उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनौतियां

अरविंद जयतिलक
गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार की कमान सौंपने और उनके सेनापति अमित शाह को यूपी का प्रभारी नियुक्त करने के बाद भाजपा आश्वस्त है कि यूपी में उसका जादू चल जाएगा। कमल खिल उठेगा और और वह सत्ता का भोग लगाने में कामयाब होगी। शायद उसके आत्मविश्वास का आधार अमित शाह हैं जिनके कुशल चुनावी प्रबंधन की वह कायल है। लेकिन भाजपा को समझना होगा कि उत्तर प्रदेश गुजरात नहीं है। यह जातिवाद और क्षेत्रवाद का खौलता हुआ कुंड है जिससे अमृत निकालने के लिए अमित शाह को नाकों चने चबाने पड़ेगें। वैसे भी भाजपा उत्तर प्रदेश में डेढ़ दशक से सत्ता से ही नहीं बलिक सियासी मुकाबले से भी बाहर है। मौजूदा हालात भी उसके बहुत अनुकूल नहीं है। सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश की सियासी जंग सपा और बसपा के बीच सिमटकर रह गयी है और भाजपा हाशिए पर है। अगर पिछले पांच विधानसभा चुनावों पर गौर फरमाएं तो भाजपा का मत प्रतिशत लगातार घटता गया है। 1996 के विधानसभा चुनाव में उसे 33.31 फीसद वोट के साथ कुल 174 सीटों पर विजय मिली जबकि 2002 के विधानसभा चुनाव में उसे 88 सीटों पर संतोष करना पड़ा और 25.30 फीसद मत हासिल हुआ। 2007 के विधानसभा चुनाव में उसकी स्थिति और बदतर हुई। उसे 19.51 फीसद मत और 51 सीटें हासिल हुई। 2012 के विधानसभा चुनाव में उसका मत प्रतिशत गिरकर 16.97 फीसद पर आ गया। यानी देखा जाए तो इन डेढ़ दशक में उसे 10 फीसद मत का नुकसान हुआ है। इसी तरह लोकसभा चुनाव में भी उसकी हालत दिनोंदिन पतली हुई है। एक दौर था जब उत्तर प्रदेश में वह पांच दर्जन लोकसभा सीटें अपनी झोली में डालने में सफल रही। लेकिन आज उसकी झोली में दर्जन भर सीट नहीं है। उसकी हालत कितनी दयनीय है इसी से समझा जा सकता है कि डेढ़ दशक में जितने उपचुनाव भी हुए हैं उसमें उसका प्रदर्शन बेहद शर्मनाक रहा। उसके उम्मीदवार निर्दलीय उम्मीदवारों से भी कम वोट पाए। हाल ही में हंडिया उपचुनाव में उसके उम्मीदवार को कुल चार हजार मत हासिल हुए और वह चौथे स्थान पर रहा। यह स्थिति इस बात का धोतक है कि जनता के बीच भाजपा की साख डूबी है। ऐसे में अमित शाह किस जादू की छड़ी से भाजपा की किस्मत संवार देंगे यह समझना कठिन है। आज उत्तर प्रदेश भाजपा का सांगठनिक ढांचा पूरी तरह बिखर चुका है। उसके काडर निराशा के भंवर में मुचिर्छत हैं। क्षत्रपों के बीच गुटबाजी और पदलोलुपता इस कदर है कि वे पार्टी को मजबूत करने के बजाय एकदूसरे को निपटाने में लगे हैं। हालांकि बिगड़े को सुधारना कोई कठिन काम नहीं है। लेकिन उसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशकित की जरुरत होती है जो कि भाजपा के पास नहीं है। सवाल सिर्फ भाजपा के कमजोर सांगठनिक ढांचा और उसके क्षत्रपों के बीच आपसी तनातनी तक ही सीमित नहीं है। सवाल उसकी मंशा, नीयत और नीति को लेकर भी है। अमित शाह ने यूपी में कदम रखते ही अयोध्या की परिक्रमा कर राममंदिर निर्माण के मसले को उछाला है उससे संदेश यही गया है कि भाजपा जनसरोकार से जुड़े मुददों को लेकर संवेदनशील नहीं है और उसका मकसद वोटयुकित के लिए प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराना है। भाजपा से पूछा भी जा रहा है कि चुनाव के दौरान ही उसे राममंदिर निर्माण की चिंता क्यों सताती है? जब वह सत्ता में होती है तो रामजी याद क्यों नहीं आते हैं? इन सवालों का जवाब भाजपा के पास नहीं है। भाजपा को समझना होगा कि राजनीति पलटकर वार भी करती है। ठीक है कि राममंदिर मुददा के सहारे वह यूपी में सत्ता का भोग लगाने में कामयाब रही। लेकिन उसे यह भी याद रखना होगा कि इस मुददे ने उसे राजनीति के विराट संसार में अछूत भी बना दिया है। वैसे भी सरयू में पानी बहुत बह चुका है और यह मुददा गरमाहट पैदा नहीं कर सकता। बावजूद इसके भाजपा इस मसले पर लोगों की संवेदनाओं को भड़काती है तो उसे अपने अंदेशो को सही-गलत होते देखने को तैयार रहना होगा। आज भाजपा दुर्दशा की शिकार है तो इसके लिए उसकी यह सोच ही जिम्मेदार है। एक समय था जब वह खुद को ‘पार्टी विद ए डिफरेंस कहती थी। लेकिन जिस तरह उसने बसपा से मिलकर तीन बार सत्ता की साझेदारी की उससे उसकी विचारधारा की पोल खुल गयी है। मजे की बात यह है कि सत्ता के बंदरबांट में मायावती तो अपनी जमीन पुख्ता करने में कामयाब रही लेकिन वह अपनी दरकती जमीन संभाल नहीं पायी। साथ ही उसे अपने समर्पित कार्यकताओं से भी हाथ धोना पड़ा। कहना गलत नहीं होगा कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी की वजह से ही भाजपा को लगतार उत्तर प्रदेश में मुंह की खानी पड़ी है। अमित शाह कार्यकर्ताओं के मन में व्याप्त हताशा को कैसे दूर करेंगे यह देखना दिलचस्प होगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सबसे बड़ी समस्या पार्टी में व्याप्त अनुशासनहीनता है। शीर्ष नेतृत्व की डांट-डपट के बाद भी क्षत्रप सिरफुटटौवल से बाज नहीं आ रहे हैं। उनकी चिंता पार्टी हित के बजाए स्वहित को लेकर है। नतीजा सामने है। इस डेढ़ दशक में भाजपा में ऐसा कोई धाकड़ नेतृत्व उभरकर सामने नहीं आया जो दरकती सियासी जमीन को संभाल सके और जनमानस का चहेता बने। ऐसा नहीं है कि इस सच्चाई से भाजपा शीर्ष नेतृत्व अवगत नहीं है। लेकिन उसमें क्षत्रपों की बांह मरोड़ने की ताकत नहीं है।
या यूं कह लें कि वह स्वयं इतना कमजोर है कि क्षत्रप ही उन्हें दण्ड-बैठक करा देते हैं। अगर समय रहते शीर्ष नेतृत्व अनुशासनहीन क्षत्रपों को बाहर का रास्ता दिखा दिया होता तो आज उत्तर प्रदेश में भाजपा की यह दुर्दशा नहीं होती। मजे की बात यह कि उसे अब अपनी सैद्धांतिक विचारधारा और सिद्धांतो पर भी भरोसा नहीं रह गया है। शायद वह इस नतीजे पर जा पहुंची है कि दलीय कार्यक्रम और सैद्धांतिक नीतियों के बूते चुनावी जंग जीती नहीं जा सकती। यही वजह है कि उसका आचरण अवसरवादी दलों की तरह दिखने लगा है। आज भाजपा विकास, सुशासन और भाईचारा पर केन्द्रित होने के बजाए जाति आधारित राजनीति पर केन्द्रित है। और उसका नतीजा यह है कि वह कहीं की नहीं रही। माना जा रहा था कि वह आम आदमी से जुड़े मुददों को आगे बढ़ाएगी। मुख्य विपक्षी दल होने के नाते महंगाई और भ्रश्टाचार को चुनावी मुददा बनाकर देश में सार्थक बहस को परवान चढ़ाएगी। लेकिन वह इस मसलों पर अपनी मांद से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। अगर उसका रुख यही बना रहा तो उसे उत्तर प्रदेश में करारी शिकस्त मिलनी तय है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को कामयाबी तभी मिलेगी जब उसका सांगठनिक ढांचा मजबूत होगा और आपसी क्षत्रपों के बीच सिरफुटटौव्वल बंद होगा। उसे अपने जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के साथ ही जनसरोकार से जुड़े मुददों पर भी केन्द्रित होना होगा। लेकिन सच्चाई यह है कि उसका फोकस कहीं और है। ऐसे में मोदी के सेनापति अमित शाह अपनी कमाल की रणनीति से कमल कैसे खिलाएंगे यह अपने आप में जोखिम भरा सवाल है।

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş