Categories
स्वास्थ्य

आयुर्वेद का बहु उपयोगी द्रव्य कालमेघ

 

दीप नारायण पांडे

आयुर्वेद की एंटीवायरल औषधियां जिन पर इन वाइवो, इन वाइट्रो, और क्लिनिकल अध्ययन हो चुके हैं वे कोरोना जैसे तमाम प्रकार के वायरल रोगों से बचे रहने के लिये मददगार हैं। विभिन्न शोधों में कालमेघ, चिरायता, तुलसी, शुंठी या सोंठ, वासा, शिग्रू या सहजन, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची, हरिद्रा, यष्टिमधु, बिभीतकी, आमलकी, अश्वगंधा, हरीतकी, मुस्ता, पाठा, पुनर्नवा, लहसुन, शरपुन्खा, कुटज, शल्लकी, पुदीना, त्रिकटु, त्रिफला आदि एंटीवायरल सिद्ध हो चुके हैं। इनमें कालमेघ, हल्दी, गुडूची, अश्वगंधा आदि भी ओसेल्टामिविर व जानामिविर की तरह न्यूरामिनीडेज इनहिबिटर होने से ठोस एंटीवायरल की तरह काम करते हैं। इसमें से आज की चर्चा कालमेघ पर है।

कालमेघ के एंटीवायरल गुणों पर वर्ष 2020 तक 283 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इसके पूर्व भी जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल एंड कोम्प्लिमेंटरी मेडिसिन में अक्टूबर 2019 में प्रकाशित एक शोध स्पष्ट करता है कि कालमेघ का एक्सट्रैक्ट या घन क्लेबसिएला निमोनिये नामक खतरनाक बैक्टीरिया के मल्टीड्रग प्रतिरोधी उपभेदों में बायोफिल्म निर्माण को रोक देता है। नोसोकोमियल संक्रमण (हॉस्पिटल में जाने से लगने वाले इन्फेक्शन) दुनिया भर में एक बड़ी चुनौती हैं और क्लेबसिएला निमोनिये के बहु-औषधीय प्रतिरोधी उपभेद इसके प्रमुख कारकों में से एक है। समकालीन विश्व में क्लेबसिएला निमोनिये के हाइपरविरुलेंट और दवा प्रतिरोधी उपभेद तेजी से फैल रहे हैं जो रुग्णता और मृत्यु दर बढऩे का कारण बनते हैं। हालांकि यह पहला अध्ययन नहीं है, किन्तु मल्टीड्रग रेजिस्टेंस के कारण एंटीबायोटिक के निष्प्रभावी हो जाने की गंभीर वैश्विक समस्या को हल करने की दिशा में एक और कदम हो सकता है। इसके साथ ही वर्ष 2019 में जर्नल ऑफ आयुर्वेदा एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन में प्रकाशित इन-वाइट्रो अध्ययन के परिणामों से स्पष्ट हुआ है कि कालमेघ नामक औषधीय पादप चिकनगुनिया और डेंगू वायरस के विरुद्ध प्रभावी है। वर्ष 2020 तक कालमेघ पर 2000 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें विविध प्रकार के वायरस के विरूद्ध कालमेघ के प्रभाव और उपयोग के संकेत मिलते हैं।

पारंपरिक रूप से कालमेघ का लगभग 26 आयुर्वेदिक योगों में सदियों से उपयोग होता आया है। परन्तु आधुनिक शोध के बाद अब 200 से अधिक दवाओं में दुनिया भर में इसका उपयोग हो रहा है। भारत में कालमेघ पर वैद्यों के विशाल अनुभव तो हैं, पर तथाकथित आधुनिक क्लिनिकल ट्रायल कम हैं। तथापि, पश्चिमी जगत के अनेक वैज्ञानिकों द्वारा कालमेघ पर विविध बीमारियों में एकल औषधि के रूप में, या अन्य औषधियों के साथ मिलाकर बनाये योगों के रूप में, इंसानों पर किये गये 125 से अधिक क्लीनिकल ट्रायल छापे जा चुके हैं।

कालमेघ पर भारत से ज्यादा शोध विदेशों में हो रहे हैं। इन शोध परिणामों में पाया गया है कि कालमेघ एन्टीवायरल, एन्टीबैक्टीरियल, एन्टी मैलेरियल, कार्डियो प्रोटेक्टिव, एन्टीमाइक्रोबियल, एन्टीडायरियल, एन्टीकैंसर, एन्टीइन्फ्लेमेटरी, एन्टी पैरासाइटिक, एन्टीस्पाजमोडिक, एन्टीडायबेटिक, एन्टीकार्सिनोजेनिक, निमेटोसाइडल, एन्टी प्रोटोजोअन, हिपेटोप्रोटेक्टिव, एन्टीहेपेटाइटिस, एन्टी एचआईवी, एन्टी हाइपरग्लायसीमिक, इम्यूनोस्टिम्युलेटरी, एन्टीऑक्सीडेण्ट है तथा यौन समस्याओं में भी सुधार करता है। एक व्यवस्थित विश्लेषण में कालमेघ में पाए जाने वाले द्रव्य को कैंसर के उपचार में आशाजनक रूप से उपयोगी पाया गया है। कालमेघ सिलिका के कारण होने वाली पल्मोनरी फाइब्रोसिस के विरुद्ध प्रभावी है। कालमेघ इंटरवर्टिब्रल डिस्क डिजेनरेशन रोकने में प्रभावी पाया गया है। कालमेघ में पाया जाने वाला द्रव्य एण्ड्रोग्रेफलॉईड, पार्किंसंस रोग, मल्टीपल स्केलेरोसिस और सर्जरी या मधुमेह-प्रेरित संज्ञानात्मक हानि की शुरुआत और बढ़त को रोकने में उपयोगी पाया गया है। एण्ड्रोग्रेफलॉईड चिंता और अवसाद जैसे मनोरोग संबंधी विकारों के विरुद्ध प्रभावी औषधि के रूप में प्रयुक्त हो सकता है।

आयुर्वेद में प्राय: कालमेघ का प्रयोग सर्दी-जुकाम, ऊपरी श्वसन-तंत्र के संक्रमण, फ्लू, यकृत रोग (लीवर का बढऩा, पीलिया), हृदय रोग, अपच, दस्त, त्वचा संक्रमण, बड़ी आंत की सूजन, अतिसार, हैजा, ज्वर, मधुमेह, एन्फ्लूएन्जा, खांसी, गले में छाले, टांसिल, दमा, जलन, उच्च रक्तचाप, पाइल्स, भगन्दर और गोनोरिया सहित अनेक बीमारियों के उपचार के लिये उपयोग किया जाता रहा है। एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण टॉनिक के रूप में प्रयुक्त होता है। एक सिस्टेमेटिक रिव्यू में भी यह संभावना दर्शाई गयी थी कि एंटीबायोटिक उपयोग को कम करने के में कालमेघ प्रभावी हो सकता है। इस दिशा में निरंतर गंभीरतापूर्वक मूल्यांकन व परीक्षण आवश्यक हैं।

क्लिनिकल ट्रायल्स में कालमेघ को चिकित्सकीय खुराक के अन्दर नॉन-टॉक्सिक व सुरक्षित पाया है। कालमेघ का काढ़ा रक्त-शोधक, असामन्य प्लीहा, यकृत-उत्तेजक, पीलिया, चर्मरोग, कृमिरोग आदि में उपयोग होता रहा है। कालमेघ, बीड़ी-सिगरेट पीने वालों में क्रोनिक पल्मोनरी ऑब्सट्रक्टिव डिजीज के विरुद्ध भी प्रभावी है। कालमेघ का मानकीकृत एक्सट्रेक्ट लिपिड्स, हीमेाग्लेाबिन व लाल रक्त-कणिकाओं के लिपिड पेरोक्सीडेशन को रोकता है। इसके साथ ही कोशिकीय स्तर पर ऑक्सीडेटिव डैमेज को रोकता है और जहरीले चयापचयी द्रव्यों द्वारा डी.एन.ए. को होने वाली क्षति से बचाता है। क्लिनिकल ट्रायल्स के परिणाम बताते हैं कि मल्टीपल स्क्लीरोसिस के रोगियों में थकान समाप्त करने, रिम्यूट्वाइड अर्थराइटिस, एच.आई.वी., श्वसन तंत्र के संक्रमण, कॉमनकोल्ड, एलर्जिक राइनाइटिस, दर्दनिवारक, इन्फ्लेमेटरी बॉउल, हाइपर-ट्राईग्लिसिरिडिमिया, यकृत की समस्याओं, कालमेघ ब्रैस्ट कैंसर की रोकथाम, माइग्रेन के उपचार, प्रोस्टेट कैंसर की रोकथाम, ग्रासनली (घुटकी) के कैंसर की रोकथाम समेत अनेक असाध्य बीमारियों में कालमेघ उपयोगी है। कालमेघ ग्राम-पॉजिटिव माइक्रोब्स के विरुद्ध भी प्रभावी है।

डेंगू इंसानों में आथ्र्रोपोड-संक्रमित सबसे अधिक प्रचलित वायरल बीमारी है। हर साल अनुमानित 100 मिलियन लोगों में डेंगू से संक्रमित होने के लक्षण मिलते हैं। और कम से 2.5 बिलियन से अधिक लोग डेंगू संक्रमण के जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं। डेंगू वायरस के खिलाफ अभी तक कोई स्वीकृत एंटीवायरल औषधि नहीं हैं। थाईलैंड में हाल में हुई इन-वाइट्रो शोध में कालमेघ को डेंगू सेल-लाइन्स में प्रभावी पाया गया है। दरअसल कालमेघ में मिलने वाले एंड्रोग्रैफोलॉईड को अनेक प्रकार के वायरस के विरुद्ध उपयोगी होने के प्रमाण विभिन्न स्तरों पर मिले हैं। यहाँ एक बात यह भी स्पष्ट करना उचित है कि कालमेघ जिसे भूनिम्ब भी कहा जाता है, और किराततिक्त समान औषधि नहीं है। आचार्य चरक ने जहाँ भूनिम्ब का प्रयोग निर्दिष्ट किया है, वहाँ कालमेघ ही मानना चाहिये। जहाँ किराततिक्त का प्रयोग निर्दिष्ट किया है वहाँ चिरायता मानना चाहिये। हालाँकि इन दोनों की चिकित्सकीय क्रियायें लगभग समान हैं, परंतु उनके अनेक माध्यमिक चयापचयी द्रव्यों में भिन्नता है।

कालमेघ राजस्थान, मध्यप्रदेश, केरल, आन्ध्रप्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल, आसाम आदि राज्यों में बहुतायत से पाया जाता था, किन्तु अब संकटापन्न प्रजाति हो गई है। अब देश के कई इलाकों में कालमेघ की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। राजस्थान के प्राकृतिक आवासों और वनों में इसे कम से कम पिछले पचास वर्षों में देखे जाने का कोई प्रमाण नहीं है, तथापि हाल ही में सीधी बुवाई से इसे उगाया गया है। इसके साथ ही लोगों और आयुर्वेदाचार्यों के बीच इस प्रजाति को लेकर जागरूकता बढ़ी है। राज्य भर में लगभग 2 से 3 लाख पौधे उगे हैं और चूंकि कालमेघ एक शाकीय पौधा है और एक वर्ष के भीतर ही इसमें बीज आ जाते हैं, अत: क्षेत्र में गिरने वाले बीजों से साल दर साल नये पौधे मिलते रहने की उम्मीद रहती है। कालमेघ पर देश में सबसे प्रभावी शोध भारत सरकार के सी.एस.आई.आर के अंतर्गत केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान, लखनऊ में हो रही है। देश में उपलब्ध कालमेघ की जैविक विविधता को संकलित कर आनुवंशिक आकलन के आधार पर एक उन्नत नई किस्म ‘सिम-मेघा’ विकसित की गयी है जो वांछित औषधीय गुणों से युक्त है।
कालमेघ पर विश्व भर हो रही शोध चौंकाने वाली है। परन्तु इस शोध को दरकिनार करते हुये बायोमेडिकल चिकित्सा के साम्राज्य द्वारा आर्थिक-स्वार्थ साधने और मौत की आशंका के बीच चाँदी काटने की जुगत में आयुर्वेद के प्रति बड़ा विद्वेष फैलाया जाता रहा है। आज के शोधकर्ताओं, एलोपैथी चिकित्सकों और तथाकथित स्वयंभू ज्ञानियों को यह नहीं भूलना चाहिये कि 200 साल पहले एलोपैथी की आधारशिला औषधीय पौधों के 5000 साल पुराने पारम्परिक ज्ञान पर ही खड़ी की गयी थी। कालमेघ की सुरक्षा और प्रभाविता को और अधिक पुख्ता रूप से जानने के लिये क्लिनिकल ट्रायल्स चलते रहना चाहिये, परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भारत के लोग 5000 साल से कालमेघ का उपयोग आँख मूंदकर करते रहे हैं।

कालमेघ का प्रयोग आयुर्वेदाचार्यों द्वारा संहिताओं में उपलब्ध ज्ञान के आधार पर हजारों वर्षों से होता आया है। आजकल आये दिन आयुर्वेद की औषधियों का विरोध देखने-सुनने में आता रहता है। विरोध करने वाले यह दावा करने से भी नहीं चूकते कि उनका विरोध वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर है। रोचक बात यह है कि जिन तुलसी, कालमेघ, हल्दी, अश्वगंधा आदि के विरुद्ध भारत में प्रायोजित-रट लगाई जाती है, उन्हें ही पश्चिमी जगत सबसे अधिक आयातित कर रहा है। विज्ञान का नाम भले ढाल के रूप में उपयोग किया जाये पर बाज़ार-आधारित आर्थिक हित साधने वाले विवाद प्राय: साइंस से हल होते नहीं देखे गये। आयुर्वेद के विरोध की यही कहानी है।

मल्टी-ड्रग-रेसिस्टेंट पैथोजेन्स के उन्मूलन तथा उनके कारण होने वाले घातक संक्रमणों को प्रबंधित करने के लिये कालमेघ प्रभावी और विश्वसनीय विकल्प हो सकता है। कालमेघ से बेहतर एंटी-वायरल और एंटीबैक्टीरियल एकल औषधीय योग शायद ही कोई होगा। यह औषधि डेंगू वायरस, इन्फ्लुएंजा-ए वायरस, चिकनगुनिया वायरस, हेपेटाइटिस बी वायरस, हेपेटाइटिस सी वायरस, हर्पीस सिम्पलेक्स वायरस और एचआईवी वायरस आदि के विरुद्ध प्रभावी गुण रखता है। तथापि वैद्य के समुचित परामर्श के बिना किसी औषधि का प्रयोग नहीं करें।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
maxwin
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
vaycasino giriş
meritking giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kulisbet giriş
mariobet giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
grandbetting giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betvole giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betwild giriş
betwild giriş
imajbet giriş
damabet
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
betvole giriş
betpark giriş
betvole giriş
betpark giriş
celtabet giriş
betpipo giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
superbahis giriş
perabet giriş
perabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş