कुछ नहीं होगा

घण्टियाँ हिलाने से

– डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

 

आजकल धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है वह अपने आप में विचित्र है। हर समस्या को लेकर भगवान को तंग करो, घण्टियां हिला-हिला कर खुश करने का प्रयास करो और अपनी जिंदगी के सारे कामों को भगवान को सौंप दो, जैसे कि वह हमारा घरेलू नौकर ही हो और उसका प्राकट्य हमारे अपने काम करने के लिए ही हुआ है।

हममें दो किस्मों के लोग हैं। एक वे हैं जो अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए पहले स्तुति, पूजा-पाठ और प्रार्थना करते हैं और फिर फल पाने का इंतजार करते रहते हैं। दूसरे वे हैं जो पहले कुछ नहीं करते सिवा कोई न कोई बाधा ले लेने के। इसमें भगवान बंधा हुआ होता है। काम पूरा हो तभी बाधा छूटती है, नहीं तो जय सियाराम, ठन-ठन गोपाल। लेन-देन से लेकर मांग और आपूर्ति के सिद्धांत ने भगवान को भी नहीं छोड़ा है।Thousand_Pillar_Temple_bell

धर्मस्थलाेंं, मन्दिरों और धर्म का जो हश्र कलियुग में हमने कर रखा है वह अपने आप में दुनिया की सबसे बड़ी और महान व्यवसायिक घटना है। धर्म को हमने मन्दिरों के गर्भगृह और परिसरों तक कैद कर दिया है जहाँ भगवान को रिझाने के लिए हम सारे नाटक कर लिया करते हैं मगर धर्म के वास्तविक मूल मर्म को जानने और व्यवहार में लाने का मौका आता है तब हम फिसड्डी साबित हो जाते हैं।

हमारे लिए धर्म का मतलब रह गया है मन्दिरों में घण्टियां हिलाना, तिलक-छापों और भभूत लगाकर तथा स्तुतियों और मंत्रों का उच्चारण करते हुए अपने आपको परम धार्मिक और साधक सिद्ध करना और दिखलाना तथा धर्म के नाम पर वो हर गतिविधि करने को तैयार रहने जिसमें हमें कुछ न कुछ प्राप्ति हो, चाहे वह कैसा भी धंधा हो।

धर्म अपने आप में ऎसा कवच होकर रह गया है जिसमें अपने आपको सुरक्षित करते रहकर कुछ भी कर गुजरो, कोई कुछ नहीं कह सकता,कोई कुछ नहीं कर सकता।  किसी जमाने में विराट अर्थों और उदारवादी चिंतन से भरा हुआ धर्म अब कुछ फीट की चौकोर दीवारों में कैद होकर रह गया है।

हम दशकों से भगवान और धर्म के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं उसका न भगवान से कोई लेना-देना है, न धर्म से। बल्कि भगवान का यदि फिर इस  धरा पर प्राकट्य हो जाए तो वे सबसे पहले हमारा ही संहार कर देंगे और वह भी गीता की इन पंक्तियों का उद्घोष करते हुए – ‘‘ यदा-यदा हि धर्मस्य ….।’’ क्योंकि जितनी हानि धर्म को हमने पहुंचायी हैं उतनी बीत युगों में किसी और ने नहीं।

हमने मन्दिरों को भी धंधा बना लिया है। कई मन्दिर तो ऎसे हो गए हैं जिनमें भगवान छोटी सी कोठरी में बंद हैं और मन्दिरों के चारों तरफ बिजनैस कॉम्प्लेक्स और दुकानें ही दुकानें। कई जगह तो आदमी भगवान की सेवा-पूजा में इतना नाकारा हो गया है कि भगवान ही कमाकर दे रहे हैं। दुकानों के किरायों से भगवान पल रहे हैं और भगवान के नाम पर बैंक बेलेंस जमा हो रहा है। जहाँ भक्तों को कुछ भी भेंट नहीं करना है, जो कुछ करना है वह भगवान से प्राप्त कमायी से अपने आप हो रहा है। मन्दिरों में पहले भगवान की दिव्य मूर्ति ही हुआ करती थी, सभामण्डप पूरा खाली होता था सत्संग, मौन और अनुष्ठानों के लिए। आज मन्दिरों के गर्भगृह कबाड़ से भी बदतर हालात में हो गए हैं, ये गर्भ गृह भण्डार से ज्यादा नहीं दिखते। सभामण्डपों और परिसरों में ऑटोमेटिक आरती ध्वनि वाले यंत्र हैं, आल्मारियां जमा हैं, और दूसरा कबाड़। बाहर के सारे स्थलों पर हमने पार्किंग देव बिठा दिए हैं।

हम दैव प्रतिमाओं के प्रक्षालन के लिए पानी भरकर लाने में भी इतने आलसी हो गए हैं कि  गर्भ गृहों तक नल लाईन खींच डाली है। बटन शुरू करते हैं और भगवान पर फव्वारे बरसा कर नहला देते हैं। श्रद्धा और भावना के अतिरेक में हमने पाषाणी श्रृंगार से भरपूर मूर्तियों पर भी ऊपर से चांदी-सोने के आवरण बना डाले हैं और मौलिक सौंदर्य को ढंक दिया है जैसे कि आजकल कामकाजी महिलाएं सूरज के डर से पूरे शरीर पर कपड़े लपेट लिया करती हैं।

जिन मन्दिरों को अपार शांति और ध्यान के लिए बनाया गया था उन मन्दिरों को हमने माईक और निरन्तर बजने वाली धुनों और मंत्रों के गुंजन का धाम बना दिया है जहाँ भोर से लेकर देर रात तक भगवान के कान भी बहरे हो जाएं। भगवान यदि कभी मूर्तियों से बाहर निकलआए तो वह सबसे पहले माईक के सारे ताम-झाम उखाड़ कर उन भक्तों के माथे दे मारे जिन्होंने इन्हें लगाया है। हमारे मन्दिर आखिर मन्दिर कहाँ रहे। जब इनमें अशांति, शोर, ध्वनि प्रदूषण, कबाड़ और ढेर सारी सामग्री जमा होने लगी है जैसे कि किसी अस्त-व्यस्त इंसान का कोई घर ही हो।

हर मन्दिर के पास पेड़-पौधे होने चाहिएं, वह भी हम नहीं लगा पाए हैं। बल्कि पहले से लगे पेड़ों की हमने बलि ले ली है। सदियों पुराने पेड़ों को काटने का पाप करते हुए हमने यज्ञ मण्डप बना डाले हैं।

मन्दिर परिसरों में पीने के पानी का प्रबन्ध होना चाहिए, वह भी नहीं कर पाए। मन्दिरों के आस-पास गौवंश और दूसरे मवेशी पानी के अभाव में प्यासे मरते हैं मगर हमारा ध्यान उनकी तरफ कभी नहीं जाता। कई मन्दिरों के पास मवेशियों के लिए पानी के पुराने पाषाणी हौज भी बने हैं, नालियां भी हैं लेकिन इनमें पानी नहीं बल्कि कचरा जमा होने लगा है।  और तो और हम मन्दिरों के पास जमा गौवंश तक को लाठियां मारकर बाहर कर दिया करते हैं।

हमें समझ नहीं आता कि ये कौनसा धर्म है जिसमें घण्टियां हिलाकर ही, बटन दबाकर माईक से मंत्र ध्वनियों और आरतियों के  लिए ढोल-नगाड़ों की ध्वनि करने वाले यंत्र चलाकर और मन्दिरों को कबाड़खाने, दुकानें तथा धंधों का केन्द्र बनाकर क्या कुछ करना चाहते हैं।

हमने मन्दिरों के परिक्रमा स्थल समाप्त कर दिए, जिन मन्दिर परिसरों में प्रधान देवता के गणों और परिवार का स्थान है उस पर कब्जा कर दुकानें बना डाली, सेवा, परोपकार और दया-करुणा को पीछे धकेल दिया।

आखिर हम कहाँ जा रहे हैं। हमारे संत-महात्माओं और मार्गदर्शकों ने भी अपना धर्म भुला दिया, पण्डितों और आचार्यों, धर्माचार्यों और पुजारियों आदि सभी ने अपनी लोकेषणा, वित्तेषणा और पुत्रैषणा को पूरा करने की खातिर  धर्म के मूल तत्वों को समाप्त कर डाला है।

इतना सब कुछ कर चुकने के बाद अपने आपको परम धार्मिक कहलवाना कितनी बड़ी मजाक है। यही कारण है कि ईश्वर हमसे रूठा हुआ है और उन सभी स्थलों से ईश्वरीय तत्व गायब है जहाँ धर्म के नाम पर धंधों का बोलबाला है। इन डेरों पर कुछ नहीं होने वाला चाहे कितनी ही घण्टियाँ हिलाते रहो। किसी को भी इन डेरों पर भगवान या उनके गण के होने की जरा सी भी अनुभूति हो जाए, तो बता देना ।

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