आदर्श शासन व्यवस्था के लिये आवश्यक है कि सत्ता का नेतृत्व करने वाले जनता के प्रति ‘संरक्षक’ की भूमिका में रहे

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ललित गर्ग

शांतिपूर्ण शासन व्यवस्था एवं सुशासन के लिये जरूरी है कि आम-जनजीवन में कम-से-कम सरकारी औपचारिकताएं हों, कानून कम हो, सरकारी विभाग कम-से-कम हों। कुछ राज्य ऐसे हैं जहां 20-25 सरकारी विभाग होने चाहिए, लेकिन उनकी संख्या 50-60 से अधिक है।

सत्ता एवं समाज को विनम्र करने का हथियार मुद्दे या लॉबी नहीं, पद या शोभा नहीं, ईमानदारी है और सुशासन है। और यह सब प्राप्त करने के लिए ईमानदारी के साथ सौदा नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह भी एक सच्चाई है कि राष्ट्र, सरकार, समाज, संस्था व संविधान ईमानदारी से चलते हैं, न कि झूठे दिखावे, आश्वासन एवं वायदों से। सत्ता की कमान संभालते वक्त हर सरकार बेहतर सुशासन देने के दावे करती है, मगर हकीकत में वे दावे सिरे नहीं चढ़ पाते, कोरे दिखावे साबित होते हैं। सुशासन यानी चुस्त कानून-व्यवस्था, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और सेवाएं, कारोबार और रोजगार के अच्छे अवसर, कथनी और करनी में समानता, नागरिक सुरक्षा एवं संरक्षा आदि। ये सब बातें सिर्फ पक्ष या विपक्ष में बंटे नागरिकों के संतोष या असंतोष पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि नागरिक जीवन की खुशहाली, सुरक्षा एवं शांतिपूर्ण जीवन निर्वाह के पैमाने पर तय होती है।

आजकल सरकारों के सुशासन एवं आदर्श-कार्यशैली का मूल्यांकन केवल चुनाव के वक्त ही नहीं होता बल्कि कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां इस तरह का अध्ययन करके मूल्यांकन करने लगी हैं। इस तरह के मूल्यांकन के मुख्य मानक हैं कि दुनिया के किस देश, किस राज्य और शहर में नागरिक सुविधाओं की क्या स्थिति है। बंगलुरू की पब्लिक अफेयर सेंटर नामक एजेंसी ने सार्वजनिक मामलों को लेकर भारत के विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों का अध्ययन किया है और उन्हें अंकों के आधार पर वर्गीकृत करते हुए बताया है कि केंद्र शासित प्रदेशों में सुशासन के स्तर पर चंडीगढ़ सबसे ऊपर है। राज्यों में केरल शीर्ष पर और दक्षिण के दूसरे सभी राज्य ऊपर के पायदान पर हैं तो उत्तर प्रदेश, बिहार और ओड़ीसा सबसे खराब स्थिति में हैं। उत्तर प्रदेश सबसे निचले पायदान पर है। अभी कुछ दिनों पहले ही एक दूसरी एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि कारोबार करने की दृष्टि से उत्तर प्रदेश में स्थितियां बाकी सभी राज्यों की तुलना में सबसे बेहतर है। इसी तरह के विरोधाभास दूसरे कुछ राज्यों के मामले में भी उभर सकते हैं।

सुशासन के लिये जरूरी है दायित्व और उसका ईमानदारी से निर्वहन। लेकिन विडम्बना है कि सरकारें न तो दायित्व ढंग से ओढ़ती हैं और न ओढ़े हुए दायित्वों का ईमानदारी से निर्वाह करती हैं। दायित्व और उसके ईमानदारी से निर्वहन करने की अनभिज्ञता संसार में जितनी क्रूर है, उतनी क्रूर मृत्यु भी नहीं होती। सुशासन समग्र प्रयास से स्थापित होता है। यह एकांगी कभी नहीं हो सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि लचीली नीतियां बनाकर या कुछ प्रलोभन देकर राज्य में कारोबार के लिए स्थितियां तो बेहतर बना ली जाएं, पर अपराध और भ्रष्टाचार रोकने के मामले में शिथिलता बरतते रहें। जब किसी राज्य में सुशासन और खुशहाली आंकी जाती है तो उसमें देखा जाता है कि वहां के लोगों का जनजीवन कैसा है, उन्हें सार्वजनिक सुविधाएं-सड़कें, अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन, बिजली-पानी, सुरक्षा-व्यवस्था कितनी नियोजित प्राप्त है, वहां स्वास्थ्य, शिक्षण संस्थाएं कैसी हैं। वहां के किसान, दुकानदार कितने सहज महसूस करते हैं। महिलाएं और समाज के निर्बल कहे जाने वाले तबकों के लोग कितने सुरक्षित हैं। प्रशासन से आम लोगों की कितनी नजदीकी है। अगर कोई अपराध होता है तो दोषियों की धर-पकड़ में कितनी मुस्तैदी दिखाई जाती है और कितने न्यायपूर्ण तरीके से उसे निपटाया जाता है।

बंगलुरू के जिस संस्थान ने राज्यों में सुशासन संबंधी ताजा रिपोर्ट जारी की है, उसने भी समानता, पारदर्शिता, सतर्कता, विकास और निरंतरता के आधार पर अध्ययन किया। इन बिंदुओं का महत्व समझा जा सकता है। इन्हीं के आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले दिनों में किन राज्यों का देश के आर्थिक विकास में कैसा और कितना योगदान रह सकता है। टिकाऊ विकास के मामले में इनसे कितनी मदद मिल सकती है। कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का दायरा छोटा और उनकी आबादी कम होती है, इसलिए कानून-व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं के मामले में बेहतर काम हो पाते हैं, मगर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे बड़े और सघन आबादी वाले राज्यों में सरकारों के सामने कई मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। मगर यह तर्क जिम्मेदारियों से बचाव का कोई रास्ता नहीं हो सकता। राज्यों को उनके आकार और आबादी के हिसाब से बजटीय आवंटन किए जाते हैं, उनकी आमदनी भी उसी अनुपात में छोटे राज्यों की अपेक्षा अधिक मानी जा सकती है। ऐसे में अगर बुनियादी स्तर पर वे बेहतर काम नहीं कर पातीं, तो यह उनकी नाकामी ही कही जाएगी। सुशासन के मामले में पिछड़े हर राज्य को अपने से बेहतर राज्यों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

शांतिपूर्ण शासन व्यवस्था एवं सुशासन के लिये जरूरी है कि आम-जनजीवन में कम-से-कम सरकारी औपचारिकताएं हों, कानून कम हो, सरकारी विभाग कम-से-कम हों। कुछ राज्य ऐसे हैं जहां 20-25 सरकारी विभाग होने चाहिए, लेकिन उनकी संख्या 50-60 से अधिक है। कई राज्य ऐसे भी हैं जहां पुराने और अप्रासंगिक कानूनों का ढेर जमा है। वे सुशासन में बाधक भी हैं और जन-जीवन के लिये जटिल भी हैं। आदर्श-शासन व्यवस्था में राज्य सरकारें बेकार के इन कानूनों से पीछा छुड़ाएं। अच्छा हो कि राज्य सरकारें भी समझें कि पुराने कानूनों की मौजूदगी नौकरशाही के काम करने के तौर-तरीकों से सबसे अधिक नुकसान उनका ही हो रहा है। जन कल्याण और विकास की चाहे जितनी बेहतर नीतियां हों, यदि उन पर सही ढंग से अमल करने वाला सरकारी तंत्र नहीं होगा तो फिर कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। राज्य सरकारें हर स्तर पर सुशासन कायम करके ही अपने वायदों को पूरा करने के साथ ही आम जनता के जीवन को खुशहाल बना सकती हैं।

सुशासन की बाधाओं में एक बड़ी बाधा है कि सरकारें बिना योजनाबद्ध तरीके से काम को अंजाम देती हैं। ऐसी सरकारें कार्य पहले प्रारम्भ कर देती हैं और योजना बाद में बनाती हैं, वे परत-दर-परत समस्याओं व कठिनाइयों से घिरी रहती हैं। उनकी मेहनत सार्थक नहीं होती। उनके संसाधन नाकाफी रहते हैं और वे चाह कर भी जनता की भावनाओं पर खरी नहीं उतर पाती हैं। कमजोर शरीर में जैसे बीमारियां घुस जाती हैं, वैसे ही कमजोर नियोजन और कमजोर शासन व्यवस्था से कई-कई असाध्य रोग लग जाते हैं और वे सुशासन की बड़ी बाधा बन जाते हैं। सत्ता को हांकने वाले अपने नाम, पद व शोभा को ही ओढ़ पाते हैं। जबकि दायित्व और चुनौतियां उनसे कई गुना ज्यादा होती हैं। इस प्रकार के दृश्य आज ऊपर से नीचे तक नजर आते हैं, जहां नियोजन में कल्पनाशीलता व रचनात्मकता का नितांत अभाव रहता है और लक्ष्य सोपान पर ही लड़खड़ा जाता है। नियमितता तो हमने सीखी ही नहीं और सीखेंगे भी नहीं। आजकल एक प्रवृत्ति और चल पड़ी है, मुद्दों की। कौन-सा मुद्दा जनहित का है, उन्हें कोई मतलब नहीं। कौन-सा स्वहित का है, उससे मतलब है। और दूसरी हवा जो चल पड़ी है, लॉबी बनाने की, ग्रुप बनाने की। इसमें न संविधान आड़े आता है, न सिद्धांत क्योंकि ”सम विचार” इतना खुला शब्द है कि उसके भीतर सब कुछ छिप जाता है। छोटे प्रांत हों या बड़े प्रांत सभी शासन-व्यवस्था में लॉबी का रोग लग गया है। जो शक्ति शासन व समाज के हित में लगनी चाहिए, वह गलत दिशा में लग जाती है। सिद्धांत और व्यवस्था के आधारभूत मूल्यों को मटियामेट कर सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक स्तर पर कीमत वसूलने की कोशिश की जाती हैं। सत्य को ढंका जाता है या नंगा किया जाता है पर स्वीकारा नहीं जाता। और जो सत्य के दीपक को पीछे रखते हैं वे मार्ग में अपनी ही छाया डालते हैं। और ऐसे लोग सुशासन के नाम पर एक गाली बन जाते हैं।

हमारे कर्णधार पद की श्रेष्ठता और दायित्व की ईमानदारी को व्यक्तिगत अहम् से ऊपर समझने की प्रवृत्ति को विकसित कर मर्यादित व्यवहार करना सीखें अन्यथा शतरंज की इस बिसात में यदि प्यादा वज़ीर को पीट ले तो आश्चर्य नहीं। बहुत से लोग काफी समय तक दवा के स्थान पर बीमारी ढोना पसन्द करते हैं पर क्या वे जीते जी नष्ट नहीं हो जाते? खीर को ठण्डा करके खाने की बात समझ में आती है पर बासी होने तक ठण्डी करने का क्या अर्थ रह जाता है? एक आदर्श शासन व्यवस्था के लिये जरूरी है कि सत्ता का नेतृत्व करने वाले आज जनता के विश्वास का उपभोक्ता नहीं अपितु संरक्षक बनें।

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