भारतीय वैदिक संस्कृति में धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष की महत्ता

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अशोक प्रवृद्ध

आसान व सुलभ ढंग से जीवन -यापन के लिए प्रत्येक व्यक्ति को धन-सम्पदा से सम्पन्न और धन- संपदा के लिए सदैव प्रयत्नशील होना ही चाहिए, और इसमें कोई संदेह नहीं कि निष्ठापूर्वक परिश्रम अथवा साधना करने से मनुष्य को सफलता अर्थात कुछ निधियां अवश्य ही प्राप्त होती हैं। पौराणिक मान्यतानुसार अष्ट सिद्धियों की भांति ही नव निधियां भी किसी भी मनुष्य को असामान्य और अलौकिक शक्तियां प्रदान कर सकती हैं। भारतीय संस्कृति में प्रचलित नवनिधि अर्थात नौ निधियों का संबंध मुख्यतः धन- संपदा से ही है। संपदा में चल और अचल संपत्ति होती है। प्रत्येक व्यक्ति के धन प्रा‍प्ति के साधन अलग-अलग होते हैं और उनके धनार्जन का उद्देश्य भी पृथक- पृथक होता है। धनोपार्जन के तीन उपाय हैं -सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक उपाय से प्राप्त धन सात्विक और तामसिक तरीके से प्राप्त धन तामसिक कहलाता है। जीवन की प्रमुख दिशाएं तीन होती हैं- आत्मिक, बौद्धिक, सांसारिक। इन तीनों दिशाओं में आत्मबल बढ़ने से आनंददायक परिणाम प्राप्त होते हैं। आत्मिक क्षेत्र की तीन निधियां- विवेक, पवित्रता व शांति हैं। बौद्धिक क्षेत्र की तीन निधियां- साहस, स्थिरता तथा कर्तव्यनिष्ठा हैं और सांसारिक क्षेत्र की तीन निधियां- स्वास्थ्य, समृद्धि व सहयोग हैं। नव निधियों से सम्पन्न व्यक्तियों की अनेक पौराणिक कथाएं मार्कण्डेय पुराण, ब्रह्म पुराण, महाभारत आदि पुरातन ग्रन्थों में बहुतायत से अंकित प्राप्य हैं। पौराणिक ग्रन्थों में माता दुर्गा अष्ट सिद्धियों और नव निधियों की प्रदाता कही गई हैं। श्रीराम भक्त हनुमान को तो अष्ट सिद्धियों व नव निधियों का भंडार और प्रदाता ही कहा गया है। रामभक्त हनुमान को अष्ट सिद्धि नौनिधि का दाता माना गया है। दाता अर्थात देने वाला। हनुमान के भक्त को जहां अष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं वही श्रेष्ठ और सात्विक निधि का वरदान भी मिलता है। पुरातन ग्रन्थों में दक्षिण दिशा के दिक्पाल देवों के कोषाध्यक्ष कुबेर को भी नव निधियों से सम्पन्न बताया गया है। कुबेर को इन निधियों की प्राप्ति महादेव से हुई थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर न केवल भगवान शंकर ने उन्हें इन नव निधियों का दान दिया, अपितु उन्हें देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद भी प्रदान किया था। परन्तु दोनों कथाओं के अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि  श्रीराम भक्त हनुमान अपनी नौ निधियों को किसी अन्य को प्रदान कर सकते हैं ,जबकि कुबेर ऐसा नहीं कर सकते। निधि का अर्थ होता ऐसा धन जो अत्यंत दुर्लभ हो। इनमें से अनेक का वर्णन युधिष्ठिर ने भी महाभारत में किया है।

भारतीय पुरातन ग्रन्थों में नव निधियों के सम्बन्ध में वृहत वर्णन अंकित करते हुए कहा गया है कि अर्थ अर्थात धन के बिना मानव जीवन के किसी भी आयाम को सार्थक रूप दिया नहीं जा सकता। इसीलिए महर्षि मनु द्वारा प्रतिपादित भारतीय संस्कृति में चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष- पुरुषार्थचतुष्टय में अर्थ अर्थात धन अर्थात लक्ष्मी को धर्म के पश्चात द्वितीय स्थान प्रदान किया गया है। निष्ठापूर्वक परिश्रम अथवा साधना करने वाले व्यक्ति को कुछ न कुछ निधियां अवश्य ही प्राप्त होती हैं, और प्रत्येक व्यक्ति को परिश्रम पूर्वक कार्य अथवा साधना करके श्री सम्पन्न होने का प्रयत्न करना ही चाहिए। परिश्रम अथवा साधना से श्रीसम्पन्न बनाने वाली नव निधियां हैं- पद्म निधि, महापद्म निधि, नील निधि, मुकुंद निधि, नन्द निधि, मकर निधि, कच्छप निधि, शंख निधि, खर्व अथवा मिश्र  निधि। ऐसी मान्यता है कि नव निधियों में खर्व निधि को छोड़कर शेष आठ निधियां पद्मिनी नामक विद्या के सिद्ध होने पर प्राप्त हो जाती हैं, परंतु इन्हें प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर है।

भारतीय पुरातन ग्रन्थों में निधि व नव निधियों के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन करते हुए कहा गया है कि पद्म निधि के लक्षणों से संपन्न मनुष्य अथवा साधक सात्विक गुणयुक्त होता है, तो उसकी अर्जित संपदा भी सात्विक होती है। यह निधि सात्विक उपाय से ही प्राप्त की जा सकने के कारण इसका अस्तित्व बहुत समय तक रहता है। सात्विक उपाय से अर्जित धन- संपदा पीढ़ियों को तार देती है और उन्हें कभी धन की कमी नहीं रहती।यह इतना अधिक होता है कि इसका उपयोग मनुष्य के परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है, किन्तु तब भी समाप्त नहीं होती। सात्विक गुणों से संपन्न व्यक्ति स्वर्ण-चांदी आदि का संग्रह करके उन्मुक्त रूप से दान करता है। कतिपय पौराणिक ग्रन्थों में पद्म निधि के इक्कीस पीढ़ी तक चलने की बात कही गई है। महापद्म निधि भी पद्म निधि की भांति सात्विक ही है, परन्तु इसका प्रभाव सात पीढ़ियों के बाद नहीं रहता। इस निधि से संपन्न व्यक्ति भी दानी होता है ।सात्विक मानी जाने वाली महापद्म निधि प्राप्त व्यक्ति अपने संग्रह किये हुए धन का दान धार्मिक कार्यों में करता है। है। यह  निधि अर्थात धन इतना अधिक होता है कि अगर मनुष्य दोनों हांथों से भी इसे व्यय करे तो भी पीढ़ी दर पीढ़ी सात पीढ़ी तक चलता रहता है। इस निधि को प्राप्त व्यक्ति में रजोगुण अत्यंत ही कम मात्रा में रहता है इसी कारण धारक धर्मानुसार इसे व्यय करता है। नील निधि में सत्व और रज दोनों ही गुण मिश्रित होते हैं। नील निधि व्यापार द्वारा ही प्राप्त होती है, इसलिए नील निधि से संपन्न व्यक्ति में दोनों ही गुणों की प्रधानता रहती है। नील निधि प्राप्त व्यक्ति जनहित के काम करता है और इस तरह मधुर स्वभाव वाली इस निधि का प्रभाव तीन पीढ़ियों तक रहता है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार सात्विक निधि मानी जाने वाली नील निधि प्राप्त व्यक्ति सात्विक तेज से युक्त होता है, किन्तु उसमे रजोगुण की भी मात्रा रहती है। सत एवं रज गुणों में सतगुण की अधिकता होने के कारण इस निधि को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सतोगुणी ही कहलाता है। ऐसी निधि व्यापार के माध्यम से ही प्राप्त होने के कारण इसे रजोगुणी संपत्ति भी कहा जाता है। रजोगुण की प्रधानता होने के कारण यह निधि तीन पीढ़ी से आगे नहीं बढ़ सकती। इसे प्राप्त करने वाले व्यक्ति में दान की वैसी भावना नहीं होती जैसी पद्म एवं महापद्म के धारकों में होती है। मुकुंद निधि  में पूर्णतः रजोगुण की प्रधानता रहने के कारण इसे राजसी स्वभाव वाली निधि कहा गया है। इस निधि से संपन्न व्यक्ति का मन भोगादि में ही लगा रहता है। यह निधि एक पीढ़ी बाद नष्ट हो जाती है। अर्थात उस व्यक्ति के बाद केवल उसकी संतान ही उस निधि का उपयोग कर सकती है। उसके पश्चात आने वाली पीढ़ी के लिए यह निधि किसी काम की नहीं रहती। इस निधि को प्राप्त करने वाले धारक में दान की भावना नहीं होती। फिर भी उसे बार-बार धर्म का स्मरण कराने पर ऐसा व्यक्ति भी दान करता है। रजोगुण से सम्पन्न मुकुंद निधि प्राप्त व्यक्ति के सदा केवल धन के संचय करने में लगा रहने के कारण इसे राजसी स्वाभाव वाली निधि कहा गया है। इस निधि को प्राप्त व्यक्ति सम्पूर्णतः राजसी स्वाभाव का नहीं होता और उसमें  सतगुण का भी योग होता है, किन्तु दोनों गुणों में रजगुण की अत्यधिक प्रधानता रहती है।

नंद निधि में रज और तम गुणों का मिश्रण होता है। मान्यता है कि यह निधि व्यक्ति को लंबी आयु व उत्तरोत्तर उन्नति अर्थात निरंतर तरक्की प्रदान करती है। यह व्यक्ति कुटुम्ब की नींव होता है। राजसी एवं तामसी गुणों के मिश्रित स्वभाव वाला नंद निधि प्राप्त व्यक्ति अपनी प्रशंसा से अत्यंत प्रसन्न होता है और प्रशंसा करने वाले को आर्थिक रूप से सहायता भी कर देता है। इस निधि के साधक के पास धन तो अथाह होता है किन्तु तामसी गुणों के कारण उसका नाश भी जल्दी होता है। पर साधक अपने पुत्र पौत्रों के लिए बहुत धन संपत्ति छोड़ कर जाता है।मकर निधि  को तामसी निधि कहा गया है। इस निधि से संपन्न व्यक्ति अस्त्र और शस्त्र को संग्रह करने वाला होता है। राजा और शासन में दखल देने वाला ऐसा व्यक्ति शत्रुओं पर भारी पड़ता है और युद्ध के लिए सदा तैयार रहता है, लेकिन उसकी मौत भी इसी कारण होती है। योद्धा के गुण अधिक होने और अस्त्र- शस्त्रों का संग्रहकर्त्ता होने तथा तामसी गुण होने के कारण मकर निधि प्राप्त व्यक्ति राज्य के राजा एवं शासन के विरुद्ध जाने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति को अगर अपनी पैतृक संपत्ति ना भी मिले तो भी वो अपनी वीरता से अपने लिए बहुत धन अर्जित करता है। कच्छप निधि का साधक अपनी संपत्ति को छुपाकर रखता है, न तो स्वयं उसका उपयोग करता है, और न किसी को उस धन का प्रयोग करने देता है। वह सांप की तरह उसकी रक्षा करता है। इस निधि को प्राप्त व्यक्ति तामस गुण सम्पन्न स्वभाव से वह अत्यंत ही कृपण होता है। इनके पास संपत्ति तो अथाह होती है। ऐसा व्यक्ति अपने धन पर एक सर्प की भांति कुंडली मार कर रहता है और उसकी रक्षा करता है। व्यक्ति के पुत्र-पौत्रादि को उसके मृत्यु के पश्चात ही उसकी संपत्ति प्राप्त होती है।शंख निधि को प्राप्त व्यक्ति स्वयं की ही चिंता और स्वयं के ही भोग की इच्छा करता है। वह कमाता तो बहुत है, लेकिन उसके परिवार वाले निर्धनता में ही जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसा व्यक्ति धन का उपयोग स्वयं के सुख-भोग के लिए करता है, जिससे उसका परिवार दरिद्रता में जीवन गुजारता है। मुकुंद निधि की भांति ही शंख निधि एक पीढी तक रहती है। इस निधि को प्राप्त व्यक्तिके पास व्यक्तिगत रूप से धन तो बहुत होता है। ऐसा व्यक्ति बहुत स्वार्थी होता है और अपनी समस्त संपत्ति का उपयोग स्वयं ही करता है। खर्व निधि को मिश्रित निधि भी कहते हैं। नाम के अनुरूप ही यह निधि अन्य आठ निधियों का सम्मिश्रण होती है। इस निधि से संपन्न व्यक्ति को मिश्रित स्वभाव का कहा गया है। उसके कार्यों और स्वभाव के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। उसका जीवन व व्यवहार उतार-चढ़ाव से युक्त होता है। इस निधि से प्रभावित व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और अनिश्चयी स्वभाव का होता है। इस निधि को प्राप्त व्यक्ति विकलांग व घमंडी होता हैं, जो समय आने पर लूटकर चल देता है। मान्यता है कि नव निधियों में सिर्फ इस खर्व निधि को छोड़कर अन्य आठ निधियां पद्मिनी नामक विद्या के सिद्ध होने पर प्राप्त हो जाती है। और यह खर्व निधि विशेष ही अन्य सभी आठ निधियों की मिश्रण मानी जाती है। यही कारण है कि इसके धारक के स्वाभाव में भी मिश्रित गुण प्रधान होते हैं, और समय सही होने पर ऐसा व्यक्ति अपना सारा धन और संपत्ति दान भी कर सकता है और यदि समय अनुकूल ना हो तो स्वयं उसके परिवार के सदस्यों को भी उसकी संपत्ति नहीं मिलती। इस निधि में सत, रज और तम तीनो गुणों का मिश्रण होता है।

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