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राजनीति

भारत में भ्रष्टाचार क्या शिष्टाचार हो चुका है

डा.राज सक्सेना
देश में आए दिन सत्तारूढ़ दल के खुलने वाले आर्थिक घोटालों के प्रति सत्तारूढ़ दल का बेशर्मी से उसे नकार कर अपनी ही किसी एजेंसी को जाँच सौंप कर जाँच रिपोर्ट आने तक खुद को स्वयं ईमानदार घोषित कर दूसरों को बेईमान कह कर गरियाना अब जनता को कुछ अजीब नहीं लगता है । ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार को भारतीय जनमानस ने अब शिष्टाचार मान कर लोकतंत्र का एक लेने और देने वाले दोनों पक्षों द्वारा सौदेबाजी कर के ‘स्वनिर्धारित कर’ मान लिया है ।
उच्च स्तर पर होने वाले इन अरबों रुपयों के घोटालों को विरोधी दल सत्तारूढ़ दल की साख गिरा कर जनता की नजर से उसे गिराने का प्रयास मात्र माना जाने लगा है । अब तो सरे आम रिश्वत लेने वाला दल या व्यक्ति पकड़े जाने पर भी इसे विरोधियों की चाल बता कर मुस्कुराते हुए सीना ठोक कर जेल जाता है और आए दिन अपने निर्दोष होने की दुहाई देता रहता है । और हम कोई बहुत गंभीरता से इन दोनों बातो को नहीं लेते है । दुनिया भर में भ्रष्टाचार स्वयं में एक समस्या है । कहीं ज्यादा तो कहीं कम । वस्तुत: शक्ति और भ्रष्टाचार एक दुसरे के अनुपूरक हैं । जहाँ आप में किसी महत्वपूर्ण कार्य को क्रियान्वित करने की शक्ति आती है । आप स्वयं को दाता तथा दुसरे को याचक समझने लगते हैं और याचक को मुफ्त में लाभ न देकर उसको चक्कर लगाने के लिए विवश करने लगते हैं ।और इतना परेशान कर देते हैं कि वह स्वयं सौदेबाजी की स्थिति में आकर आपके समक्ष आत्म समर्पण कर देता है फिर आप अपनी शर्तो पर उसका काम करने के लिए तैयार होते हैं । यहीं से प्रारम्भ होता है भ्रष्टाचार का एक सतत सिलसिला । भारत में किये गये विश्व बैंक के एक अध्ययन से जो एक साफ़ चित्र उभर कर सामने आ पाया है वह हमारी भृष्टाचार को नियति मान लेने की प्रवृति के चलते भले ही चौंका देने वाला कम लगे किन्तु आँखे खोलने वाला तो अवश्य है । जैसा की अन्य विकसित देशों में भृष्टाचार एक आम बात होता जा रहा है उसी प्रकार भारत में भी ऊपरी आमदनी सहज स्वीकार्य हो चुकी है । अब किसी कार्य को करने के लिए लिफाफा या किसी अन्य प्रकार से अलग से दी जाने वाली धनराशी एक आम और आवश्यक बात हो गई है । जहाँ कहीं सीमा का अतिक्रमण होता है मात्र वहीं या फिर साजिश के अधीन ‘ट्रैप’ होता है । विश्व बैंक के इस अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में एक वर्ष में दो सौ दस अरब रुपयों का ऊपरी लेन देन होता है । यदि इस आंकड़े को प्रति व्यक्ति पर लायें तो यह रकम बहुत मामूली बैठती है । भारत की जनसंख्या एक अरब दस करोड़ के लगभग है यदि रिश्वत की राशी का प्रति व्यक्ति आकलन किया जाय तो यह दो रुपया प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष से कम बैठता है । अपनी अर्थ व्यवस्था में कैंसर का रूप ले चुकी यह लगभग लाइलाज बीमारी देश की अर्थव्यवस्था का मात्र 0.75 प्रतिशत है किन्तु सामाजिक ताने बाने को दीमक की तरह चाट रही यह प्रथा देश के विकास को भयंकर अवांछित क्षति पहुँचा रही है ।
विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित उक्त संदर्भित पुस्तक में स्पष्ट किया गया है कि एशिया महाद्वीप के सब से अधिक पन्द्रह महाभृष्ट देशों में ‘भारत महान’ नवें स्थान पर है । अर्थात केवल एशिया में ही मात्र छ: देश इस से ऊपर है तो चौदह देश भृष्टता के स्तर में इस से नीचे हैं । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तो स्थिति और भी भयंकर नजर आती है ।अध्ययन के अनुसार भृष्टदेशों की संख्या 158 है जिसमें भारत बड़ी बेशर्मी से 88 वें स्थान पर आसीन है अर्थात इस से 87 देश कम भृष्ट हैं।यह हमारे लिए प्रसन्नता की बात हो सकती है कि हमें पाकिस्तान के मुकाबले अधिक प्रशासनिक पारदशिता वाला देश माना गया है । हम फिलिपिन्स,नेपाल वियतनाम और इंडोनेशिया से भी अधिक पारदर्शी अर्थव्यवस्था रखते हैं ।यह भी सामने आया है । यह बात अलग है कि खाद्यान्न की गारंटी जिसका इतना शोर मचाया जा रहा है उसकी वर्तमान व्यवस्था में निर्धारित धनराशी रु. एक सौ पचास अरब में से पचास अरब अर्थात तीस प्रतिशत धनराशि भ्रुष्टों की बिना तली वाली जेब में जा कर 31प्रतिशत खाद्द्यान्न और 36 प्रतिशत चीनी स्वयं चट कर जाती है । क्या यह उल्लेखनीय शर्मनाक स्थिति नहीं है ।

जहाँ तक भृष्ट विभागों का सम्बन्ध है , परम्परा के अनुसार इस अध्ययन में भी पुलिस विभाग ने अपना ताज बचाए रखा है । उसके बाद ही, बापू के इस देश में राजस्व,न्यायिक व्यवस्था,नगर प्रशासन,स्वास्थ्य सेवा,विद्युत,सार्वजनिक वितरण व्यवस्था,आयकर,स्वच्छ जलापूर्ति और शिक्षा जैसे अत्यावश्यक सेवा वाले विभागों का नाम आया है । इस अध्ययन में चौंका देंने वाला तथ्य यह भी आया है कि सर्वे में तीन भृष्टतम विभागों में 80 प्रतिशत लोगों ने पुलिस,शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का चयन किया है ।

एक सामान्य ब्यक्ति के मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर विश्व में भृष्टाचार है क्यों ? और अन्य देशों को छोड़ दिया जाय तो आखिर भारत में इसका जिम्मेवार कौन है । यह एक यक्ष प्रश्न है । सब भुक्तभोगी होने के कारण इसका उत्तर जानते हुए भी इसका उत्तर देने से बचते हैं ।

यह भी शास्वत सत्य है कि भृष्टाचार सदैब इस देश की गंगा जमुनी संस्कृति का अंग रही है । कोई वरदान या कार्य होने की याचना भगवान से करने पर ही भगवान को प्रशाद , नकद या कीमती धातु (सोनाचांदी)का छत्र आदि चढाने का लालच देना । भगवान को रिश्वत आदि देने की श्रेणी में नही आता है क्या? मुगलों के समय में राजीराजी या फिर जबरदस्ती ‘डाली’ देने या पंहुचाने की भृष्टाचार की उत्प्रेरक परम्परा का निर्वहन अंग्रेजो ने भी पूरे जोर शोर से बनाए रख कर अपनी जेवें भरने का प्रवंध कर लिया था । सदियों की इस ‘पवित्र परम्परा को इस पवित्र युग के भगवान (सरकारी नौकर) ने भी अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं के साथ जीवित रखा हुआ है । फर्क केवल इतना आया है कि अब अन्य कई सुरक्षित तरीकों से इसे ‘फिक्स’ करके लिया जाने लगा है । स्थिति तो अब यहाँ तक पहुंच चुकी है कि चूँकि इस धन को खातों में नही लिया जा सकता इस लिए यह एक समानांतर अर्थ व्यवस्था के रूप में ‘काले धन’ की बीमारी बन चुकी है । और पूरे देश की अर्थ व्यवस्था को दीमक की तरह चाट कर बर्बादी के कगार पर ले आई है ।

वर्ष 2012 में एक विदेशी समाचारपत्र ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि एशिया में सबसे खराब प्रशासन तन्त्र भारत का है । वस्तुत: आजादी के समय नेहरु यह नहीं चाहते थे कि तत्कालीन आई.सी.एस. सेवा जो कि ब्रिटेन के प्रति दास्य भाव रखते हुए भारतीय जनता के प्रति महाराजा भाव रखते थे को समाप्त कर दिया जाए क्योकि कि वे जानते थे कि वे नेहरु की तानाशाही प्रवृति के अनुकूल काम नहीं करेंगे मगर सरदार पटेल अड़ गए । उन्होंने इन्हें बनाए रखने की आवश्यकता समझी क्योकि इनके बिना प्रशासन चलना बहुत मुश्किल था । इनके अधीन इन की जी हुजूरी कर के अपनी स्टेट को सुरक्षित रखने की प्रवृति वाले राजा महाराजा और फौज पर प्रभावी नियन्त्रण जो उस समय अत्यावश्यक था बिना इनके संभव ही नहीं था कोई भी अनहोनी हो सकती थी । साथ ही वे अपनी प्रवृति के अनुसार ईमानदारी से इस तन्त्र से काम लेना चाहते थे । उन्होंने नेहरु से यह भी कहा था कि मुझे अच्छा लगेगा अगर मेरा सचिब मेरी इच्छा के विपरीत फ़ाइल पर अपनी ईमानदार और जनहित की टिप्पणी दर्ज करे ।

भारतीय संविधान की मूल भावना यह है कि विधायिका एक जनहित का कानून बनाए और उस कानून का परिपालन कार्यपालिका (ब्यूरोक्रेसी) ईमानदारी से कराए । किन्तु आज स्थिति यह है कि नेता और ब्यूरोक्रेसी अपने निहित स्वार्थो के वशीभूत बगलगीर होकर “खेत की बाढ़ ही फस्ल को खाने लगे” चरितार्थ कर रहे हैं ।यह देख कर छोटे स्तर के अधिकारी और कर्मचारी भी बेलगाम होकर खुले आम रिश्वतखोरी का आनन्द ले रहे हैं ।इस मिलीभगत का दुष्परिणाम यह हुआ है कि सुविधा भोग की आदी और बेईमान कार्यपालिका पर विधायिका हावी होकर इसे अपनी अंगुली पर नचाने लगी है । बिना गलती आई.ए.एस. को निलम्बित कर देना, उन्हें खराब से खराब जगह पर पोस्टिंग देना इसी का दुष्परिणाम है । एक सर्वे के अनुसार अबतक एक सौ पांच आई.ए.एस. निलम्बित किये गए हैं जिसमें सर्वाधिक 60 प्रतिशत निलम्बन बी.एस.पी. और सबसे कम पांच प्रतिशत बी.जे.पी ने किए हैं । नेताओं की दादागिरी का आलम यह है कि, इनमे से केबल पांच लोगों के विरुद्ध सजा के आदेश मा.न्यायालय ने किए हैं । शेष 100 आई.ए.एस. बरी हुए हैं । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस सेवा में सीनियरजूनियर का एक ऐसा मकडजाल है कि एक बेईमान सीनियर अफसर अपने मातहत अफसरों को उनकी ईमानदारी के दण्ड स्वरूप इतना टार्चर करता हे कि वह पनाह माँगने लग जाए । और फिर शुरू होता है उसके क्रमश: बेईमान होने का सिलसिला । अपने मन में ईमानदारी और न झुकने के सपने लेकर सेवा में आए जूनियरों को अपने आकाओं के सम्मुख हथियार डाल कर बेईमानी का दामन थामना पड़ता है ।और फिर ऊपर से चली यह भृष्टाचार की गंगा पूरे तन्त्र को निगल लेती है और पूरा समाज इस की चपेट में आ जाता है । प्रश्न अभी भी मुंह बाए खड़ा है । आखिर इस समस्या का इलाज क्या है । इस समस्या के समाधान के लिए मेरा मानना है कि सुविधा और सत्ता की गंदी गंगा में दुबकी लगा कर अपनी रिटायर्मेंट के बाद भी कोई क्रीम पोस्ट पाने की पलने वाली महत्वाकांक्षाओं के अधीन काम करने वाले इन पुराने आई.ए.एस. लोगों से कोई आशा नहीं की जानी चाहिए इस काम के लिए त्याग की भावना से युबा आई.ए.एस. लोगों को आगे आकर क्रीम पोस्टिंग और रूपये के लालच को दर किनार कर एक बार सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा । अब बिना दवाब और बिना लालच के सेवा का दृढ़निश्चय ही देश को इस अंधकूप से बाहर ला सकता है । और देश को एक सही दिशा की ओर मोड़ सकता है

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