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भारतीय संस्कृति

प्रकृति से ऊर्जा लेता है भारतीय संगीत

 

चेतन जोशी

(लेखक प्रसिद्घ बाँसुरीवादक हैं।)

भारतीय संगीत में स्वर व्यवस्था की उत्पत्ति प्राकृतिक नियमों से हुई है। किसी तार पर जब षड्ज बजाया जाता है, तो उसके साथ अपने आप उत्पन्न होने वाले स्वयंभू स्वर मानव निर्मित नहीं हैं। वे प्रकृति के बनाए हुए हैं। हमने प्रकृति के अनुसार ही स्वरों का स्थान भी निश्चित किया है, जिसे हमारे ऋषियों ने श्रुति व्यवस्था का नाम दिया है। इस व्यवस्था में सभी स्वरों की दूरी समान नहीं है। षड्ज की दूरी चार श्रुतियों की है, तो धैवत की तीन। भारतीय स्वरों का यह आपसी तादात्म्य जितना आज सच है उतना ही लाखों वर्ष पहले सच था और उतना ही सच आने वाले लाखों वर्षों तक रहेगा। यह सत्य इसलिए है क्योंकि यह प्रकृति प्रदत्त है और हमारे पुरखों ने इसमें कोई मिलावट नहीं की है।

दुर्भाग्यवश आज इस सच की लड़ाई या तुलना पाश्चात्य संगीत के झूठे स्वरों से होती है। पाश्चात्य स्वरों की स्थापना मानव निर्मित है जिसमें अपने स्वार्थ के लिए उन्होंने सभी स्वरों का स्थान बराबर दूरी पर रख दिया है। सिंथेसाइजर, पियानो और गिटार पर उन्होंने अप्राकृतिक स्वरों की स्थापना जान बूझकर की है। इस सप्तक का नाम ही है इक्वली टेम्पर्ड स्केल, जिसमें हर स्वर-स्थान बराबर की दूरी पर स्थित होता है। प्रश्न उठता है कि अगर वे वाद्य गलत स्वर स्थान दर्शाते हैं तो फिर हमें खराब क्यों नहीं लगते? इसके उत्तर को जानने के लिए किसी नशेड़ी को ध्यान से देखें। उसे अच्छी तरह से पता रहता है कि बुरी चीज है, पर जैसे नशे की आदत धीरे धीरे हो ही जाती है वैसे ही हमें फिल्मों, टीवी और इंटरनेट के माध्यम से झूठे संगीत की भी आदत पड़ गई है। इस हद तक कि हम अपने सच्चे स्वरों को तज कर उन झूठे स्वरों को अपनाने लगते हैं। यहाँ तक कि फ्यूजन के नाम पर उनके स्वरों में अपना स्वर मिलाते हैं, उनके सिंथेसाइजर के साथ अपने साज को ट्यून करने लगते हैं। पर इसके उलट, हमारी-आपकी हिम्मत नहीं होती कि उनसे कहें कि हमारी स्वर व्यवस्था में भी तो आ कर देखो! उनको भी तो पता चले कभी कि तोड़ी, बागेश्री और दरबारी का गांधार कैसे अलग-अलग होता है? कभी इसका भी तो आनंद लें। हर बार आप हमारे ताल वाद्यों को हटाकर अपना गिटार और ड्रम्स ले आते हैं, कभी अपने पाश्चात्य संगीत को हमारे तबले, मृदंगम् और ढोलक की थाप पर भी तो बजाकर देखिए, नाचने न लगें तो कहना। पर ऐसा नहीं होता, क्योंकि इसमें अपने संगीत के प्रति हमारी ही बेइमानी और चंद पैसों की लालच छिपी हुई है। हमें लगता है कि वह तो नहीं बदल सकते, इस लिए हम ही बदल जाते हैं। उनके झूठ के सामने अपने सच को हराने वाले तो हम ही हैं। मैं फ्यूजन के खिलाफ नहीं हूँ पर इस बात की मुखालिफत करता हूं कि हर बार समझौता हमें ही अपने संगीत के साथ क्यों करना चाहिए? ऐसा क्यों नहीं कि कुछ तुम आगे आओ कुछ हम आगे बढ़ें?

फिर भी, कहा जाता है कि जब जागे तभी सवेरा। सच और झूठ की लड़ाई में सभी कठिनाइयों के बावजूद विजय सच की ही होती है। समय के साथ झूठ भले ही कितना भी बलवान और संख्यावान क्यों न हो जाए। इस सब के दर्शन हमें अपने पूर्वजों के जीवन में भी होते हैं। सत्य युग में नृसिंह अवतार की लड़ाई एक राक्षस हिरण्यकशिपु से होती है। दूसरे शब्दों में एक सच्चे की लड़ाई एक झूठे से होती है। त्रेता युग में श्रीराम अवतार की लड़ाई दशानन से होती है। यानी एक सच्चे को दस झूठों से लडऩा पड़ा था। द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के विरुद्ध सौ कौरव थे। कलियुग में गुरु गोविंद सिंह जी महाराज को कहना पड़ा कि सवा लाख से एक लड़ाऊं। यानी एक सच्चे की लड़ाई सवा लाख झूठों की फौज के साथ है। जो भी हो, संख्या कितनी भी हो, जीत हमेशा सत्य और धर्म की ही हुई है और आगे भी होगी। हमें सच को सच और झूठ को झूठ कहने से डरना नहीं चाहिए। भारतीय संगीत के सच्चे स्वर दर्शाने वाला एक सच्चा साधक लाखों झूठों पर अवश्य भारी पड़ेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

प्राचीन काल से मनुष्य का सबंध संगीत से रहा हैं, संगीत को मनुष्य ने अपने भाव को व्यक्त करने का माध्यम बनाया था। प्राचीन समय में यह मात्र एक मनोरंजन का स्त्रोत नहीं था। हमारे कई ऋषि मुनि संगीत शास्त्रों में परिपूर्ण थे। प्राचीन काल में ये एक आध्यात्मिक माध्यम ही रहा था। संगीत के माध्यम से ही कई लोगो ने पूर्णता प्राप्त की है।
भारतीय संगीत के सप्तक या सा रे ग म प ध नि आदि शब्दों के कोई सामान्य समूह नहीं हैं। देने को तो इन ध्वनियों को कोई भी उच्चारण दे दिया जाता लेकिन सा रे ग म प ध नि आदि संबोधनों का एक गहन अर्थ है। जब एक विशेष लय के साथ एक मूल ध्वनि सम्मिलित होती है तो वह मानव शरीर में किसी एक विशेष चक्र को स्पंदित करती हैं। सभी सुर अपने आप में तत्वों के प्रतिनिधि हैं और हर सुर एक विशेष तत्व के ऊपर अपना प्रभुत्व रखता है। इसमें सा – पृथ्वी, रे, ग – जल तत्व म, प – अग्नि तत्व ध – वायु और नि – आकाश तत्व के प्रतिनिधि हैं।

अब जिस तरह से ये सप्त सुर हैं उसी तरह शरीर में सप्त सुरिकाएं हैं, जहाँ से सुर या ध्वनि की रचना होती है। ये स्थान हैं – सिर, नासिका, मुख-कंठ, हृदय (फेफड़े), नाभि, पेडू और ऊरसन्धि। ध्यान से देखा जाए तो ये सारी जगह शरीर के सप्त चक्रों के अत्यंत ही नजदीक हैं। अब इस तरह संगीत तंत्र में कुण्डलिनी सबंध में सप्त सुर एक-एक चक्र को स्पंदित करने में सहयोगी हैं। इन्हें तालिका एक से समझा जा सकता है।

सा – मूलाधार ( पृथ्वी तत्व, सुरिका- ऊसन्धि)
रे – स्वाधिष्ठान( जल तत्व, सुरिका – पेडू )
ग – मणिपुर (जल तत्व, सुरिका – नाभि )
म – अनाहत ( अग्नि तत्व, सुरिका – ह्रदय)
प – विशुद्ध ( अग्नि तत्व, सुरिका – कंठ)
ध – आज्ञा ( वायु तत्व, सुरिका – नासिका)
नि – सहस्त्रार ( आकाश तत्व, सुरिका – मस्तक)

इन स्वरों का, उपरोक्त स्वरिकाओं से सीधा संबंध है। इसलिए इनसे सबंधित चक्र का ध्यान करने से चक्र जागरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती हैं और उसे कई विशेष अनुभव होने लगते हैं। मगर यह चक्र जागरण होता है, भेदन नहीं। इसलिए विभिन्न रागों की रचना हुयी हैं, जिसमें ध्वनियों के संयोग से कोई विशेष राग निर्मित किया जाता है। वे राग विशेष चक्रों का भेदन कर सकते हैं। जैसे मालकोंष राग के माध्यम से विशुद्धि चक्र को जाग्रत किया जा सकता है, इसी प्रकार कल्याण राग के निरंतर अभ्यास से भी विशुद्धि चक्र को स्पंदन प्राप्त होता है और वो जाग्रत हो जाता है। और एक बार जब ये चक्र जाग्रत हो जाता है तो साधक वायुमंडल में व्याप्त तरंगों को महसूस कर सकता है और उन्हें ध्वनियों में परिवर्तित कर सकता है। परंतु कल्याण राग जैसे रागों को सांयकाल के समय ही गाना उचित होता है अर्थात् सूर्य के अस्त होने के तुरंत उपरांत।

नन्द राग के द्वारा मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है और वेदों का सही अर्थ व्यक्ति तभी समझ सकता है जब उसका मूलाधार पूरी तरह जाग्रत हो। इसलिए वेदों के अध्येताओं को इस राग का श्रवण करना चाहिए। इस राग को रात्रि के दूसरे प्रहर में गाना चाहिए। ठाट बिलाबल राग देवगिरी के प्रयोग से अनाहत चक्र की जाग्रति होती है व्यक्ति अनहद नाद को सुनने में और उसकी शक्तियों की प्राप्ति में सक्षम हो जाता है, इसी प्रकार सभी राग किसी न किसी चक्र को स्पंदित करते ही हैं।

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