कश्मीर के बिगड़ते हालात: भारत के लिए चिंताजनक

Untitledअरविंद जयतिलक
प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दौरे के एक दिन पूर्व आतंकियों द्वारा श्रीनगर में थल सेना के काफिले पर हमला जम्मू-कश्मीर के बिगड़ते हालात के ही संकेत हैं। इस आतंकी हमले में 8 जवान शहीद हुए हैं और दो दर्जन घायल। हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन ने ली है। उसने धमकी भी दी है कि आगे भी इस तरह के हमले हो सकते हैं। यह आका पहले से थी कि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी भारत दौरे पर हैं और प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का जम्मू-कश्मीर दौरा प्रस्तावित है, ऐसे में आतंकी खून-खराबा कर सकते हैं। लेकिन वे थल सेना के काफिले पर ही हमला बोल देंगे इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। दरअसल इस आतंकी घटना को अंजाम देने का मकसद सुरक्षा बलों के मनोबल को तोड़ना, जम्मू-कश्मीर की शांति में खलल डालना और देश दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना है। भारत में जब भी कोई विशिष्ट विदेशी अतिथि आता है या भारत के प्रधानमंत्री जम्मू-कश्मीर दौरे पर जाते हैं तो आतंकी संगठन इस तरह के हिंसा का सहारा लेते ही हैं। उनका मकसद जम्मू-कश्मीर को सूर्खियों में लाकर भारत की छवि खराब करना होता है। 1998 में प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के दौरे के एक दिन पहले ही आतंकियों ने तकरीबन दो दर्जन कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी। मई, 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जम्मू-कश्मीर दौरे के समय हुर्रियत नेता अब्दुल गनी लोन की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। अक्टुबर 2009 में डॉ0 मनमोहन सिंह के जम्मू-कष्मीर दौरे के समय आतंकियों ने घाटी में अस्थिरता फैलायी। इसी तरह अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के समय भी घाटी में नरसंहार किया गया। लेकिन आश्चर्य हैं कि हमले के अंदेशा के बावजूद भी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं किया गया। इस ढिलाई के जो भी कारण रहे हों लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। ठीक है कि प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी रही और आतंकी संगठनों को विघ्न-बाधा पैदा करने का मौका नहीं मिला। लेकिन उन्होंने जिस तरह तीन दिनों में ताबड़तोड़ दो आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया उससे हमारी सुरक्षा-व्यवस्था की पोल जरुर खुल गयी हैं। आतंकियों का यह हमला केंद्र व जम्मू-कष्मीर की सरकार को आईना दिखाने वाला है। इसलिए कि अकसर उनके द्वारा दलील दी जाती है कि आतंकी कमजोर पड़ रहे हैं और उन्हें स्थानीय समर्थन मिलना बंद हो गया है। लेकिन इस हमले से स्पश्ट है कि आतंकी कमजोर नहीं पड़े हैं और न ही स्थानीय लोगों का उन्हें समर्थन मिलना बंद हुआ हैं। नहीं भूलना चाहिए कि अभी पिछले वर्ष ही उनके डर से कई दर्जन पंचायत प्रतिनिधियों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और मुखालफत करने वाले सरपंचों का सिर कलम कर दिया गया। उमर सरकार पंचायत प्रतिनिधियों को सुरक्षा देने में नाकाम रही। आतंकियों का सेना पर ताजा हमला इस बात का संकेत है कि वे जम्मू-कश्मीर को पुन: धधकाने का मन बना लिए हैं। उनकी रणनीति में भारी बदलाव भी देखा जा रहा है। पहले वे सुरक्षा बलों से सीधे मुठभेड़ करते थे लेकिन अब वे उनपर घात लगाकर हमला कर रहे हैं। इससे उन्हें कम नुकसान उठाना पड़ रहा है और भागने में मदद भी मिल रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले साल के शुरुआती छ: महीने की तुलना में आतंकियों के शिकार बने सुरक्षा बल के जवानों की संख्या में आठ गुना वृद्धि हुई है। जबकि मारे गए आतंकियों की संख्या लगभग आधी रह गयी है। गृहमंत्रालय के मुताबिक 2012 के शुरुआती छ: महीने में आतंकियों के हमले में केवल 3 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे, जबकि इस साल इनकी संख्या बढ़कर 24 हो गयी है। पिछले साल सुरक्षा बलों ने 26 आतंकियों को मार गिराया था, लेकिन इस साल सिर्फ 14 आतंकी ही मारे गए हैं। ये आंकड़े साबित करते हैं कि घाटी में आतंकियों की ताकत बढ़ी है। देश के हुक्मरानों को समझना होगा कि जब तक जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी शक्तियां मौजूद रहेंगी और उन्हें पाकिस्तान का संरक्षण मिलता रहेगा तब तक आतंकवाद को खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन विडंबना है कि केंद्र की यूपीए सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही है। आतंकियों को मदद पहुंचाने वाले अलगाववादियों पर न तो सख्ती बरत रही है और न ही पाकिस्तान पर किसी तरह का दबाव बना रही है। जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता अनेकों बार दिल्ली आकर देश विरोधी तकरीर कर चुके हैं। लेकिन केंद्र सरकार एक बार भी उनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं दिखायी। देश-दुनिया को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से भारत झुलस रहा है। उसका सबसे बड़ा मददगार साथी अमेरिका भी कह चुका है कि वह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मिल रही मदद को विकास कार्यों पर खर्च करने के बजाए भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों पर लूटा रहा है। लेकिन तमाशा है कि केंद्र सरकार पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई तो दूर विरोध जताने से भी बच रही है। इसके जो भी कारण हों लेकिन इस शुतुर्गमुर्गी आचरण से अलगाववादियों और आतंकियों का हौसला बुलंद है। हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की सरकार ने वित्तीय वर्श 2013-14 के अपने बजट में भारत के खिलाफ आग उगलने वाले जमात-उद-दावा के सबसे बड़े केंद्र को करोड़ों रुपए आवंटित किए हैं। गौरतलब है कि जमात-उद-दावा प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा है और उसका नेता हाफिज सईद है जिसने मुंबई आतंकी घटना को अंजाम दिया। भारत सरकार एक अरसे से उसकी मांग कर रही है लेकिन पाकिस्तान उसे सौंपने को तैयार नहीं है। अब पाकिस्तान के नवनियुक्त प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ से पूछा जाना चाहिए कि उनके देश की एक प्रांतीय सरकार एक आतंकी संगठन को मदद क्यों दे रही है? वैसे भी नवाज शरीफ ने वादा किया था कि वह भारत से बेहतर संबंध स्थापित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन इस घटना से उनकी शराफत की पोल खुल गयी है। भारत की समझदारी इसी में है कि वह जम्मू-कश्मीर में पसरे आतंकियों और अलगाववादियों के साथ कड़ाई से पेश आए। नरमी बरतकर उनका हृदय परिवर्तन नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद से ही जम्मू-कश्मीर को मुख्य धारा में लाने का प्रयास हो रहा है। लेकिन अलगाववादी तत्व लगातार रोड़ा अटकाने का काम कर रहे हैं। दरअसल उनका मकसद येनकेनप्रकारेन जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करना है। इसके लिए वे कभी जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता का राग अलापते हैं तो कभी मानवाधिकार हनन के बहाने अफस्पा का विरोध करते हैं। विडंबना यह कि भारत में बैठे कुछ तथाकथित मानवाधिकारवादी भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं। भारत सरकार भी उनकी गैरजरुरी मांग पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त कर मामले को और उलझाती रहती है। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार पैकेज से शांति खरीदने की नीति का परित्याग कर दूरदृष्टि अपनाए। बेशक जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए केंद्रीय मदद जरुरी हैं। लेकिन इसका उद्देश्य अलगाववादियों और आतंकियों को खुश करना नहीं होना चाहिए। पैकेज नीति से जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली तो नहीं हो पायी लेकिन भ्रष्टाचार को जरुर बढ़ावा मिला है। 1989 से लेकर अब तक जम्मू-कश्मीर को लाखों करोड़ रुपए का पैकेज मिल चुका है। लेकिन उस हिसाब से विकास को गति नहीं मिली हैं। कश्मीर संबंधी सीएजी के रिपोर्ट से भी खुलासा हुआ है कि पूर्व में केंद्र से प्राप्त धनराशि का राज्य सरकार के पास कोई हिसाब नहीं हैं। मतलब साफ हैं कि धन का समुचित सदुपयोग नहीं हुआ हैं। ऐसे में सवाल बनता ही हैं कि फिर जम्मू-कश्मीर को विकास का पंख कैसे लगेगा और शांति बहाली की उम्मीद कैसे जगेगी? दिलचस्प पहलू यह हैं कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुला काफी पहले कह चुके हैं कि जम्मू-कष्मीर की समस्या आर्थिक और रोजगार के पैकेज से हल होने वाली नहीं है। यह एक राजनैतिक समस्या हैं और समाधान भी राजनैतिक ही होगा। लेकिन विडंबना है कि देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जो बाजार को संभालने में तो नाकाम रहे लेकिन पैकेज से शांति खरीदने का मोह अभी भी पाले हुए हैं। लेकिन यह सौदा देश के जवानों की जिंदगी पर भारी पड़ रही है।

Comment:

Latest Posts

betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
Runtobet Giriş
betpark giriş
betgaranti
Runtobet Giriş
casinolevant giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
kolaybet
bettilt
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
runtobet 2026
hititbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant
casinolevant
casinolevant
sahabet giriş
runtobet giriş
sahabet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betlivo giriş
betlivo giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
bettilt
celtabet giriş
celtabet giriş
casinolevant giriş
bettilt giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
casibom giriş
casibom giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
otobet giriş
otobet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
otobet giriş
otobet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
fixbet giriş
betsat giriş
betsat giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
otobet giriş
otobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betbox giriş
betbox giriş
betbox giriş
betbox giriş
restbet giriş
restbet giriş