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भारतीय संस्कृति

वेदों में वर्णित प्रत्येक मनुष्य के लिए नित्य करणीय पांच कर्त्तव्य कर्म

ओ३म्

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मनुष्य संसार में आता है। उसकी माता उसकी प्रथम शिक्षक होती है। वह माता जो अच्छा व उचित समझती है वह ज्ञान अपनी सन्तानों को देती है। प्राचीन काल में हमारी सभी मातायें व समाज की स्त्रियां वैदिक शिक्षाओं में निपुण होती थी। उन्हें सत्य व असत्य ज्ञान का विवेक हुआ करता था। वह ईश्वर, आत्मा, संसार तथा मनुष्य के कर्तव्यों एवं अकर्तव्यों से भली प्रकार से परिचित हुआ करती थीं। महाभारत युद्ध के बाद ऋषि परम्परा समाप्त होकर देश देशान्तर में अविद्या का अन्धकार फैला। न केवल स्त्रियां अपितु हमारे ज्ञानी पण्डित आदि भी वेद की सत्य शिक्षाओं व ज्ञान से वंचित हो गये। ऐसे समय में देश में अज्ञान व अन्धविश्वास उत्पन्न हुए जिसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा। महाभारत के बाद वेदों के अध्ययन व अध्यापन की प्राचीन परम्परा बन्द होने से देश देशान्तर के मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान वेदों में बताये गये मनुष्यों के प्रमुख पांच कर्तव्यों को भी भूल गये। इस कारण ज्ञान की दृष्टि से संसार का पतन हुआ और पूरा विश्व वेद ज्ञान की अनुपस्थिति में अविद्या, अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड व कुरीतियों में फंस गया। ईश्वर व आत्मा के सच्चे स्वरूप का ज्ञान भी भुला दिया गया था। ईश्वर, देश व समाज के प्रति कर्तव्यों सहित मनुष्य को अपने प्रति किये जाने वाले कर्तव्यों यथा ज्ञान प्राप्ति, वेदाचरण, पंचमहायज्ञ आदि का भी ज्ञान नहीं रहा था।

स्वामी दयानन्द सरस्वती (1825-1883) को अपने बाल्यकाल में अपनी आयु के चैदहवें वर्ष में मूर्तिपूजा करते हुए कुछ शंकायें उपस्थित हुई थीं। ईश्वर की मूर्ति बनाकर पूजा करने की प्रचलित पद्धति के प्रति तर्क व युक्तियों से संबंधित कारणों का ज्ञान व समाधान उन्हें अपने किसी परिवारजन व विद्वानों से भी नहीं मिला था। कालान्तर में मृत्यु के भय ने भी उनके मन में स्थान पा लिया था। इन प्रश्नों का जब उन्हें किसी से सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने अपने पितृगृह का त्याग कर इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए खोज की। वह देश भर के विद्वानों, योगियों व साधु-संन्यासियों से मिले। उन्होंने प्रायः सभी विद्वानों से अपनी शंकाओं के समाधान पूछे थे। इसी बीच वह उच्च कोटि के योगियों के सम्पर्क में आकर योग के सभी अंगों को भी सिद्ध करने में सफल हुए। योग का अन्तिम अंग समाधि होता है जिसमें सर्वाव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सब जगत के आधार ईश्वर का साक्षात्कार होता है। ऋषि दयानन्द ने समाधि अवस्था को प्राप्त कर अपनी आत्मा में व आत्मा के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार वा प्रत्यक्ष भी कर लिया था। विद्या की तीव्र इच्छा के कारण वह प्रयत्न करते हुए वेद वेदांगों के विद्वान प्रज्ञाचक्षु गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी के सम्पर्क में आये। स्वामी दयानन्द ने स्वामी विरजानन्द जी से सन् 1860 से सन् 1863 तक लगभग तीन वर्षों तक वेद वेदांगों का अध्ययन किया। इससे उन्हें अध्यात्मिक तथा भौतिक पदार्थ विद्याओं का सूक्ष्मज्ञान हुआ था जिससे उनकी आत्मा की तृप्ति हुई थी।

स्वामी दयानन्द ने वेदों को प्राप्त कर उनकी परीक्षा की और अपनी सत्यान्वेषण बुद्धि से पाया कि चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा द्वारा चार आदि ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया गया अपौरुषेय सत्य ज्ञान है। उन्होंने अपने कर्तव्य पर भी विचार किया था। वेद सभी मनुष्यों को वेदाध्ययन की प्रेरणा सहित दूसरे मनुष्यों में वेद प्रचार की प्रेरणा भी करते हैं। ऐसा करने से ही संसार से अज्ञान व अविद्या दूर हो सकती है। संसार में अविद्या की अन्धकार से तथा विद्या की प्रकाश से उपमा दी जाती है जो कि वस्तुतः सत्य ही है। अज्ञानी मनुष्य का जीवन निष्फल होता है। ज्ञान से बढ़कर संसार में कोई पदार्थ, धन व सम्पत्ति नहीं है। जो काम ज्ञान से होता है वह धन सम्पत्ति से नहीं हो सकता। शास्त्रों की सत्य मान्यता है कि जो सुख व आनन्द एक धार्मिक वेदज्ञानी व सत्य का ज्ञान रखने वाले मनुष्यों को प्राप्त होता है वह अन्य अल्पज्ञानी व अज्ञानी मनुष्यों को प्राप्त नहीं होता।

वेद एवं वेद के ऋषियों द्वारा प्रणीत शास्त्रों व ग्रन्थों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि संसार के सब मनुष्य के पांच प्रमुख कर्तव्य हैं जिनका सेवन उन्हें प्रतिदिन करना चाहिये। प्रथम कर्तव्य को ईश्वरोपासना, ब्रह्मयज्ञ वा सन्ध्या के नाम से जाना जाता है। इसके अन्तर्गत वेदाध्ययन से ईश्वर का ज्ञान प्राप्त कर इस सृष्टि के रचयिता व पालक परमेश्वर की उसके सत्य गुणों, कर्मों व स्वभाव का स्मरण करते हुए उसका ध्यान करते हैं। यही ईश्वर की उपासना कहलाती है। परमात्मा ने जीवात्माओं वा मनुष्य आदि प्राणियों के लिये ही इस सृष्टि को बनाया हैं। उसी ने हमें मानव शरीर दिया है तथा हमारी आवश्यकता के सभी पदार्थ भी उसी ने बनाये हैं। ईश्वर यदि सृष्टि को न बनाता और हमें जन्म न देता तो हम सुखों का भोग नहीं कर सकते थे। हमें जो सुख प्राप्त हैं उसका कारण व आधार परमात्मा ही है, अन्य कोई नहीं। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम उसके सत्य स्वरूप का ध्यान करते हुए उसके प्रति कृतज्ञता एवं उसका धन्यवाद करें। मनुष्य का दूसरा प्रमुख कर्तव्य मुख्यतः अपने पर्यावरण को शुद्ध रखना व शुद्ध करना होता है। हमारे कारण ही वायु, जल तथा पृथिवी आदि प्रदुषित व विकृतियों को प्राप्त होती है। इनको शुद्ध रखने के लिये ऋषियों ने देवयज्ञ अग्निहोत्र की खोज की। यह ज्ञान व विज्ञान से युक्त कार्य व अनुष्ठान होता है जिससे वायु व जल आदि सहित पर्यावरण की शुद्धि होती है। इससे मनुष्य स्वस्थ व निरोग रहता है। उसके ज्ञान विज्ञान की उन्नति होती है। सन्ध्या व देवयज्ञ को प्रातः व सायं किया जाता है। ऋषि दयानन्द ने इन दोनों यज्ञों को करने की विधियां भी लिखकर हमें प्रदान की हैं। इन विधियों से हमें लाभ उठाना चाहिये।

तीन इतर मुख्य कर्तव्य पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ होते हैं। पितृयज्ञ में माता-पिता तथा परिवार के वृद्ध जनों की सेवा करनी होती है। हम जब वृद्ध होंगे तो हमें भी सेवा की आवश्यकता होगी। इसलिये यह सुन्दर परम्परा डाली गई है। अतिथि यज्ञ में विद्वान मनुष्यों की जो जनकल्याण की भावना से युक्त होकर हमारे घरों में यदाकदा आते हैं उनका श्रद्धापूर्वक सेवा व सत्कार किया जाता है। बलिवैश्वदेव यज्ञ में परमात्मा के बनाये पशु व पक्षियों आदि के आश्रय व पालन में सहायता की जाती है। यद्यपि सभी पशु आदि प्राणियों का पालन परमात्मा के द्वारा होता है परन्तु हमें भी इन असहाय प्राणियों की रक्षा व पालन में सहयोग करना होता है। इन पांच प्रमुख कर्तव्यों को पंचमहायज्ञ के नाम से जाना जाता है। हम सबको इन पांच कर्तव्यों व यज्ञों का अनुष्ठान करना चाहिये। यही सब मनुष्यों का धर्म है। इससे हमारा जन्म लेना सार्थक व सफल होता है। हमारी आध्यात्मिक तथा सांसारिक उन्नति होती है तथा जन्म जन्मान्तरों में हमें सुख प्राप्त होता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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