक्टरी के अभिलेख बताते हैं कि 1735 ई. में कुल 42 व्यापारी कम्पनी को कॉफी की आपूर्ति कर रहे थे, जिनमें से 5 व्यापारी ही कुल आपूर्ति का 66 प्रतिशत ‘सप्लाईÓ कर रहे थे। यमन के कॉफी -व्यापार पर वस्तुत: ‘कुलीनतंत्रीय व्यापारियोंÓ का एक समूह छाया हुआ था। वीर जी वोरा और चिन्नन चेट्टी जैसे कतिपय हिन्दू-व्यापारी बड़े-बड़े वाणिज्य-पोत रखते थे तथा एशिया भर में विविध देशों में उनका कारोबार चलता था। होल्डेन फर्बर बताते हैं कि भारतीय सौदागर और व्यापारी रूस जैसे दूरस्थ देशों तक के बाजार में कारोबार करते थे। ‘भारतीय व्यापारी वोल्गा नदी घाटी क्षेत्र में 1625 में भी अपना कारोबार करते दिखते हैं। सुतूर नामक एक भारतीय सौदागर 1647 ई. में अस्त्रखान से मास्को पहुँचा था। अस्त्रखान में कई भारतीय सौदागरों ने पहले ही अपना कारोबार जमा रखा था। 1650 में रूसी बाजार में 23 किस्म की भारतीय वस्तुएँ उपलब्ध थीं।
ऐसे थे उस समय के भारतीय व्यापारी एवं अर्थपति- जो प्रचुर साधन-सम्पन्न थे तथा आवश्यकतानुसार शक्तिशाली राज्यसत्ता को भी प्रभावित कर सकते थे। प्रभावशाली व्यापारी अब्दुल गफूर के बारे में एक उल्लेख यह मिलता है कि ‘उसने सूरत के सौदागरों को इकट्ठा कर स्थानीय मुगल हुकूमत पर संयुक्त दबाव बनाया कि वह डचों से सख्ती से पेश आए, ताकि डच लोग सूरत के जहाज मालिक व्यापारियों को यूरोपीय लुटेरों द्वारा पहुँचाई गई हानि का हर्जाना देने की शर्त पर ईमानदारी से अमल करें।Ó कई भारतीय व्यापारी अपने ही जहाजों से समुद्रपारीय व्यापार करते थे और अभिजनों तथा प्रशासनतंत्र को ऋण देने का साहूकारी का कार्य भी करते थे। उनसे निचली श्रेणी में वे व्यापारी थे जो अपने जहाज प्राय: नहीं रखते थे, परन्तु देश में और विदेशों में अनेक स्थलों पर अपने एजेन्ट रखते थे तथा व्यापार के एक विस्तृत ‘नेटवर्कÓ का वित्तपोषण करते थे जो दूर-दूर तक फैले केन्द्रों से जुड़ा होता था। जैसे आगरा से यमन बन्दरगाह या फारस की खाड़ी तक। सूरत के बड़े ब्रोकर्स के एजेंट इन सभी जगहों में होते थे और हुंडियाँ जारी करते तथा उनका भुगतान करते थे एवं व्यापारिक गुप्तचरी भी सुलभ कराते थे।
मुद्दे की बात यह है कि ऐसे भारतीय दिग्गज व्यापरियों- सौदागरों के होने से यूरोपीय कम्पनियों के सौदागरों पर लगाम रहती थी। फर्बर उन दो कारणों का स्पष्ट उल्लेख करते हैं, जिनके कारण बंगाल में ब्रिटिश विस्तार असीमित नहीं हो पाया। पहला यह कि बंगाल प्रांत लगातार असाधारण योग्य वायसरायों द्वारा शासित रहा, दूसरा कारण था बंगाल के सेठों का धनाढ्य खानदान, जिसके मुखिया उन दिनों थे जगत सेठ। वायसरायों ने ‘दस्तकोंÓ के अंग्रेजों द्वारा उपयोग को दृढ़ता से नियमित रखा। सेठों ने बंगाल की मुद्रा पर नियंत्रण बनाये रखा जिससे कलकत्ता में टकसाल स्थापित करने का इंग्लिश कम्पनी का मनोरथ विफल रहा, हालांकि लंदन से जहाँ 1713 ई. के आसपास 75,000 पौंड मूल्य की चाँदी प्रति वर्ष आ रही थी, वहीं 1743 ई. के आसपास 1,00,000 पौंड मूल्य तक की चाँदी प्रतिवर्ष आने लगी।
*एशियाई व्यापार में यूरोप का हिस्सा*
इन यूरोपीय कम्पनियों द्वारा नियमित लिखी गई पंजिकाओं से प्रकट है कि आरम्भिक तीन सौ वर्षों (16वीं, 17वीं, 18वीं शताब्दी ई.) तक एशियाई व्यापार में यूरोपीय हिस्सा नगण्य यानी नाममात्र का रहा। हम पाते हैं कि कम्पनी के कर्मचारी-अधिकारी अपनी-अपनी सरकारों को बार-बार लिख रहे हैं कि भारत में उनकी हैसियत बढ़ नहीं रही है, स्थितियाँ प्रतिकूल हैं।
वीर जी वोरा जैसे अनेकानेक दिग्गज भारतीय व्यापारी सक्रिय थे, जिनसे पार पाना कम्पनी के लिए कठिन था। यद्यपि अपनी आरम्भिक हालत से तुलना करने पर कम्पनी के व्यापारी पाते थे कि उनका मुनाफा बहुत अधिक हो रहा है, क्योंकि लागत-पूँजी तो उन्होंने बेहद कम ही लगाई थी। तथापि, कुल भारतीय व्यापार में ईस्ट इंडिया कम्पनी का हिस्सा नगण्य था। जो भारतीय व्यापारी सागर पार दूर-दूर देशों तक जा कर व्यापार कर रहे थे, उनके व्यापार पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव डाल पाने में कम्पनी अक्षम थी। यह अलग बात है कि बंगाल में कम्पनी ने जहाँ से शुरुआत की थी, उस तुलना में उसका हिस्सा काफी बढ़ गया था। ‘यूरोपीय प्रतिभागियों द्वारा भारतीय व्यापार में लाया गया यह परिवर्तन, भारत के विदेशी व्यापार की दिशा, संरचना और नियंत्रण से सम्बन्धित परिवर्तन था। परन्तु शेष भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव अत्यंत सीमित ही रहा। इन यूरोपीय कम्पनियों के अभिलेख ‘इसका प्रचुर साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि भारत के साथ उनके व्यापार की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी,…. तथापि इस व्यापार का भारतीय क्षेत्र की कुल वाणिज्यिक-व्यापारिक गतिशीलता पर जो प्रभाव था, वह आनुपातिक दृष्टि से थोड़ा ही था। इंग्लिश कम्पनी की राजनैतिक सत्ता स्थापित होने से पूर्व तक यह अनुपात कभी भी ज्यादा हुआ हो, इसमें शंका ही है। 1753 ईस्वी तक स्थिति यह थी कि ढाका से वस्त्रों का जो निर्यात प्रतिवर्ष हो रहा था, उसका एक तिहाई हिस्सा ही यूरोपीय व्यापारी खरीद रहे थे, शेष दो तिहाई हिस्सा वस्त्र-व्यापार भारत तथा विश्व के अन्य हिस्सों के व्यापारी विदेशों में कर रहे थे। दूसरी ओर, डचों के मसाला-व्यापार के फलस्वरूप भारत के अपने वस्त्र-व्यापार में भी उछाल आई और दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय निर्यात व्यापार लगातार बढ़ता ही गया ……..क्रमशः
कल बात करेंगे राज्य की भूमिका और प्राचीन भारतीय नौसेना की..
✍🏻साभार – भारतीय धरोहर पत्रिका

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