Categories
स्वास्थ्य

तेजी से बढ़ते प्रदूषण के बीच हम कैसे रहें स्वस्थ 

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय

(लेखक इंडियन फारेस्ट सर्विस में वरिष्ठ अधिकारी हैं।)

प्रदूषण मृत्यु का जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में पांचवें स्थान पर है। आइये कुछ उदाहरण देखते हैं। भोपाल गैस त्रासदी तो सबके ध्यान में है। बात लंदन की करते हैं जहाँ वर्ष 1952 तक शहरी वायु प्रदूषण रोजाना की भारी धुंध का रूप ले चुका था। यह ग्रेट-स्मोग एक दिन इतना बढ़ गया कि सप्ताह भर के अन्दर 4000 लोग मारे जाने का अनुमान लगाया गया। असल में मृत्यु का यह आँकड़ा अब 12,000 माना जाता है। लन्दन के लोग तो अब सम्हाल गये, पर आज 65 साल बाद, ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज डेटाबेस के आँकड़े बताते हैं कि विश्व भर में सूक्ष्म-कणों के कारण वायु प्रदूषण से सालाना 42 लाख लोग मरते हैं, और लोगों के स्वस्थ जीवन के 10.31 करोड़ वर्ष 103.1 मिलियन हेल्दी लाइफ इयर्स नष्ट हो जाते हैं। साथ ही 2.54 लाख मृत्यु सतही ओजोन प्रदूषण के कारण होती हैं। भारत में परिवेशीय वायु में श्वसनीय निलंबित विविक्त-कणों से होने वाला प्रदूषण बीमारी और मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा जोखिम है। इन सूक्ष्म-कणों के कारण वायु प्रदूषण से भारत में सालाना 10.2 लाख मौतें होती हैं।

भारत में वायु प्रदूषण से दिल की बीमारियाँ बढ़ रही हैं। तीव्र श्वसन संक्रमण की वजह से बच्चों की वैश्विक वार्षिक मौत के आंकड़े में भारत का हिस्सा 24 प्रतिशत है। हाल ही में हुई गंभीर वैज्ञानिक शोध से ज्ञात होता है कि भारत की आबादी का आधे से अधिक भाग, 66 करोड़ भारतीय, उन क्षेत्रों में निवास करते हैं जहाँ पार्टिकुलेट मैटर के कारण वायु प्रदूषण का स्तर भारतीय राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक से अधिक है। इन क्षेत्रों में प्रदूषण कम करने के हमारे प्रयत्न न केवल हमारे शहरों को स्मार्ट बनायेंगें बल्कि इन लोगों के लिए औसतन 3.2 वर्षों की जीवन प्रत्याशा में वृद्धि भी होगी। ध्यान दीजिये, ये आंकड़े केवल वायु प्रदूषण के हैं। इसमें जल व मृदा के प्रदूषण या क्लाइमेट चेंज के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा शामिल नहीं है।

चरक संहिता में जनपदोध्वंश का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, भूमि-प्रदूषण एवं ऋतु-प्रदूषण के कारण गाँव, शहर, संस्कृतियाँ और सभ्यतायें नष्ट हो जाती हैं। समकालीन शब्दावली में जनपद-विनाश को सोसायटल कोलैप्स के नाम से जाना जाता है। आज की चर्चा में हम इस सिद्धांत की ऐतिहासिक और वर्तमान प्रासंगिकता का परीक्षण करेंगे। चर्चा में प्रदूषण-जन्य विनाशकारी स्थितियों से होने वाली जनहानि से बचने और स्वास्थ्यरक्षण का संदेश भी है। इस चर्चा के बौद्धिक स्रोत चरक संहिता (च.वि.3.1-52), सुश्रुत संहिता (सु.सू.6.19-20) और अष्टांग संग्रह (अ.सं.सू.9.95-142) तथा वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, भूमि-प्रदूषण व जलवायु-परिवर्तन के कारण मानव-स्वास्थ्य पर पडऩे वाले दुष्प्रभाव पर विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण जर्नल्स में प्रकाशित 2263 शोधपत्र हैं।

पुनर्वसु आत्रेय द्वारा अपने शिष्य अग्निवेश को 5000 से 8000 पहले दी गई शिक्षा बड़ी रोचक है। वे कहते हैं कि वायु, जल, भूमि एवं ऋतु में विकृति होने पर जमीन में समुचित रस, वीर्य, विपाक, व प्रभाव युक्त औषधियाँ नहीं उत्पन्न हो पातीं। औषधियों के प्रभावहीन होने से जनसामान्य का रोगग्रस्त होना निश्चित है। अत: उच्चकोटि की औषधियों का पहले ही समय पर संग्रह कर लेना चाहिये। पुनर्वसु आत्रेय आगे कहते हैं कि इन औषधियों का उपयोग उन लोगों के लिये करेंगे जो हमसे चिकित्सा कराने की इच्छा करते हैं और हमें चाहते हैं या जिनको हम चाहते हैं। इससे जनपद में विनाशकारी रोगों को दूर करने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं होगी। इस विचित्र स्थिति को सुनकर आचार्य अग्निवेश प्रश्न करते हैं कि एक ही समय में अलग-अलग प्रकृति, अलग-अलग आहार बल, सात्म्य मन व उम्र के लोगों में एक समान बीमारी कैसे उत्पन्न हो सकती है? इस प्रश्न के उत्तर में पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि हवा, पानी, जमीन और ऋतुओं के प्रदूषण से उत्पन्न व्याधियाँ जनपदोध्वंस को जन्म देती हैं।

मानव इतिहास का शायद ही कोई पहलू इतना विचित्र रहा हो जितना की अच्छी-भली सभ्यताओं, संस्कृतियों और समाज का अचानक विघटन रहा है। इस प्रकार के सामाजिक विघटन, सोसायटल कोलैप्स या जनपदोध्वंश के तमाम प्राचीन उदाहरणों में एक कॉमन पैटर्न की खोज से आधुनिक समाज के लिये उपयोगी सबक मिल सकते हैं। दुनियाभर के इतिहास में आज तक हुये सोसायटल कोलैप्स, कल्चरल कोलैप्स या सिविलाइजेशनल कोलैप्स देखें तो विश्व में जितनी भी समाज, संस्कृतियाँ या सभ्यतायें उजड़ी हैं, उन सबके पीछे मूल कारण मानव का प्रज्ञापराध, प्रकृति से रिश्तों का बिगाड़, जल, वायु, भूमि आदि का प्रदूषण, पर्यावरण विनाश, जलवायु परिवर्तन आदि हैं।

इस समस्या के निदान पर जानकारी देते हुये आचार्य अग्निवेश कहते हैं कि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि तय नहीं होती। आयु युक्तिसापेक्ष होती है। तात्पर्य यह कि युक्ति के द्वारा वायु, जल, मिट्टी और ऋतुओं के प्रदूषण के होने वाले विनाश से बचा जा सकता है। वस्तुत: प्रयत्न करने से नियति भी अनुकूल हो जाती है। और जो मुख्य सलाह दी गई वह यह है कि सबसे पहले तो हमें अपनी बिगड़ी बुद्धि, धैर्य, स्मृति आदि को सम्हालकर प्रदूषण कम करने के उपाय करने होंगे। आहार, विहार, स्वस्थ्यवृत्त, सद्वृत्त का पालन करना होगा। आत्म-विश्लेषण, आत्म-नियंत्रण, शांतिप्रियता, दम, दान, दया, ध्यान, योग आदि से स्वास्थ्य को सम्हाला जा सकता है। समस्या आ जाने पर आत्म-विश्लेषण, आत्म-नियंत्रण, सद्वृत्तानुपालन, सद्भावना, सच्चाई, दान, शान्ति-प्रियता, शरीर-रक्षण में तत्परता, कल्याणकारी स्थलों में निवास करना, शहरों और घरों में प्रदूषण में कमी लाना, शरीर का व्याधिक्षमत्व बढ़ाना, उच्चकोटि के व्यक्तियों का साथ, प्रज्ञापराध छोडऩा, ध्यान, योग आदि उपयोगी रहते हैं।

सूत्र रूप में एक बात चरकसंहिता में कही गयी है कि हवा, पानी, जमीन व ऋतुओं के प्रदूषण से होने वाली महामारी में भी कुछ लोग तो फिर भी मृत्यु से बच ही जाते हैं। असल में ऐसे लोग वे हैं जिन्होंने पंचकर्म और रसायन चिकित्सा से अपने शरीर का व्याधिक्षमत्व मजबूत कर रखा होता है। कहने का तात्पर्य यह हुआ कि यदि प्रदूषणजनित समस्याओं से जीवन को बचाना है तो आयुर्वेदाचार्यों की सलाह से पंचकर्म और रसायन का नियमित प्रयोग आवश्यक है। रसायन और प्रिवेंटिव औषधीय योगों का यथोचित प्रयोग किया जाये तो प्रदूषण-जन्य व्याधियों में फंसने का डर नहीं रहता। यह सदैव ध्यान रखना होगा कि केवल गोलियाँ खाने और अवलेह चाटने से स्वस्थ्य की रक्षा नहीं होती। इन सबके साथ ही आत्म-विश्लेषण, आत्म-नियंत्रण, सद्वृत्तानुपालन, सद्भावना, सच्चाई, दान, शान्ति-प्रियता, शरीर-रक्षण में तत्परता, कल्याणकारी स्थलों में निवास करना, शहरों और घरों में प्रदूषण में कमी लाना, शरीर का व्याधिक्षमत्व बढ़ाना, उच्चकोटि के व्यक्तियों का साथ, प्रज्ञापराध छोडऩा, ध्यान, योग आदि उपयोगी रहते हैं। प्राचीन भारत के महान मनीषियों द्वारा दिये गये आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांत भारत को स्वच्छ, स्वस्थ और विकसित राष्ट्र बनाने में सक्षम हैं। इन सिद्धांतों की वैज्ञानिक, सामाजिक, पारिस्थितिक एवं व्यक्तिगत उपादेयता आज और अधिक हो गई है।

रोगों की उत्पत्ति में फ्री-रेडिकल्स की बहुलता से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढऩे और इनफ्लेमेशन का बड़ा योगदान होता है। यदि आहार, विहार, रसायन और औषधियों के माध्यम से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इनफ्लेमेशन (दर्द या सूजन) को नियंत्रित कर लिया जाये तो प्रदूषणजनित बीमारियों से बहुत हद तक बचा जा सकता है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इनफ्लेमेशन के निरापद चिकित्सकीय प्रबंध के लिये आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा से बेहतर कोई और चिकित्सा पद्धति विश्व में ज्ञात नहीं है। आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा से हम अपने आपको गैर-संचारी रोगों से भी बचा सकते हैं। गैर-संचारी रोगों में मनोरोग, हृदय रोग, कर्ण रोग, नेत्र रोग, केन्सर, डायबिटीज, हड्डी रोग, उदर रोग या शरीर के किसी भी अंग के रोग, जो खान-पान, रहन-सहन, प्रदूषण एवं भू-भौगोलिक कारणों से उत्पन्न होते हैं, शामिल किया जाता है।

अपने आयुर्वेदाचार्य की सलाह और देखरेख में रसायन चिकित्सा हम सबके लिये अनेक प्रकार से उपयोगी और निरापद हो सकती है। रसायन चिकित्सा जीवन के शुरुआती चरणों में, पंचकर्म द्वारा शोधन के साथ, लेने का ही श्रेष्ठ लाभ शोध में पाया गया है। बीमारी या बुढ़ापा आ जाने के पश्चात रसायन लेने पर अच्छा प्रभाव कम ही होता है। रसायन में काम्य रसायन, नैमित्तिक रसायन, आजस्त्रिक रसायन एवं आचार रसायन का उल्लेख मिलता है। आचार रसायन हमारे व्यवहार व परस्पर सद्भावना से सम्बंधित है। आयुर्वेदाचार्यों की मदद से सुनिश्चित किये गये काम्य, नैमित्तिक, या आजस्त्रिक रसायन द्रव्यों का उपयोग करते रहने से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इनफ्लेमेशन को आने से रोका जा सकता है। काम्य रसायनों की मदद से शरीर को ओज, बल, कान्ति, तरूणाई आदि मिलती है। नैमित्तिक रसायन शरीर के विभिन्न अवयवों को श्रेष्ठता देते हैं। रसायन चिकित्सा हॉस्पिटल में रह कर, जिसे आयुर्वेद की भाषा में कुटी प्रवेशिक पद्धति कहा जा सकता है, या बाहर रहते हुये वातातपिक पद्धति से ली जा सकती है। रसायन सामान्यतया बढ़ती उम्र की बीमारियों से बचाव करते हैं, किन्तु प्रदूषणजन्य पैथोजेनेसिस को रसायनों की सहायता न केवल रोका जा सकता है, अपितु रोगों को प्रारंभिक दशा में नियंत्रित भी किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक पद्धति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां समान द्रव्य भोजन के साथ साथ रसायन तथा औषधि भी हैं। आहार, रसायन और औषघि के मध्य ऐसी सुसंगत निरंतरता विश्व की किसी अन्य चिकित्सा पद्धति में नहीं पाई जाती। उदाहरण के लिये खजूर, शहद, गुड़, द्राक्षा, मुनक्का, बादाम, तिल, आँवला, बेल, लहसुन, सोंठ, कालीमिर्च, पिपली, हल्दी, केसर, जीरा, धनिया, मूंग, जल, दूध, घी, तुलसी, त्रिकटु एवं त्रिफला आदि ऐसे द्रव्य हैं जो भोजन, रसायन एवं औषधि तीनों ही तरह से प्रयुक्त होते आये हैं। इन पदार्थों को प्राय: भोजन में लेते रहना उपयोगी है। उपरोक्त प्रमुख सुझावों के साथ ही जीवन-शैली से जुड़े चार सुझाव भी दिल्ली जैसे प्रदूषित शहरों में स्वास्थ्य-समस्याओं से बचाव के प्रमाण-आधारित साधन हैं, जिनके कारण स्वस्थ व्यक्ति को शारीरिक-मानसिक रोगी होने से बचाने में मदद मिलती है।

आहार औषधि है (फूड इज मेडिसिन) का नारा आज भले ही कुछ संस्थाओं ने अपने नाम पंजीकृत कर लिया हो, वस्तुत: यह विचार विश्व को आयुर्वेद की देन है। आहार से संतुष्टि, तत्क्षण शक्ति, और संबल मिलता है, तथा आयु, तेज, उत्साह, याददाश्त, ओज, एवं पाचन में वृद्धि होती है। साफ-सुथरा, प्राकृतिक, और पौष्टिक भोजन शरीर, मन और आत्मा की प्रसन्नता और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है। त्रुटिपूर्ण या असंतुलित आहार रोग-जनन का सबसे बड़ा कारण है। शरीर की स्थिति को देखते हुये समुचित मात्रा में ही आहार लेना चाहिये। पूर्व में खाया हुये भोजन के पच जाने पर, समुचित मात्रा में, ताजा और स्निग्ध भोजन, न बहुत तेज गति से और न बहुत धीमी गति से, तन्मयतापूर्वक भोजन करना चाहिये। भोजन में मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, व कषाय सभी रस वाले खाद्य पदार्थ होना आवश्यक है। विविध रंगों के मौसमी फल, अनार, द्राक्षा, आँवला, सूखे मेवे, मौसमी सब्जियाँ, गाय का दूध व घी, सैन्धव नमक, लाल चावल आदि को नियमित भोजन का अंग बनाया जा सकता है। खजूर, शहद, गुड़, द्राक्षा, मुनक्का, बादाम, तिल, आँवला, लहसुन, सोंठ, कालीमिर्च, पिपली, हल्दी, केसर, जीरा, धनिया, मूंग, जल, दूध, घी, तुलसी, व त्रिफला आदि ऐसे द्रव्य हैं जो भोजन, रसायन एवं औषधि तीनों ही तरह से प्रयुक्त होते आये हैं। 70,000 लोगों पर शोध के परिणाम बताते हैं कि भोजन में फलों को शामिल करना व व्यायाम हृदयरोगियों में मृत्युदर में कमी लाता है। चीनी और नमक अल्प मात्रा में ही लेना चाहिये। त्रिफला नियमित लिया जा सकता है। इस विषय पर योग्य आयुर्वेदाचार्य के साथ बैठ कर अपनी प्रकृति के अनुकूल खाद्य पदार्थ समझकर उपयोग करने पर जीवन बहुत सुखी और स्वस्थ रहता है।

समय पर जागना और समय पर सोना दूसरा महत्वपूर्ण सुझाव है, जिसका आज से ही क्रियान्वयन किया जा सकता है। यदि अनेक मानसिक-शारीरिक बीमारियों से बचना है तो कम से कम 7 से 8 घंटे व्यवधान-रहित नींद लेना आवश्यक है। स्लीप-डेप्राइवेशन (नींद की कमी) के कारण अनेक मानसिक रोग खड़े हो रहे हैं। उदाहरण के लिये, निद्रा की कमी से कार्य-निष्पादन, निर्णय लेने की क्षमता, व दर्द सहने की क्षमता में गंभीर कमी होती है। लंबे समय तक स्लीप-डेप्राइवेशन के कारण बौद्धिक क्षमता क्षीण होने लगती है। मेमोरी-कंसोलिडेशन पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ता है। एक अध्ययन में पाया गया है कि 4 से 9 वर्ष की उम्र के जो बच्चे बहुत देर से सोते हैं उनमें बौद्धिक क्षमता व सीखने की क्षमता में कमी आती है। सात वर्ष की उम्र के 11000 बच्चों पर किया गया एक अन्य अध्ययन बताता है कि जो बच्चे नियमित रूप से नियमित समय पर नहीं सोते, उनका पठन-पाठन के महत्वपूर्ण विषयों में बौद्धिक प्रदर्शन कमजोर रहा। सोलह से उन्नीस वर्ष के 7798 बच्चों पर किये गये एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि निद्रा की नियमितता, निद्रा का कुल समय तथा निद्रा में कमी का पढ़ाई में प्राप्त अंकों (ग्रेड पोइंट एवरेज) पर भारी प्रभाव पड़ता है। जो बच्चे 10 से 11 बजे के मध्य नियमित रूप से बिस्तर पर सोने चले गये उनके औसत प्राप्तांक श्रेणी (ग्रेड पोइंट एवरेज) सर्वोत्तम थी। अध्ययन तो बहुत हैं, पर कम से कम 7 से 8 घंटे की व्यावधान-रहित निद्रा आवश्यक है।

व्यायाम-औषधि-है (एक्सरसाइज इज मेडिसिन) का नारा दुनिया की कुछ संस्थाओं ने भले अपने नाम पंजीकृत कर लिया हो, वस्तुत: विश्व को यह विचार भी आयुर्वेद की देन है। चरक और सुश्रुत द्वारा हिप्पोक्रेट्स और गैलेन से बहुत पहले, कम से कम आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व, स्वास्थ्य और चिकित्सा के लिये व्यायाम के महत्त्व को बहुत विस्तृत रूप से परिभाषित किया गया था। अपने आयुर्वेदाचार्यों की सलाह लेकर समुचित व्यायाम का निर्धारण करवाते हुये दिनचर्या का अंग बनाना उपयोगी रहेगा। व्यायाम बच्चों के लिये 60 मिनट प्रतिदिन और वयस्कों के लिये सप्ताह में 150 मिनट होना चाहिये। लगभग 14 लाख लोगों के मध्य किये गये अध्ययन के आँकड़े बताते हैं कि व्यायाम 26 प्रकार के कैंसर का जोखिम घटाता है। व्यायाम हृदय रोग, डायबिटीज, कैंसर, मनोरोग सहित कम से कम 22 प्रकार के गैर-संचारी रोगों से बचाव की प्रमाण-आधारित औषधि है। वास्तव में गैर-संचारी रोग विश्व में 3 ट्रिलियन डालर का वित्तीय बोझ डाल रहे हैं, और वर्ष 2030 तक 13 ट्रिलियन डालर तक बढऩे की आशंका है। गैर-संचारी रोगों के कारण 3.6 करोड़ लोग सालाना दुनिया से चले जाते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि व्यक्तिगत स्तर पर इन रोगों से बचाव किया जा सकता है। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज स्वस्थ जीवनशैली व व्यायाम की कमी के कारण गैरसंचारी रोगों के बीज बचपन में ही पड़ रहे हैं। बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिये प्रारम्भ से ही प्रेरित किया जाना आवश्यक है। अन्यथा जिस जोखिम भरी जीवन-शैली की शुरूआत बचपन में होती है, वह अंतत: व्यक्ति की समयपूर्व मृत्यु का कारण बनती है। आयुर्वेदाचार्यों की समुचित सलाह से नियमित शारीरिक श्रम हर उम्र में लाभकारी है। समय के अभाव में जो लोग केवल सप्ताहांत में एक या दो किश्त में भी शारीरिक श्रम और व्यायाम करते हैं, उनमे भी हृदयरोग का खतरे में कमी आती है। जैसा कि देश के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य प्रोफेसर माधव सिंह बघेल कहते हैं, घर के बड़े-बूढ़े जब दिनभर स्वस्थ जीवनशैली जीते हैं, तो उस परिवार के बच्चे भी स्वस्थ जीवनशैली की आदत डाल लेते हैं। यह आदत जीवनभर स्वास्थ्य-रक्षक बनकर उनके साथ रहती है।

आहार, निद्रा व व्यायाम के साथ ही सद्वृत्त अपनाये बिना स्वस्थ रहना संभव नहीं है। महर्षि चरक द्वारा निर्दिष्ट आहार, विहार, और आचार रसायन की युक्तियुक्त त्रिस्तरीय व्यूहरचना के माध्यम से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य सम्हालने का मूलमन्त्र है कि हितकर भोजन व जीवन-शैली, समीक्षात्मक दृष्टिकोण, लोभ-लालच, मोह, ईष्र्या, द्वेष आदि विषय-विकारों से मुक्त, उदार और दानी, समत्व-युक्त, सत्यनिष्ठ, क्षमावान, और महान लोगों के प्रति सेवाभावी व्यक्ति निरोगी रहता है। इसी प्रकार सुखदायी मति, बातचीत और कार्य वाले, सच्चाई-युक्त-अनुशासित, विशाल या निर्मल बुद्धि-युक्त, ज्ञान, तप (शाश्वत मूल्यों की प्राप्ति हेतु आत्म-नियंत्रण) एवं योग (चित्त की वृत्तियों के निरोध द्वारा आत्मस्थ होने का अनुशासन) में तत्पर व्यक्ति भी रोगों में नहीं फंसता। धूम्रपान समकालीन विश्व में जटिल बीमारियों की जड़ है, अत: आत्म-नियंत्रण द्वारा इससे छुटकारा स्वास्थ्यकर रहेगा।

सारांश यह है कि आजकल स्वस्थ जीवनशैली अर्थात् हेल्दी लाइफस्टाइल मेडिसिन का दुनियाभर में बड़ा प्रचार-प्रसार हो रहा है, परन्तु लगभग 3000 साल पुरानी आयुर्वेदिक सलाह आज भी वैसी ही उपयोगी है। व्यक्तिगत स्तर पर वसा और शर्करा के माध्यम से कुल ऊर्जा-प्राप्ति में कमी लाना, भोजन में फल, सब्जियों, फलियों, साबुत अनाज और सूखे मेवे बढ़ाना, नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में व्यायाम, योग, ध्यान आदि का शामिल होना आवश्यक है। और हाँ, इस तरह के सात्विक लोगों का स्वर्ग मिलेगा इस बात का तो पता नहीं किन्तु वैज्ञानिक अध्ययनों में उनके स्वस्थ रहने के ठोस प्रमाण अवश्य मिले हैं। व्यसन-मुक्त जीवन, संतुलित भोजन, शांत जगह में रात्रि की नींद, व्यायाम और सद्भावनायें सदा पथ्यतम हैं। यह अवश्य ध्यान रखियेगा कि आयुर्वेदाचार्यों की प्रमाण-आधारित सलाह, आहार, निद्रा, व्यायाम, व सदवृत्त का संम्यक संयोजन अत्यधिक उपयोगी व आवश्यक है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betlike giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betlike giriş
betparibu giriş
betebet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
parmabet giriş
piabellacasino giriş
betovis giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
casinomilyon giriş
milanobet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betgaranti mobil giriş
parmabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
savoybetting giriş
parmabet giriş
jojobet giriş
betlike giriş
betcup giriş
hitbet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
jojobet giriş
betcup giriş
betebet giriş