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भारतीय संस्कृति

अजेय आजाद की अजेय कहानी

चंद्रशेखर जी पढ़े लिखे तो यूं ही, हां धरनों, प्रदर्शनों और सभाओं में सक्रिय भाग लेने लग गये। और एक दिन बनारस की एक दुकान पर धरना देते हुए पकड़े गये, अभी वे मात्र चौदह वर्ष के किशोर थे।
पुलिस ने इन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाकर खड़ा कर दिया।
यह कौन है, इसे क्यों ले आए? मजिस्टे्रट ने कहा, यह तो मुझे छात्र लगता है।
आप इसी से पूछ लीजिए, यह भी बागी है।
बागी? यह लड़का बागी? आश्चर्य है भाई। और चंद्रशेखर से उसने पूछा।
तेरा नाम?
स्वतंत्र, कहकर बालक चंद्रशेखर हंस पड़ा।
तेरे बाप का नाम?
स्वाधीन।
तू रहता कहां है? अर्थात तेरा घर कहां है? चंद्रशेखर ने अकड़कर कहा, जेलखाने में।
मजिस्टे्रट चिढ़ गया, उसने आदेश दिया, इसे पंद्रह बेंत अभी लगाये जाएं।
आज्ञा भर की देर थी, बालक चंद्रशेखर पर बेंत पड़ने आरंभ हो गये। शरीर रक्तमय हो उठा, किंतु वे ‘भारत माता की जयÓ का घोष करते रहे मजिस्टे्रट के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
बस उसी दिन से चंद्रशेखर भारतीय क्रांतिकारी विचारधारा से जुड़ गये, एक ओर गहन अध्ययन और दूसरी ओर भीषण अग्नि-पथ की संरचनाएं, और उस पथ के पथिकों की खोज में जुट गये।
इन्होंने आगे चलकर एक क्रांति संघ की स्थापना की, इसका नाम था सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी।
कुछ समय पश्चात इन्हें राष्टï्रनायक महात्मा गांधी आदि देश के गांधीवादी नेताओं के सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, अनशन, हड़ताल से कुछ संभव होते न दिखा। उन्हें लगा मानो यह स्वतंत्रता संग्राम शताब्दियों चलकर भी स्वराज्य हस्तगत न कर सकेगा।
देवी स्वतंत्रता स्वयं के पाल्यों का रक्त चाहती है, ऊष्ण रक्त जो नितांत हरा भरा और ताजा हो, अहिंसा से अकर्मण्यता पनपती है।
रक्त दो और स्वराज लो।
उन्होंने अपने को मजिस्टे्रट के समक्ष स्वतंत्र कहा था, यह शब्द भी उन्हें नही भाया, वे किसी भी तंत्र जैसे अपवाद से अपने को दूर रखना चाहते थे, अत: उन्होंने अपने नाम के साथ आजाद जोड़ दिया। अब वे क्रांति व्यवसाई चंद्रशेखर आजाद थे।
चंद्रशेखर आजाद के संदर्भ में विद्वान लेखकों की लेखनियां थक गई हैं, बहुत कुछ लिखा जा चुका है। अत: उन लेख प्रलेखों में यति उत्पन्न करना मैं इष्टï नही समझता, वह कुछ अभीष्टï है भी नहीं, अत: उनके कुछ संस्मरण लिखूंगा।
किसी महान क्रांतिकारी का इतिवृत्तात्मक पावन चरित्र लिखना भी नितांत असंभव है। उनके संपूर्ण क्रियाकलाप अत्यंत गोपनीय और अदृश्य मूलक थे जहां कल्पना को स्थान नही, सत्य तो उनसे बहुत पीछे छूट जाता है, अत: उसे शब्दश: लिखना यदि सत्य मूलक कहा जाए तो मात्र अतिश्योक्ति ही होगी।
मेरे अजेय आजाद तथा इस कृति में लिखे गये अन्य चरित्रों को आप मात्र एक कथा समझकर अनुमान लगा लें कि स्यात ऐसा कुछ संभव हो सकता है। अस्तु: आजाद का संबंध अपने परिवार से पूर्णतया विच्छेदित हो गया था, अग्निपथ पर पग रखते ही वे मातृहीन, पितृहीन ग्रहग्राम और परिवार को तिलांजलि दे चुके थे।
आजाद ने एक स्वतंत्र सेना गठित की, जिसमें वही व्यक्ति स्थान पाते थे, जो सर्वथा उन्हीं के अनुरूप होते थे। सुखदेव, भगत, बिस्मिल, अशफाक, लाहड़ी, कन्हाई लालदत्त, मन्मथनाथ गुप्त आदि उनके दलनायक थे। संपूर्ण भारत में स्थान स्थान पर उनके गढ़ थे। इन क्रांतिकारियों को न तो भूख लगती थी और न प्यास।
इनका मात्र उद्देश्य था, स्वराज्य। जेल की यातनाएं फांसी के फंदे ही इनके निमित्त वरदान थे। अंग्रेजी दमनचक्र का आकार अनुदिन संकीर्ण होता जा रहा था, किंतु यह देशभक्त बढ़-पनप रहे थे।
लाहौर के एक बंगले में मेम, साहबों और खानसामों, खिदमतगारों की भीड़ लगी थी, विनोद में दुर्गा भाभी ने कहा आजाद अब तुम शादी कर लो।
यद्यपि आजाद आजीवन अल्पभाषी और मुस्कान रहित रहते थे। किंतु भाभी की बात सुन ठठाकर हंस पड़े और बोले भाभी, क्या कोई लड़की मेरे लिए देख चुकी हो? देखूंगी तब, पहले अपनी रूचि व्यक्त करो।
बस भाभी, वह कारतूसों भरी पेटियां माउजरों के बारे लादकर मेरे आगे आगे नदी, नालों, जंगलों मैदानों और पहाड़ों पर दौड़ सके। वह भिखारिन आप जैसी मेम भी बन सके, पुलिस को धक्के लगाकर धूल चटा सके, फिर उससे शादी अवश्य कर लूंगा।
अरी भाभी, मेरा विवाह मेरे बमतुल बुखारे की अंतिम गोली से होगा, तुम व्यर्थ ही समय न खोना किसी लड़की की खोज में।
सभी चुप हो गये।
चंद्रशेखर आजाद यूं तो भारत भर में चलने वाली क्रांति के निर्देशक और सृजक थे, किंतु उनका कार्य क्षेत्र कानपुर था। वे प्राय: बरराजपुर (कानपुर के पश्चिम फर्रूखाबाद रोड पर) में स्थित महाराज सती प्रसाद की हवेली में रहकर दल का संचालन करते थे।
एक बार किसी थाने के आगे सड़क पर पुलिस अधिकारी एक भारी सा बोर्ड स्थापित कर रहे थे, तभी एक अधनंगा अपनी बैलगाड़ी में सरकंडे भरे हुए सड़क पर आ खड़ा हुआ, बोला सरकार, इसमें क्या लिखा है?
मूर्ख इसे पढ़ नही पाता क्या? अफसर चिल्लाया।
हुजूर पढ़ पाता तो पूछता क्यों? गाड़ीवान ने कहा।
इसमें लिखा है, चंद्रशेखर आजाद को जिंदा या मुर्दा पकड़वाने वाले को सरकार 15000 रूपये इनाम देगी।
क्या साहब नकद?
और क्या उधार?
तो साहब आज ही उसे पकड़ लाउंगा, पैसे नकद दे देना।
पकड़ लाएगा? साहब ने उसे देखा, तू उसे जानता है? खूब जानता हूं, वह तो डकैत है।
परंतु वह गोली भी मार देता है।
अरे साहब गोली तो कौन खाएगा, मैं तो चींटी मारते भी डरता हूं। गोली झेले वे जो सरकार से तनख्वाह पाते हैं। कहकर उसने अपने बैल हांक दिये।
अजीब पागल है यह, अफसर ने साथियों से कहा।
और आजाद गाड़ी हांकते हुए हंस पड़े, मन में कहा इन पागलों के कारनामे यही हैं, यह बोर्ड इन्हें पकड़कर देगा।
आजाद ने अपनी यात्रा अकेले ही की थी, वे किसी को कभी साथ न लेते थे, अपने माउजर का नाम उन्होंने बमतुल बुखारा रखा था। वे कहा करते थे यही मेरा मित्र, बंधु सखा और साथी है, टेंट में माउजर, जेबें गोलियों से भरी, और वे जहां जाना होता था चले जाते थे। बिना टिकट तो वे कभी चलते ही न थे, खाने चबेने को चाहे उनके पास एक भी पैसा न होता, वह सभी कुछ उन्हें सहय था, संघ के निमित्त एकत्र हुए धन से वे उतना ही व्यय करते थे जो उनके हिस्से में पड़ता था। वे एक बार इलाहाबाद से टे्रन पर आकर कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर उतरे, उस गाड़ी की लगभग बीच के प्रत्येक स्टेशन पर पुलिस तलाशी लेती आई, और आजाद जी पुलिस के साथ रहकर तलाशी में उसको सहयोग करते रहे।
कानपुर स्टेशन पर जब यह यात्रियों के साथ पुल पर चढ़कर ऊपर पहुंचे तब देखा, वहां कप्तान स्वयं खड़ा है, पीछे तो उनके पुलिस थी ही। इन्होंने बढ़कर अपना टिकट दिया और हुमक कर कप्तान के कंधे पर अपने कंधे से धक्का मारकर कहा-जा, तू अपना काम कर और मुझे अपना काम करने दे, कहकर आगे बढ़ गये। यद्यपि यह पुलिस कप्तान उन्हें कुछ कुछ पहचानता था, पुलिस बल भी उसके साथ था, किंतु कंधे में जो चोट उसके लगी थी, वह उसे आत्मसात कर चुप हो गया। उसने भगवान को मन ही मन धन्यवाद दिया और कहा, यह कहो मेरा जीवन शेष था, वह मुड्ढे के बजाए गोली मार देता तब?
गाड़ी से उतर कर आए हुए पुलिस कर्मियों से पूछा क्या वह मिला नहीं। हां साहब संभवत: वह इस गाड़ी से आया नही, अन्यथा बचकर जाता कहां? वह तो एक बला है, कप्तान बोला, उसे पकड़ना तो दूर उससे बचना ही कठिन सभी लौट गये।
बनारस की क्रांतिशाखा को वहां की पुलिस ने लगभग उजाड़ दिया था। क्रांतिकारी मारे गये, अथवा जेलों में पड़े सड़ रहे थे, आजाद वहां की गतिविधि का निरीक्षण करने पहुंचे, पुलिस वहां की धरती सूंघती घूम रही थी, तनिक भी किसी शंका के होते ही उसे लाठियों से तोड़कर जेल में ठूंस दिया जाता। बस्ती के दरवाजे अर्गलित रहते, एक पड़ोसी दूसरे को संदेह की दृष्टिï से देखने लग गया था।
दल के ठिकाने पर जाते हुए आजाद को लगा मानो पुलिस मेरे पीछे चल रही है वे एक गली में मुड गये, गली बहुत संकरी थी, एक भव्य मकान के कपाट खुले थे, संध्या हो रही थी, वे उसी मकान में घुस गये और किंवाड़े बंद कर उसे भीतर से बंद कर लिया। खट पट सुन मकान मालिक नीचे उतर आए, बोले तुम तुम कौन हो? और आप? आजाद ने माउजर टेंट से निकाल लिया। मैं एसएसपी हूं, तुम क्या कोई क्रांतिकारी हो।
मुझे आजाद कहते हैं पुलिस मेरे पीछे है, सोचता हूं पुलिस से मेरी मुठभेड़ पुलिस अफसर के घर से ही आरंभ हो।
अरे! आजाद तुम? उसने कहा, चंद्रशेखर आजाद तुम्हीं हो।
आपका अनुमान सत्य है, आजाद बोले, किंतु स्मरण रखो यदि कहीं तुमने कान हिला दिये तो तुम नही वे चंद्रशेखर बात नही करता, बस गोली मारता है साहब तो ऊपर कमरे में जाकर फिर नीचे उतरा नही और आजाद उस रात किंवाड़ों के पास बैठे अपने माउजर से खेलते रहे।
प्रात: उनका कहीं पता न चला, दल को सुसंगठित कर आजाद कानपुर लौट आए।

(रमाकांत पांडेय की पुस्तक ‘बलिदानी गौरवगाथाएं’ से)

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