विश्व बंधुत्व का महानायक आर्यन पेशवा (सम्राट ) राजा महेंद्र प्रताप जन्मोत्सव 1 दिसंबर पर एक विहंगम दृष्टि

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“स्वतंत्रता संग्राम का दीवाना।
भारत का प्रथम राजघराना।।”

भारत भूमि आदिकाल से ही समस्त भूमंडल को अपनी उर्वरा के द्वारा आलोकित करती रही है। इस धर्म प्रसूता वसुंधरा पर अनेक नायक, महानायक, लोकनायक हमारे प्रणेता रहे हैं। इसी ब्रजभूमि के मुरसान गांव में राजा घनश्याम सिंह की धर्मपत्नी माता दानकौर की कुक्षि (कोख) से एक बालक का जन्म हुआ। रानी दानकौर जन्म देते ही चल बसी। १ दिसम्बर १८८६ मुरसान महल में हर्ष एवं विशाद का दिन था। आगे चलकर यह बालक विश्वबन्धुत्व का महानायक आर्यन् पेशवा के नाम से लोकप्रिय हुआ। बालक के जन्म के समय राजा घनश्याम सिंह अवसाद में आ गए थे, परंतु आर्य विचारधारा के कारण अवसाद अधिक दिनों तक ठहर नहीं सका तथा उन्होंने बालक के लालन-पालन पर ध्यान केंद्रित किया।

“मेरी 50 वर्ष की यात्रा” पुस्तक में आर्यन् पेशवा राजा महेंद्र प्रताप लिखते हैं कि “एक विश्वसनीय नाई ( नापित) अभिभावक की भूमिका निभाता था। एक ब्राह्मण मुझे हिंदी पढ़ाने आता था तथा मौलवी मुझे फारसी पढ़ाने आता था। 8 वर्ष की आयु में एक पब्लिक स्कूल में प्रवेश लिया। परंतु इस स्कूल में मेरा मन‌ नहीं लगा। फिर अलीगढ़ के प्रसिद्ध मोहम्डन कॉलेज (एंग्लो ओरिएंटल) कॉलेज जिसे माओ कॉलेज के नाम से जाना जाता था, में प्रवेश लिया। वहां मुझे दस सेवादार (नौकर) घेरे रहते थे। पांचवी कक्षा में मुझे श्री नियाज मोहम्मद ने खूब डंडों से पीटा। एक बार कक्षा छ: तथा एक बार एम•ए• में फेल हुआ। मैं बड़ा खर्चीला था। मेरे हेडमास्टर मि• मौस ने कहा था संभल कर खर्च करो नहीं तो एक दिन कंगाल हो जाओगे। बस इसी विचार ने मेरा मन मस्तिष्क बदल दिया और सादगी से रहने लगा। सन् १९०१ मैं पिताश्री की मृत्यु हो गई उस समय मेरी आयु मात्र १६ वर्ष थी। इसी वर्ष मेरा विवाह जीन्द रियासत के महाराजा रणवीर सिंह की छोटी बहिन बलवीर कौर से हुआ। सन् १९०७ में राजकाज के बोझ से बी•ए• की पढ़ाई बीच में छोड़ी। विद्यार्थी जीवन में राज परिवारों के राजकुमारों की संगत से शराब की भी लत पड़ गई थी परंतु आर्य समाज से प्रभावित होकर शराब को सन् १९१० ई• में सदैव को अलविदा किया।

   सन् १९०९ में घर एक कन्या का जन्म हुआ। मैंने किसी ब्राह्मण को नहीं बुलाया। नामकरण संस्कार में ‘भक्ति’ नाम रखा। सन् १९१२ में एक पुत्र का जन्म हुआ उसका नामकरण संस्कार भी मैंने स्वयं किया। राजकुमार का नाम प्रेम प्रताप रखा। मैं स्वयं ब्राह्मणवादी आडंबरों और पाखंड के खिलाफ था।

१९०६ से १९१३ ईस्वी तक सारे देश का भ्रमण किया। सभी धार्मिक तीर्थ स्थलों पर भी शोषण होते देखा। इस भ्रमण से भारत भूमंडल को नजदीकी से पढ़ने, समझने का अवसर मिला। भारत की गरीबी, रूढ़िवादिता, जात-पात, छुआ-छात, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा तथा अंग्रेजों के शासन का कुचक्र भी देखा किस प्रकार भारतीयों से घृणा का व्यवहार होता था। धर्म के ठेकेदार,पंडा पुजारी भी अपने कुचक्र से आम जनता का शोषण कर अपने मकड़जाल में फंसाए हुए थे। एक बार द्वारिका मंदिर में जात पूछने पर मैंने अपने को भंगी बता दिया ,तब मुझे मंदिर में घुसने नहीं दिया। उस समय मैं बड़ौदा नरेश के रियासती डाक बंगले में ठहरा हुआ था। असलियत का पता लगने पर पुजारियों ने आकर डाक बंगले पर माफी मांगी। अब राजा मंदिर नहीं जायेगा

जहां ऐसे पाखंडी बैठे हैं। मैं वहां जीवन भर नहीं गया।” उन्होंने इस वचन को अंतिम श्वांस तक निभाया। यहीं से उनके मन में विश्वबन्धुत्व ,विश्व समाज, संसार संघ (यू•एन•ओ) की ज्वाला उत्पन्न हुई। उस समय उनकी आयु लगभग २६ वर्ष थी।

१७ अगस्त १९०७ से १७ दिसंबर १९०७ चार माह अपनी नवविवाहिता पत्नी रानी बलवीर कौर के साथ विभिन्न देशों जैसे मारसौली, जिनेवा,वेनिस,फियूस बुडोपेस्ट, वियना, बर्लिन, पेरिस, लंदन,न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन ,फिलाडेलफिया, मान्द्रिपाल, क्यूबैक,ओटावा,टोरन्टो,नियाग्रा फॉल्स, बैकुवर, विक्टोरिया आदि अनेकानेक स्थानों का दौरा कर भारत से तुलना की। राजा ने विचार किया कि भारत क्या था? क्या हो गया है? क्या बन गया है? टोरन्टो के एक कस्टम अधिकारी ने राजा से वार्तालाप कर कहा कि आपकी और आपके भारत की फिलोस्फी तो इतनी ऊंची है फिर भी आपकी फिलोस्फी भारत को गुलामी से नहीं बचा सकी। उस अधिकारी का यह वाक्य उनकी छाती में सदा के लिए गढ़ गया।

यही से उन्होंने अपने देश को आजाद करने का प्रण लिया और सारा जीवन इसी में खपा दिया। रानी बलवीर कौर ने यूरोप यात्रा के दौरान भारतीय शैली (परिधान) को अपनाकर भारतीयता की अमिट छाप छोड़ी।

विदेशी दौरे से राजा साहब को यह शिक्षा मिली कि भारतवर्ष से अंग्रेजों ने तकनीकी शिक्षा समाप्त कर दी है जो पूरे विश्व में शिरोमणि थी। भारत लौटने पर प्रेम महाविद्यालय की नीव सन् १९०९ में रखी। २४ अगस्त  १९०९ से कक्षाएं नियमित चलने लगीं। महेशचन्द्र सिन्हा प्रथम प्रधानाचार्य थे। संस्था सोसायटी एक्ट १८६० के अंतर्गत २९ जुलाई १९१० को पंजीकरण कराकर ३३ हजार का दान दिया। बाद में पं• मदन मोहन मालवीय के परामर्श से संस्था को अपनी आधी जायदाद का दान कर दिया। यह भारत का प्रथम तकनीकी संस्थान है जो वृन्दावन में अपने 128 वर्ष पूरे कर तकनीक तीर्थ स्थल का साक्षी है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, शिव वर्मा, आजाद शुभानी, सी•एफ• एंड्रयूज,मदन मोहन मालवीय जैसे लोग भी इस पर गर्व करते थे।

सन् १९१२ में आर्यन् पेशवा राजा महेंद्र प्रताप अपने शिष्ट मंडल के साथ तकनीकी अनुभव प्राप्त करने के लिए इंग्लैंड के विभिन्न शहरों लंदन, एडिनबर्ग, पेरिस, ग्लास्गो, बर्लिन, ज्यूसित, वर्मिंघम, लीड्स, शेफिल, वयानगेस्टर आदि स्थानों का गहराई से अध्ययन किया। फ्रेन्च भाषा को पेरिस में ही सीख लिया था। आप बर्लिन पेरिस, अफगानिस्तान, टर्की होते हुए भारत पहुंचे।

            ब्रिटिश साम्राज्य को आर्यन् पेशवा ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। प्रत्येक देश की जनता अंग्रेजों से छुटकारा चाहती थी। अतः आजादी की लड़ाई में कूदने का दृढ़ संकल्प लेकर १९०६ में स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
१९०६ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कोलकाता में हो रहा था। दादा भाई नौरौजी इसकी अध्यक्षता कर रहे थे। इस सम्मेलन में वे भाग लेने के लिए संगरूर से कोलकाता गए। उस समय जींद रियासत के महाराजा रणवीर सिंह ने कहा कि हम रियासतों को अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए। इस पर आर्यन् पेशवा राजा महेंद्र प्रताप ने कहा कि आपको अपनी रियासतों की चिंता है मुझे गुलाम राष्ट्र में जीना मुश्किल हो रहा है। राजनीति में प्रवेश किए बिना अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते। कोलकाता अधिवेशन में राजा साहब ने दादाभाई नौरोजी, विपिनचन्द्र पाल, लोकमान्य तिलक, लाजपत राय और बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड से विचार सुनकर और मन की उथल-पुथल ने सक्रिय राजनीति से जोड़ दिया।
यहीं से राजा साहब की कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिनती होने लगी। १९१० में प्रयागराज (इलाहाबाद) आनन्द भवन में शिक्षा के अधिकार का प्रस्ताव सबके लिए रखा। वे भारत में एक समान सर्व शिक्षा अभियान चलाना चाहते थे, पर उस समय कामयाब नहीं हुए परंतु इस विचार से बड़े नेताओं में उनका कद बढ़ गया। राजा साहब जात पात के खिलाफ थे। उनका मानना था कि “जात पात अशिक्षा हमारे कट्टर दुश्मन हैं, हम सब एक हैं कोई छूत अछूत नहीं”। राजा साहब ने अफ्रीका जाने की अनुमति श्री गोपाल कृष्ण गोखले से मांगी तो गोखले जी ने कहा कि राजा साहब उत्तरी भारत में स्वेच्छा से संघर्ष करने को क्या लोग तैयार हैं? इस पर राजा साहब ने उत्तरी भारत से ही आजादी की अलख जगाने का संकल्प लिया।

राजा महेंद्र प्रताप शिक्षा एवं नारी शिक्षा के माध्यम से आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहते थे। शिक्षा से ही देश प्रेम होगा अतः महिलाओं को शिक्षित करना जरूरी है। 15 अगस्त १९१४ में प्रेम महाविद्यालय का वार्षिक सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता आर्यन् पेशवा के मित्र आगरा के कमिश्नर मि• डैंपियर ने की। मथुरा के डीएम (कलेक्टर) भी बुलाए गए। आर्यन् पेशवा महेंद्र प्रताप जी ने अपने समापन भाषण में कहा – “हम अन्याय को गद्दी से उतार कर न्याय को बिठायेंगे”। इस प्रकार के कथन को सुनकर उनके मित्र कमिश्नर मि• डैंपियर ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यह भाषण अंग्रेजो के खिलाफ है। इस पर मिस्टर डैंपियर कमिश्नर को राजा साहब ने दो टूक जवाब दिया कि “मैं अंग्रेजी राज्य का भुरता बना दूंगा।” इस प्रकार राजा साहब अंग्रेजो के खिलाफ आग उगलने वाले प्रथम महारथी बन गए।

वे अब अंग्रेजों की आंखों में खटकने लगे। उनके क्रांतिकारी विचारों को समाचार पत्रों में निकाला जाने लगा। एक संपादक और पत्रकार बुलाकीराम “कॉस्मापॉलिटन” नामक पत्रिका में राजा साहब के आजादी के विचारों को प्रथम पृष्ठ पर छापने लगे। स्वयं राजा साहब ने भी प्रेम नामक समाचार पत्र भी निकालना प्रारंभ किया इससे आजादी की चिंगारी और सुलगने लगी।

अब अंग्रेज सरकार राजा महेंद्र प्रताप को भी देशद्रोह का आरोप लगाकर जेल में सड़ाना चाहती थी। राजा साहब ब्रिटिश सरकार की चालबाजी से परिचित थे। वे जेल में सड़ने की बजाय बाहर रहकर भारत की आजादी की लड़ाई लड़ना चाहते थे। उन्हें ब्रिटिश सरकार फूटी आंख नहीं सुहाती थी। प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ। इंग्लैंड ने जर्मन पर आक्रमण कर दिया। वैसे इंग्लैंड और जर्मन में ममेरे फुफेरों का राज्य था। राजा के दोनों ही शत्रु थे पर राजा ने जर्मन का साथ देने की घोषणा कर दी। २० अगस्त १९१४ को रात १०:०० बजे अपनी पत्नी को रोते बिलखते छोड़ कर (धर्म नामक बंग्ले से) विदा हुए। उनकी ५ वर्षीय पुत्री ‘भक्ति’ ने यह नजारा देखा। प्रेम महाविद्यालय को सेठ नारायणदास बी•ए•, कु• हुकम सिंह एवं स्वामी श्रद्धानंद के पुत्र हरीशचंद्र को सौंप कर देहरादून होते हुए बम्बई पहुंचे। राजा साहब बम्बई से लंदन कूच कर गए लेकिन हवाई जहाज का टिकट नहीं था।

लंदन से आर्यन् पेशवा जिनेवा पहुंचे। वहां क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। राजा साहब ने लाला हरदयाल एम•ए• से भेंट की और जर्मन के शासक चांसलर कैसर से मिलने गए। जिनेवा में सरोजिनी नायडू के भाई चट्टोपाध्याय के घर ठहरे व देश की आजादी पर विचार किया। १० फरवरी १९१५ में दोनों बर्लिन पहुंचे। जर्मन के चांसलर ने आर्यन् पेशवा के कहने पर भारत के समस्त राजाओं को पत्र लिखा कि “लुटेरे अंग्रेजो के खिलाफ देसी रियासतों के राजा सब लामबंद हो जाओ।” जर्मन ने भारत का साथ देने का वायदा किया और चांसलर ने राजा साहब को डेढ़ लाख रुपए देकर अफगानिस्तान भेजा। शिकागो, बुल्गारिया होते हुए कभी पैदल, कहीं ऊंट, घोड़ा तथा रेल मार्ग से सफर तय किया। इराक, ईरान होते हुए २ अक्टूबर १९१५ को काबुल में प्रवेश किया। अफगानिस्तान कभी भारत का राज्य हुआ करता था। वहां हमारा खून का रिश्ता है।

१ दिसंबर १९१५ को राजा साहब ने अस्थाई हिन्द सरकार की स्थापना कर कहा “आज अपने भारतवर्ष के पुराने राज्य से जिसकी राजधानी काबुल है अस्थाई हिन्द सरकार के गठन का प्रस्ताव रखता हूं। आज बारह सौ वर्ष से गुलामी के जुए को फेंकते हुए पहली सरकार बनाएं जो दुष्ट दमनकारी अंग्रेजों को भारत से

खदेड़ने के लिए विश्व स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। आजादी मिलने के बाद यह सरकार प्रतिनिधि दिल्ली में एक स्थाई लोकतांत्रिक सरकार का गठन करेगी।” उपस्थित समूह ने सर्वसम्मति से हाथ उठाकर समर्थन किया। अस्थाई हिन्द सरकार के आर्यन् पेशवा राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति चुने गए और राष्ट्रपति ने अपना मंत्रिमंडल चुना। अफगानिस्तान के साथ जम्मू कश्मीर के राजा हरीसिंह तथा नाभा स्टेट ने मान्यता दे दी। साथ ही अफगानिस्तान बादशाह हबीबुल्ला ने पचास हजार अफरीदी जाटों की सेना का गठन कर राजा को सौंप दी। राजा साहब ने इस सेना का नाम “विश्व सेना” रखा। यह खबर विश्व में आग की तरह फैल गई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को इससे सदमा लगा। सारे विश्व में हड़कंप मच गया क्योंकि अंग्रेजों के राज्य में सूरज नहीं छिपता था। अब आर्यन् पेशवा राष्ट्रीय नहीं, अन्तरराष्ट्रीय नेता बन चुके थे। अंग्रेज किसी भी प्रकार महेंद्र प्रताप को गिरफ्तार करना चाहते थे। इस दौरान राजा साहब ने रूस से भी संधि कर ली। उन पर पूरा खर्च अफगान सरकार कर रही थी इसी कारण अंग्रेजों ने

१९१९ में अफगानिस्तान पर युद्ध थोप दिया। इस युद्ध में राजा साहब की “विश्व सेना” ने अफगानिस्तान की भारी मदद की और अंग्रेजों को जनधन की बहुत हानि हुई। राजा साहब अब तक नेपाल से भी संधि कर चुके थे। तुर्की के अकाल समय में राजा ने अफगान एवं ताशकंद (रूस) से सहायता दिलाई। बाद में स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्री ‘मौथ’ से मिले। वहां भी मित्रता कर आश्वस्त हुए फिर जापान पहुंचे। जापान के शहर याकोहामा में रासबिहारी बोस से भेंट हुई। जापान के लोगों ने “मार्को पोलो”  की उपाधि से अलंकृत किया। साथ ही बताया कि जापान भी आपके जम्बूद्वीप का एक भाग है क्योंकि संपूर्ण एशियाई देशों को वैदिक काल में जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्त…….. परिसर में माना गया है।

जापान से राजा साहब चीन पहुंचे। वहां चीन की संसद को संबोधित कर प्रथम भारतीय बने। यह भाषण विश्व की सभी भाषाओं में छपा। इस भाषण से पूरे विश्व में आर्यन् पेशवा की धाक जम गई। अंग्रेजी करतूतों से सावधान रहते हुए पुनः जापान लौट आए। राजा साहब ने १९२२ में अफगान के बादशाह के सहयोग से “आजाद हिंद फौज” का गठन किया। बाद में इसी आजाद हिन्द फौज को रासबिहारी बोस ने चलाया। जिसे बाद में सुभाष चंद्र बोस ने पुनर्गठित कर संवारा और निखारा था। इसी सेना ने भारत की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

राजा साहब जापान से मंगोलिया फिर चीन पहुंचकर रूस का वीजा प्राप्त कर २१ जून १९२३ में रूस की सीमा में प्रवेश किया। १ जनवरी १९२५ को न्यूयॉर्क पहुंचे।
६ नवंबर १९२५ को तिब्बत में प्रवेश किया। राजा साहब तिब्बत को स्वर्ण भूमि, सृष्टि की उत्पत्ति, आर्य ग्रंथों के आधार मानते थे। तिब्बत अब बौद्ध की धरती, एशिया की धड़कन एवं संसार की छत है। १५ जुलाई १९२७ को सीलोन (लंका) पहुंच कर एक सेमिनार में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि “अधिकार गिड़गिड़ा ने से नहीं मिलते उनके लिए कुर्बानी देनी पड़ती है। अधिकार छीने जाते हैं। एक दिन अंग्रेज भागते नजर आएंगे आप देख सकेंगे”। इसी दौरान १ सितंबर १९२९ को बर्लिन में “संसार संघ” की नींव रखी एवं राजा साहब ने तीन प्रस्ताव रखे (१) मेरा मानव धर्म है (२) सब सरकारें संकुचित विचार छोड़ें (३) सभी शिक्षित हो, नारी की शिक्षा के बिना उन्नति संभव नहीं है।
इसी दौरान न्यूयॉर्क में उनकी भेंट कर्नल इमरसन से हुई। इमरसन ने राजा को एशिया मैगजीन के संपादक से मिलवाया उसमें राजा साहब के लेख छपने लगे। इन लेखों ने आर्यन पेशवा को संसार संघ (यू.एन.ओ) का बेताज बादशाह बना दिया।
एक बार संसार संघ के बारे में राजा साहब ने बोलते हुए कहा कि “संसार संघ का विचार ब्रज क्षेत्र में जन्मा, ईरान की राजधानी तेहरान में विचार ने मूर्त रूप लिया”। मास्को में राजा साहब ने लिखित रूप धारण किया और प्रचार प्रसार बर्लिन से हुआ। राजा साहब ने आगे कहा “मैं एक ऐसा स्वतंत्र एवं किस्मत का खुद फैसला करने वाला आर्यन् देश चाहता हूं जिसमें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई इत्यादि सब मिलकर रहें। विश्व की एक राजधानी हो और एक सरकार। सारी दुनिया को राज्यों में बांटा जाए। संपूर्ण एशिया एक आर्यन् स्टेट होगी जिसमें भारत, चीन, तिब्बत, मंगोलिया, ईरान, ईराक, अफगान आदि समस्त देश आर्यन् होंगे”।

राजा साहब आगे लिखते हैं कि “गांधी और उसके पिछलग्गुओं ने इस सशस्त्र क्रांति का विरोध कर अंग्रेजों का साथ दिया है”। ०६ एवं ०९ अगस्त १९४५ की बम्ब घटना ने युद्ध का पासा पलट दिया और राजा साहब को अमेरिका ने जापान का समर्थक मानकर सुगानो जेल में डाल दिया।

इनकी पुत्री ‘भक्ति’ ने सारा जीवन विवाह नहीं किया क्योंकि विवाह की योग्यता के समय राजा विदेशों में रह कर आजादी को संघर्ष कर रहे थे और भक्ति देवी ने प्रण कर रखा था कि “जब तक पिताजी नहीं लौटेंगे मैं विवाह नहीं करूंगी” । १४ फरवरी १९४६ को अमेरिका ने राजा साहब को सुगानो जेल से रिहा किया। लगभग ३२ वर्ष बाद आर्यन् पेशवा ने भारत भूमि पर पग रखे तब तक भक्ति देवी की आयु विवाह की योग्यता से निकल चुकी थी। यह एक नारी का राष्ट्र की स्वतंत्रता के योगदान में कितना बड़ा तप था ऐसी मिसालें भारत में ही नहीं विश्व में भी ढूंढने से नहीं मिलती। ९ अगस्त १९४६ को भारत में लगभग ३२ वर्ष के निष्कासन के बाद वृंदावन पहुंच कर अपने पहले भाषण में कहा था “जब एक भारतीय नौजवान इंग्लैंड में जाकर भरी सभा में जनरल डायर को सरेआम गोलियों से भून सकता है तो यहां अंग्रेज कैसे राज कर सकते हैं। २४ घंटे में दीनबंधु सर छोटूराम की चेतावनी से जिन्ना पंजाब से भाग सकता है तो मुस्लिम लीग पाकिस्तान कैसे बनवा सकती है। मैं ब्रिटिश सेना के सैनिकों से कहता हूं कि ब्रिटिश आदेशों का हुकुम ना माने, ब्रिटिश साम्राज्य का अंत निकट है। गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजों को जाना ही होगा। उन्हें याद रखना चाहिए कि उनका सामना मुरसान नरेश महेंद्र प्रताप से है अतः चुपचाप चले जाने में भलाई है”। उन्होंने नारा दिया दिल्ली पकड़ो आगे बढ़ो। आजादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

१९५६ में मुरसान नरेश राजा महेंद्र प्रताप ने मथुरा से लोकसभा का चुनाव लड़ा। पूर्व प्रधानमंत्री स्व• अटल बिहारी एवं कांग्रेस के दिग्गज जाट नेता दिगम्बर सिंह को चुनावों में ऐसी पटखनी दी कि अटल बिहारी वाजपेयी की जमानत भी जब्त हो गई। उनका दिल्ली पकड़ो का स्वप्न पूरा हुआ।

आर्यन पेशवा महेंद्र प्रताप की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कितनी महती भूमिका है यह तो पाठक एवं सुधी श्रोता ही निर्णय करेंगे। लेकिन गोरों को तो छोड़ो, सत्ता की मलाई खाने वालों में ऐसे अनेक महामहिमों की आज भी उपेक्षा हो रही है। वर्तमान सृष्टि में सर्वाधिक अज्ञातवास राजा साहब का रहा है। संसार का प्रथम राजा जिसने अपनी संपूर्ण संपत्ति तकनीकी शिक्षा प्रेम महाविद्यालय को दान में दी। यह सब आर्य संस्कृति से प्रभावित होकर न्योछावर किया। वे हिन्दू के स्थान पर आर्यन् राष्ट्र का सपना साकार करना चाहते थे। ऐसे क्रांतिकारी आर्यन् पेशवा राजा महेंद्र प्रताप २९ अप्रैल १९७९ को स्वर्ग यात्रा को प्रस्थान कर राष्ट्र भावना की प्रेरणा के अद्भुत देवदूत बन गये थे।

विशेष प्रसंग

१. देश के बंटवारे पर राजा साहब ने महात्मा गांधी को खूब फटकारा। दो अंग्रेज अधिकारी विल जॉनसन एवं कायल जॉनसन लिखते हैं कि राजा साहब देश के बंटवारे के कट्टर विरोधी थे। वे कहते थे कि इन नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ेगा, नागरिकों का खून बहता रहेगा और सीमा पर लाशें गिरती रहेंगी। गांधी, नेहरू को डर था कि राजा साहब कहीं अस्थाई हिन्द सरकार को स्थाई हिन्द सरकार में ना बदल दें। एशिया के अनेक देश राजा को सरकार बनाने की मान्यता दे सकते हैं ऐसे में मेरी प्रधानमंत्री की कुर्सी खिसकने में देर नहीं लगेगी।

२. देश स्वतंत्र होने के बाद पाक राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री ने कराची में एक विशाल भोज का आयोजन किया। इसमें राजा साहब को सादर आमंत्रित किया। भोज में एक मुसलमान मंत्री ने कहा कि राजा साहब आप तो पाकिस्तान को मिटाना चाहते थे। इससे पहले राजा साहब कुछ कहते वहां के प्रधानमंत्री लियाकत खां बोल उठे कि “राजा साहब तो हिंदुस्तान को भी मिटाने की बात करते हैं वे तो आर्यन् देश बनाना चाहते हैं। भई हम तो उनकी योजना पर खुश हैं। राजा साहब नेहरू को मना लें, मैं आपकी योजना पर हस्ताक्षर कर दूंगा”। राजा साहब ने नेहरू से दोनों देशों को एक करने की सलाह दी तो नेहरू ने कहा कि राजा साहब जैसे तैसे इनसे पीछा छूटा है इन्हें फिर से मत मिलाओ। इस पर राजा साहब ने नेहरू से स्पष्ट कहा कि “आपकी हठधर्मी भविष्य में खतरनाक सिद्ध होगी। जब तक पाकिस्तान है बर्बादी होती रहेगी।” स्वतंत्रता आंदोलन के समस्त प्रथम पंक्ति के नेताओं की गांधी एवं नेहरू के सामने हैसियत इतनी बोनी हो गई थी कि सब तमाशबीन बनकर रह गए थे। चिंतन करने का विषय है कि आर्यन् पेशवा ने आर्यन् राष्ट्र की बात सोच समझ कर रखी थी कि विश्व का मुसलमान अपने को हिन्दू ना कहकर आर्यन् होने में अपना स्वाभिमान समझता है। क्योंकि उनके शब्दकोश में हिन्दू का अर्थ काफिर, चोर, लुटेरा है और आर्य ही श्रेष्ठ है। अतः वर्तमान नेताओं को चिंतन करने का शुभावसर है कि राजा महेंद्र प्रताप का विचार समस्त भूमंडल को प्रेरणास्पद है। आदि ऋषि ब्रह्मा से लेकर गौतम, कपिल, कणाद, भृगु, श्रीराम, योगीराज कृष्ण,मदालसा, मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, घोषा, सीता, सावित्री, अनुसूया, महर्षि वेदव्यास, जैमिनी पर्यंत सभी ने आर्य संस्कृति का संवर्धन किया है। इसे महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने कालजयी ग्रंथ “सत्यार्थ प्रकाश” में भी उद्धृत किया है।

“राष्ट्रपिता कौन महात्मा गांधी या राजा महेंद्र प्रताप” पुस्तक एवं उनके भाषण के अंश”

संकलन
गजेंद्र सिंह आर्य
राष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता
जलालपुर(अनूपशहर)
बुलंदशहर
उत्तर प्रदेश – 203390
+91-9783897511

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