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राजनीति

क्रिकेट मैच की तरह लड़ा जा रहा है बिहार का विधानसभा चुनाव

संतोष पाठक

प्रधानमंत्री के भाषण से बादल छंटने की बजाय़ और ज्यादा गहरा गए। ऐसे में एक बार फिर से यही कहा जा सकता है कि इस बार वाकई बिहार का विधानसभा चुनाव सिर्फ 2020 ही नहीं है बल्कि 20-20 के अंदाज में लड़ा भी जा रहा है।

वैसे तो राजनीति को अजग-गजब संभावनाओं का ही खेल माना जाता है लेकिन कई बार चुनावी राजनीति में कुछ ऐसा हो ही जाता है जो आम जनता के साथ-साथ राजनीतिक पंडितों को भी हैरान करने वाला होता है। 2020 का बिहार विधानसभा चुनाव भी जिस अंदाज में लड़ा जा रहा है वो काफी हैरान करने वाला है। पिछले कुछ महीनों से जो राजनीतिक सुगबुगाहट पटना से लेकर दिल्ली तक हो रही थी वो विधानसभा चुनाव की घोषणा होने तक थोड़ी-बहुत साफ तो हो गई थी लेकिन इसके बावजूद उसमें कई किंतु-परंतु लगे थे। ऐसे में सबकी नजरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बिहार रैली की तरफ थीं। सब यह कयास लगा रहे ते कि प्रधानमंत्री के भाषण से यह साफ हो जाएगा कि बिहार में कौन किसकी तरफ से…किसके लिए लड़ रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण से बादल छंटने की बजाय़ और ज्यादा गहरा गए। ऐसे में एक बार फिर से यही कहा जा सकता है कि इस बार वाकई बिहार का विधानसभा चुनाव सिर्फ 2020 ही नहीं है बल्कि 20-20 के अंदाज में लड़ा भी जा रहा है।

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर नीतीश कुमार ने अपने आपको मोदी विरोध के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया था। पटना में जुटे भाजपा नेताओं को भोज का निमंत्रण देकर थाली छीनने से लेकर 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की वजह से एनडीए गठबंधन का साथ छोड़ने तक नीतीश ने अपनी छवि एक ऐसे नेता की बना ली थी कि सबको खास कर मोदी विरोधियों को यह लगने लगा थी कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को टक्कर कांग्रेस के राहुल गांधी नहीं बल्कि जेडीयू के नीतीश कुमार ही दे सकते हैं।

उस समय यह भला कौन सोच सकता था कि एक ऐसा भी दौर आएगा जब नरेंद्र मोदी नीतीश कुमार के लिए चुनाव प्रचार करते नजर आएंगे। उस समय यह कौन सोच सकता था कि बिहार में नीतीश कुमार को लेकर मतदाताओं में इतना गुस्सा भर जाएगा कि उन्हे भी चुनाव जीत कर फिर से मुख्यमंत्री बनने के लिए मोदी के नाम का ही आसरा लेना पड़ेगा, लेकिन इस बार वाकई ऐसा ही हो रहा है।

बिहार के मतदाताओं के सामने भ्रम और दुविधा की स्थिति इतनी ज्यादा हो गई है कि उन्हे समझ ही नहीं आ रहा है कि किसकी सरकार बनाएं। एक तरफ नीतीश कुमार हैं जो पिछले 15 वर्षों से बिहार की सत्ता में बने हुए हैं। नीतीश कुमार जेडीयू-भाजपा गठबंधन के नेता और चेहरा हैं जिनके नाम पर और जिन्हे फिर से मुख्यमंत्री बनाने के घोषित लक्ष्य के साथ जनता दल-यू और भाजपा मिलकर चुनाव लड़ रही हैं तो दूसरी तरफ दिवंगत रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा है जो उनके बेटे चिराग पासवान के नेतृत्व में अकेले चुनाव लड़ रही है। चिराग चुनाव तो अकेले लड़ रहे हैं लेकिन उनका लक्ष्य खुद मुख्यमंत्री बनना नहीं है बल्कि वे भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने के उद्देश्य के साथ चुनावी मैदान में उतरे हुए हैं।

चिराग पासवान जम कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राजनीतिक हमला कर रहे हैं लेकिन साथ ही वो जम कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी कर रहे हैं। बिहार के चुनावी मैदान में उतरे पीएम मोदी ने भी मंच से रामविलास पासवान को श्रद्धांजलि देकर और चिराग के बारे में चुप्पी साध कर मतदाताओं की दुविधा को और ज्यादा बढ़ा दिया है।

1990 में लालू यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार ने कुछ ही सालों बाद लालू को हटाने का एकमात्र एजेंडा बना लिया था। 1994 के बाद नीतीश कुमार ने हर उस दल और नेता से हाथ मिलाया जो लालू यादव को सत्ता से हटाने में उनकी थोड़ी भी मदद कर सकता था। हालांकि ये और बात है कि लालू यादव के बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री बन गईं और नीतीश कुमार को इस परिवार को सत्ता से हटाने में 15 साल लग गए। 2005 में भाजपा के साथ मिलकर नीतीश ने बिहार में सरकार बनाई लेकिन नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय परिदृश्य पर आने के बाद पुराने सहयोगी भाजपा से संबंध तोड़कर लालू यादव के समर्थन से सरकार चलाते रहे। लालू यादव की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, फिर से मुख्यमंत्री बने और उनके दोनों बेटों तेज प्रताप और तेजस्वी को बिहार की राजनीति में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई। आज लालू के वही बेटे नीतीश को सत्ता से हटाने के लिए लड़ रहे हैं तो नीतीश कुमार उसी बीजेपी और नरेंद्र मोदी के सहयोग से सत्ता बचाने के लिए लड़ रहे हैं

इन परिस्थितियों को देखते हुए तो इतना ही कहा जा सकता है कि सभी राजनीतिक दल 20-20 के अंदाज में बैटिंग करने की तैयारी करके चुनावी मैदान में उतरे हैं। सबको इंतजार कुछ ऐसे ओवरों का है जिसमें वो ईवीएम पर चौके-छक्कों की बरसात कर सके लेकिन साथ ही सबकी नजरें दूसरी टीमों पर भी टिकी हुई हैं ताकि वो बेहतरीन गेंदबाजी करके उन्हें कम स्कोर पर आउट भी कर सकें।

नीतीश कुमार का लक्ष्य है गठबंधन में बीजेपी से ज्यादा सीटें हासिल करना और चिराग को कम से कम सीटों पर रोकना। वहीं भाजपा का घोषित स्टैंड चाहे जो भी हो लेकिन सब यह मान रहे हैं कि वो इस बार अपना मुख्यमंत्री बनाने के उद्देश्य के साथ चुनाव में उतरी है। ऐसे में जाहिर है कि भाजपा यह चाहती है कि वो नंबर वन पार्टी बन कर विधानसभा में जाएं, नीतीश कुमार की सीटें घटें और लोजपा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करे। चिराग ने तो अपना लक्ष्य पहले से ही घोषित कर रखा है।

वहीं तेजस्वी यादव चाहते हैं कि राजद सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरे, महागठबंधन को पूर्ण बहुमत मिले और अगर थोड़ी-बहुत कसर रह भी जाती है तो चिराग पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और ओवैसी जैसे नेताओं को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपने पाले में लाकर किसी तरह सरकार बनाई जाए।

और जैसा कि 20-20 के मैच में आमतौर पर अंतिम ओवरों में फैसला होता है तो यहां भी यही होना तय माना जा रहा है। बिहार में भी अंतिम ओवरों यानि बिल्कुल अंतिम समय पर ही यह फैसला होगा कि किसकी बैटिंग-बॉलिंग शानदार रही और कौन किस वजह से जीता। तब तक आप सब एक रोमांचक चुनावी मैच का लुत्फ उठाते रहिए।

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