रुपये का अवमूल्यन : नेताओं की लूट जिम्मेदार

विकास गुप्ता
मौर्य काल के लिए दु:ख व्यक्त करते हुए ग्रीक इतिहासकार प्लिनी ने कहा था, ऐसा कोई वर्ष नहीं बीतता था जिसमें भारत रोमन राजकोष से दस करोण सेसोस्टियर (रोमन सिक्का) न खींच लेता हो। ऐसा नहीं है कि भारत सिर्फ रोमन से ही मुद्रा कमाता रहा हो, विश्व के अन्य हिस्सों से भी भारत कमाता रहा है। इसकी समृद्धि भी उस समय विख्यात थी। आज स्थिति यहां तक आ गयी है कि विदेशी मुद्रा जितना यहां आ नहीं रही उससे कई गुना विदेशी कंपनीयां यहां की मुद्रा अपने यहां ले जा रही हैं। और यही वजह है कि भारत के मुद्रा की स्थिति धाराशायी होती जा रही है। विदेशी पूंजी विदेशी निवेश के अलावे अन्य तरीकों से लायी जा सकती है जैसे प्राचीन भारत में लायी जा रही थी। भारत से जीतना अधिक निर्यात होगा उतना ही यहां विदेशी पूंजी आयेगी। लेकिन सरकार तो लगी है विदेशी कंपनीयों को बुलाने के लिए जोकि यहां जितना निवेश करेंगे और उसी निवेष से हुए लाभ स्वरूप यहों की पूंजी चूस के ले जायेंगे। फिर भारतीय मुद्रा विदेशों में जायेगा। फिर यहां विदेशी मुद्रा कमी होगी। फिर रुपये का अवमूल्यन करना पड़ेगा। यहां के रुपयें को मजबूत करने को लेकर सबसे महत्वपूर्ण है घरेलू उद्योग धंधों का वैष्विक निर्यात को लेकर महत्व देना। एक तरफ चीन में हमारे यहां से बहुत ही सस्ती बिजली है, वैष्विक निर्यात को लेकर चीन ने सब्सिडी से लेकर अन्य सुविधायें अपने यहां के उद्योगों को दे रखी है। और इसका परिणाम हम सब देख रहे हैं। आज यूरोप से लेकर इंडिया तक चहुंओर चीनी समानों की चमक है। लेकिन यहां के नेता, नौकरशाह, अधिकारी और प्रशासन सब यहां के उद्योग धंधों को चूसने में लगे है। नहीं तो आखिर इतने सस्ते मैनपावर और सभी संसाधनों, भारतीय अंग्रेजी के विद्वानों के रहते यह हाल ही क्यो होता? विन्स्टन चर्चिल का एक वक्तव्य जोकि भारत के सत्ता हस्तान्तरण के प्रश्न पर बहस के दौरान आया था, अब तो सत्ता बदमाशों और लूटेरों के हाथ चली जायेगी, जो आपस में खूब लड़ेंगे और भारत राजनीतिक झगड़ों में खो जायेगा। विन्स्टन चर्चिल का यह वक्तव्य आजादी के 67 साल बीतने पर अपनी यथार्थता का यर्थाथ उसी प्रकार करा रहा है जैसे आग से जलने बाद शरीर पर मौजूद छाले अपनी उपस्थिति दिखा कर करते है। भारत भी इन 67 सालों जल सा गया है। रुपये की गिरती कीमत ही वह छाला है जो साबित कर रहा है कि यहां के दूरदर्शियों और कर्ताधर्ताओं ने सत्ता के ऐय्यासी में चूर इस देश को कितना जला चुके है। आजादी पश्चात हमारे सत्ता और समाज के कुछ बेईमान एवं लूटेरों ने यहां का लाखों करोण रुपया लूटकर स्वीस बैंकों एवं अन्य विदेशी बैंकों में पहुंचाया। एक तरफ अपना वेतन एवं अन्य अपने फायदों को लेकर हमारे सांसद जहां एकजुटता का परिचय देते है वहीं लूटे हुए धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने को लेकर आना-कानी एवं नजरअंदाजियों का दौर जारी है। जब देश के कर्ता धर्ता ही नहीं चाह रहे कि भारत के लूट का पैसा भारत नहीं आये तो कैसे आ पायेगा? आम जनता का काम तो शासित होना है। नीति, ला एण्ड आर्डर का कार्य तो प्रशासन और संसद का है। अब इसमें आम जनता आन्दोलन करके पुलिस की लाठी खाकर चूप रहने के अलावा और कर भी क्या सकती है? जालियावाला बाग में जैसे हजारों निहत्थों को जनरल डायर ने मारा था उसी भांति रामदेव के काले धन वाले आन्दोलन में पुलिस ने निहत्थे आन्दोलनकारियों पर गोलियों और लाठियों से वार किया। आजादी को लेकर भगत सिंह ने अदालत में बयान दिया था क्रान्ति से हमारा तात्पर्य है कि अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए। लेकिन क्या वह मौजूदा व्यवस्था जो आजादी के पहले व्याप्त थी आज भी समाप्त हो पायी है? भगत सिंह के प्रपौत्र यदवेंद्र सिंह के आरटीआई सवाल भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को कब शहीद का दर्जा दिया गया था। और अगर ऐसा अब तक नहीं हुआ, तो सरकार उन्हें यह दर्जा देने के लिए क्या कदम उठा रही है? के जवाब में यदवेंद्र के मुताबिक मई में गृह मंत्रालय ने जवाब दिया कि मंत्रालय के पास यह बताने वाला कोई रिकॉर्ड नहीं है कि इन तीनों क्रांतिकारियों को कब शहीद का दर्जा दिया गया? यह जवाब देष के लिए बेहद शर्मनाक है। भगत सिंह ने एक बार कहा था दोस्तों यदि मेरा विवाह गुलाम भारत में होना है, तो मेरी वधु केवल मौत होगी, बारात जुलूस के रूप में होगी और बाराती देश के लिए मर मिटने वाले होंगे। अंग्रेजी बहरों को सुनाने के लिए असेम्बली में बम फोड़ने से लेकर अन्य अनेकों ऐसे मामलें है जिसे सरकार जानती है और अगर सबूत खोजे जाये तो आजादी से पहले के अखबारों में मिल भी जायेंगे। लेकिन यह सरकार कतई नहीं चाहती कि ऐसे जवाब खोजे जाये। अगर चाहती तो तो ऐसा जवाब मिलता ही नहीं। ऐसे महान देशभक्त के लिए हमारे गृह मंत्रालय के पास कोई आंकड़ा नहीं होना कि भगत सिंह शहीद हैं और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते लड़ते इन्होंने जान दे दी निहायत ही शर्मनाक है। इसके इतर रायबहादुर, नाईटहूड और सर की उपाधि पाने वालों के सभी आंकड़े मौजूद होंगे। क्योंकि ये वही लोग है जिनकी थ्योरी थी अपना काम बनता, भांड़ में जाये जनता। अंग्रेजों के लूट के परिप्रेक्ष्य में कार्ल मार्क्स ने एक बार कहा था “यह अंग्रेज घुसपैठिया हि था, जिसने सर्वप्रथम भारत, जो सूती वस्त्र की मां थी, के माल को यूरोपीय बाजार से निकाला तथा फिर भारतीय बाजार में घुसकर भारतीय चर्खे को तोड़ डाला।” हमारे देश के कुछ लोगों के गद्दारी करने से ही हमारे देश का यह हाल हुआ। कीन ने ठीक ही कहा था कि “सिंधिया की वफादारी ने अंग्रेजों के लिए भारत को बचा लिया”। चार्ल्स नेपियर ने कहा था। “हमें सिंध को जीतने का कोई अधिकार नहीं, किन्तु हम ऐसा करेंगे तथा यह एक उपयोगी एवं लाभदायक धूर्तता होगी।” बिलियम बेंटिक ने कहा था “बिखरे हुए स्वायत गॉवों के क्वच को इस्पात के रेलों से छेद दिया गया जिससे उनके जीवन रक्त का हस हो गया”। पीटर महान ने कहा था “याद रखों कि भारत का वाणिज्य विश्व का वाणिज्य है और जो उसपर पूरा अधिकार कर सकेगा, वही यूरोप का अधिनायक होगा”।
विदेशी सत्ताओं को जो करना था उन्होंने जी भर किया। लेकिन आजाद भारत को हमारे राजनेता और कर्ताधर्ता अपना न सहीं उन करोड़ों शहीदों जिन्होंनें अंग्रेजी लाठी, जुल्म और गोलियों से लेकर फांसी के फंदों को हसते-हसते चूमा उनके त्याग का ही ख्यालकर अगर इन लोगों ने थोड़ी सी भी देशभक्ति दिखायी होती तो निश्चय ही यह देश उन्नति की ओर अग्रसर होता। करोड़ो की संख्या में स्लम एरिया में व्याप्त खोलीयां, बेरोजगारी, गुण्डागर्दी, भ्रष्टाचार, लूट के पैसों का विदेशी बैंकों में जमा होना जैसे कर्मों की न्यूनता होती। इन कर्ताधर्ताओं के नीयत को लेकर बदरूद्दीन तैय्यबी ने ठीक ही कहा था “महारानी की करोड़ो जनता में से कोई अन्य लोग इतने राजभक्त नहीं, जितने भारतीय शिक्षित लोग”। ये वहीं शिक्षित लोग है जो अभी भी अंग्रेजी और उनकी नीतियारें को अपने कंधो पर लेकर सवार है। 97 फीसदी जनता आज भी अंग्रेजी को लेकर त्राहिमाम कर रही है और इसे लेकर बेबूझ बनी हुई है। और शिक्षित लोग आज भी महारानी की भाषा को ताज पर ताज पहना रहे है। और महारानी के आने पर 21 तोपों की सलामी भी दी ही जाती है। हर समाज, हर देश की एक बनावट, समझ, तासीर और विचार होती है जोकि अन्य समाज से भिन्न होती है। लेकिन हमने अपनी सभी व्यवस्थायें सात समुन्दर पार की अपना रखी है जोकि वह यहां के लिए बना गये थे, वह भी उनकी भाषा के साथ। एक समय था कि भारतीयता के मोरल को लेकर समूचा विश्व आदर की भावना रखता था। यहां के समाज में एक भावना थी प्राण जाय पर वचन न जाय। और यहां के लोगों की ईमानदारी को लेकर अनेक इतिहासकारों ने अपनी स्थिति स्पष्ट भी की है। लेकिन विदेशी लूट के बाद यहां हुये चरित्र पतन का ही असर था कि एकबार कार्नवालिस ने कहा था “हिन्दुस्तान का हर निवासी भ्रष्ट है”। जो विदेशी खुद भ्रष्ट और लूटेरे थे वह हमारी आवाम पर भ्रष्ट का तमगा लगाने लगे? वर्तमान में देखा जाये तो हर जगह लूट व्याप्त है और ईमानदारी की सफेद चादर बेईमानी पर चढ़ा दी गयी है। मरीजों, गरीबों, शोषितों, कमजोरों को लूटा जा रहा है। कमीशनखोरी जारी है। आम जनता बेबस मजबूर लाचार है। विकास की योजनाओं से बेबस जनता उतना ही दूर है जितना बिना घूस दिये बगैर ठेके के आवंटन से ठेकेदार। आम जनता ऐफिडेविट, पहचान पत्र और अन्य प्रमाणपत्रों के बीच ऐसे खो गयी है जैसे की टूटा हुआ नांव नदी में। जब लूट को रोकने का जांच लूटेरें ही कर रहे हो तब स्वत: अनुमान लगाया जा सकता है कि फिल्म कैसी बनेगी?
बाल गंगाधर तिलक ने एकबार कहा था कि “हमें अपने प्रयासों में कोई सफलता नहीं मिलेगी, अगर हम साल में एक बार मेंढक की तरह टर्राते है”। बहुत हद तक वर्तमान भारतीय स्थिति भी ऐसी ही है। समूचे देश को एकत्रित होना होगा। तबतक जबतक की हमारे शासन में मौजूद लोगों को यह विश्वास न हो जाये कि अब आम जनता जाति, धर्म, सम्प्रदाय से इतर देशभक्ति और स्वदेशी को लेकर एकजुट हो चुकी है।
लेखक पीन्यूजडाटइन के सम्पादक है।

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