प्राचीन भारत में होते थे गांव पूर्ण आत्मनिर्भर और एक स्वाधीन संस्था

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राजशेखर व्यास

भारतर्वा में ग्राम सभा का विकास बहुत पुराने जमाने में हो गया था। देश के अधिकांश भाग पर यही सभा अपना वर्चस्व रखती थी। इसकी शासन पद्धति बड़ी सुव्यवस्थित थी। वेद, ब्राह्मण और उपनिाद काल में गा्रम-सभा, उसके प्रमुख और अधिठाता का सम्मानपूर्वक उल्लेख है। ग्रामाध्यक्ष को वैदिक काल में ग्रामजी कहा जाता था। पाणिनी-व्याकरण में भी ग्रामण्याम् शब्द से उसका परिचय मिलता है। इस ग्राम सभा के अध्यक्ष को बड़े विस्तृत अधिकार रहते थे, उसकी आज्ञा का सम्मान भी साधारण नहीं था। गणतंत्रों के काल में भी उसके निर्णयों को टाला नहीं जाता था, फिर गुप्त काल और राजतंत्र में तो उसकी स्वतंत्रता और निर्णय की यहां तक विशिटता मानी गई है कि सीधे राजा के पास गए हुए मामले भी ग्राम-सभा और उसके अध्यक्ष के पास पुन: विचारार्थ भिजवा दिए जाते थे।
ग्राम-सभा की स्थिति उसकी संगठित एकता पर निर्भर रहती थी। गा्रम के प्रत्येक प्रौढ़ जनों को उसमें सदस्यता का अधिकार प्राप्त होता था। इन्हें ग्राम-वृद्ध कहकर समादर दिया जाता था। इनका मन निपक्ष, जाति वर्ग-भेद रहित और ग्राम हित की दृटि से ही होता था। दो हजार साल पहले महाकवि कालिदास ने उज्जैन जैसे वैभव-सम्पन्न भव्य-नगर के प्रौढ़ लोगों के लिए भी ग्रामवृद्ध शब्द का प्रयोग मेघदूत में किया है। ग्राम के प्रमुख का स्थान, उसकी परम्परा तक चलता था, उसके पुत्र में यदि योग्यता का अभाव होता तो उसकी के वंश के अन्य योग्य व्यक्ति को यह सम्मान दिया जाता था। शासन व्यवस्था और ग्राम सुरक्षा का पूरा उत्तरदायित्व उसी पर रहता था। इसलिए वह प्राय: क्षत्रिय कुल से लिया जाता था।


कुछ दूसरे वंश को भी यह प्रमुखता प्राप्त होती रही है। बोद्ध काल में उसको राजा की तरह माना गया था। कुछ जगह तो उसे बहुत सम्मान का पात्र समझा गया है। यह हजार साल पहले तक की घटना है। हमारा ख्याल है कि इसी प्रधान पद की परम्परा ने ठिकाना ठाकुर और राज्य संस्था को विकसित किया है। यह तो स्पट है कि इस ग्राम-प्रधान को कर-मुक्त रखा जाता था, और उसे उपभोग के लिए भूमि प्राप्त होती थीं। जातक कथाओं में इस अध्यक्ष का वर्णन राजा की तरह ही किया हुआ मिलता है। इसका यही आशय है कि 2500 र्वा पूर्व ही उसमें राजस्व की भावना घर कर गई थी। प्रमुख का सारा काम करने वाला अर्थात् ग्रामसभा संबंधी हिसाब-किताब रखने वाला कार्य व्यवस्था आदि का विधायक कर्मचारी (मुनीम) भी कर मुक्त भूमि का उपभोग करता रहता था, और उसकी भी परंपरागत पारिवारिक नियुक्ति होती थी। ये दोनों ही वस्तुत: जनता के प्रति जिम्मेदार रहते थे। उनके विश्वासपात्र होते थे। यद्यपि इनका संबंध शासन से रहता था, परन्तु ये लोग शासन और जनता के मध्य की कड़ी के रूप में ही रहते थे। फिर भी ये अपने पद का दुरूपयोग करके कभी मनमानी नहीं कर सकते थे।
इन्हें सारी व्यवस्था ग्राम वृद्धों के परामर्श के अनुसार ही करनी पड़ती थी। इस पर भी ग्राम सभा या ग्रामाध्यक्ष के व्यक्तियों में कोई अधिकार भावना, या शासक-भावना नहीं रहती थी। जैसे एक परिवार का प्रमुख अपने परिवार को आत्मीयता के साथ नियमित, व्यवस्थित, नियंत्रित एवं सुरक्षित रखने का प्रबंध करता है, उसी तरह वह ग्रामीण और ग्राम वृद्ध भी ग्रामहित और आत्मीय एकता के साथ उनमें का ही अभिन्न अंग होकर यह सब करता था। वह केवल शासन व्यवस्था ही नहीं, सामाजिक सुव्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखता था। ग्राम का चरित्र, आचार, व्यवहार आदर्श रखने के लिए वह अपने प्रभाव का उपयोग करता था, किसी के साथ अन्याय नहीं। गृह-जीवन में जो उलझनें हो, उन्हें वह पिता और रक्षक की तरह निपटाता रहता था। पारिवारिक, साम्पत्तिक, स्त्री और बालकों के अधिकार की देखभाल भी वह करता और उसका सम्मान रखकर उसके निर्णय को ग्रामजन मान्य रखते थे। उसकी भूल हो जाए तो ग्राम वृद्धों का यह कार्य होता कि वह उसे सुधार देते। मालवे में भी ग्राम सभा की तरह मध्य युग में पंचायत का विस्तार और विकास हो गया था। राजपुताने में भी पंच और महंत के रूप में इसी ग्राम सभा का कार्य संचालित होता था। गुप्तकाल और उसके बाद तो ग्रामसभा की पंचायत प्रथा का प्रभाव क्षेत्र काफी बढ़ गया था और वे अत्यंत सुव्यवस्थित रूप से ही नहीं शासन से सर्वथा स्वतंत्र रखकर अपने में संपूर्ण शक्ति केन्द्रित समझकर ही कार्य करती थीं।
केन्द्रीय ओर प्रांतीय शासनों में कैसे भी राजनीतिक फेरफार होते रहे, इन संस्थाओं की कार्य व्यवस्था में उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। धीरे-धीरे इन संस्थाओं में विभिन्न समितियां उसी का अंग बनकर कार्य करती थी। और ग्राम संस्था का सार्वजनिक चुनाव भी होने लगा था। मध्ययुग में इसके चुनाव की यह प्रथा थी कि ग्रामजन उम्मीदवार का नाम ठीकरी पर लिखकर एक घड़े में डाल देते थे और वह घड़ा ग्राम वृद्धों की उपस्थिति में खोला जाता था। इन चुनावों और चर्चाओं में किसी जाति वर्ग का भेदभाव नहीं माना जाता था और ग्राम अथवा ग्राम के वृद्धजन आजकल की तरह असंस्कृत एवं हीन स्थिति के नहीं होते थे। वे भी अपने को योग्य नागरिक बनाने में किसी नगर जन से पीछे नहीं रहते थे। मध्य युग में ऐसे कई उदाहरण प्राप्त होते हैं, जहां कोई भी असंस्कृत या असभ्य नहीं रहते थे।
मालवे के परमारों के शासन काल में उनके प्रदेश का कोई भी ग्रामीण अपठित नहीं रहने पाता थ। कोविद ग्राम वृद्धान शब्द से उनके सुगठित रहने का प्रमाण प्राप्त होता है, फिर जहां पुरातन काल में सभी आचार्य, मर्हाि आश्रम जीवन व्यतीत करते थे। नगर से दूर एकांत में निरन्तर ज्ञान साधना निरंत रहते वहां उनके निकट का वातावरण कैसे अज्ञान में रह सकता था ? ग्राम संस्थाओं के भी कई उल्लेख ऐसे मिलते हैं, जहां कि वेद-शास्त्र और पुराणों के अध्ययन आदि के लिए इन संस्थाओं के सहयोग से ग्रामवासियों ने लाभ (वृत्ति) लेकर ज्ञान संपादन किया था। दक्षिण भारत के शिलालेखों की रिपोर्ट (1897 तथा 1917 आदि) कालिदास और भास के नाटकों में ग्रामीण पात्रों की जिस योग्यता का प्रदर्शन हुआ है, उन सभी से हमारे देश की ग्रामीण संस्कृति का सुन्दर चित्र सामने आ जाता है।
ग्रामों के विाय में आज हम उचित कल्पना इसलिए नहीं कर पाते कि उनका विकृत स्वरूप ही हमारे सामने रहा है, विकसित स्थिति को रचना हमें ठीक नहीं मिली है। जिन्होंने मानसार जैसे पुरातन ग्रंथ और समरांगण सूत्र जैसी रचना का अवलेाकन नहीं किया है, वे पुरातन भारत के नगर और ग्रामों की वास्तविक समुन्नतावस्था की कल्पना भी नहीं कर सकते। इन पुस्तकों में 7 प्रकार के नगरों और ग्रामों के आठ प्रकार (जैसे नंद्यावर्त, दण्डक, संवतोभ्रद, पद्मक, स्वस्तिक, प्रस्तर, कार्मुक और चतुर्भुज आदि) की रचना, विधान, स्वास्थ्य सुविधा, व्यवस्था, सुरक्षा आदि के सौठव एवं सौंदर्य का वर्णन जैसा संविधान और सुव्यव्स्थित प्रस्तुत हुआ है, वह विस्मय विमुग्ध कर देने वाला है। आज के पौर और मानवशास्त्र के अध्ययन करने वालों के लिए इस युग में भी नि:संदेह ये ग्रंथ मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

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