रामधारी सिंह दिनकर – आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ वीर रस  ‘ कवि ‘ थे

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अंकित सिंह

दिनकर जी का बचपन गांव में ही बीता। बचपन में ही दिनकर के पिता जी का देहावसान हो गया जिसके बाद उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई। अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय से हासिल करने के बाद उन्होंने बगल के गांव से मिडिल स्कूल में पढ़ाई की।

राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत, क्रांतिकारी संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ओजस्वी कविताओं के रचयिता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की आज जयंती है। रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1960 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया नामक गांव में हुआ था। दिनकर को आधुनिक युग का श्रेष्ठ वीर रस कवि माना जाता है। स्वतंत्रता से पूर्व वह एक विद्रोही कवि के रूप में खुद को स्थापित करने में कामयाब रहे तो वही स्वतंत्रता के बाद उन्होंने राष्ट्र कवि के नाम से प्रसिद्धि पाई। अपनी रचनाओं से युवाओं में राष्ट्रीयता व देश प्रेम की भावनाओं का ज्वार उठाने वाले रामधारी सिंह दिनकर हर उम्र के लोगों में प्रिय थे। रामधारी सिंह दिनकर ऐसे कवि थे जिन्होंने एक साथ पढ़े-लिखे, अपढ़ और कम पढ़े लिखो में लोकप्रियता हासिल की। इतना ही नहीं, वह अहिंदी भाषियों के बीच भी लोकप्रिय हुए।

उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्रृंगार के भी प्रमाण मिलते है। दिनकर जी का बचपन गांव में ही बीता। बचपन में ही दिनकर के पिता जी का देहावसान हो गया जिसके बाद उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी मां पर आ गई। अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय से हासिल करने के बाद उन्होंने बगल के गांव से मिडिल स्कूल में पढ़ाई की। इसी दौरान उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार के खिलाफ विरोध खोला था। यहीं से इनके मन में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीयता की भावना उभर कर सामने आने लगी। 1928 में मैट्रिक पास करने के बाद दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में बीए ऑनर्स किया। पढ़ाई पूरी करने के एक साल बाद ही वह एक स्कूल के प्रधानाध्यापक नियुक्त हुए। 1934 में बिहार सरकार के अधीन उन्होंने सब रजिस्ट्रार का भी पद स्वीकार किया। 1947 में आजादी के बाद वह बिहार विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मुजफ्फरपुर पहुंचे।

1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया। 12 वर्षों तक राज्य सभा के सदस्य रहे। कहा जाता है कि दिनकर सत्ता के करीब होने के बाद भी जनता से कभी दूर नहीं हुए। ऐसा कम ही देखने को मिला है कि जो सत्ता के भी करीब हो और जनता में भी उतना ही लोकप्रिय हो। जो जनकवि भी हों और साथ ही राष्ट्रकवि भी। पुरस्कारों की छड़ी भी उन पर खूब होती रही। उनकी झोली में एक से एक बड़े पुरस्कार आए। फिर भी वे धरती से जुड़े लोगों के मन में उसी तरह बसे रहे जैसे कि कोई अपना हो। सत्ता में होने के बाद भी दिनकर सत्ता की महत्ता को चुनौती देते थे। वह जनता के रथ के सारथी बने और सड़क से संसद तक उनकी आवाज उठाते रहे। दिनकर को मार्क्स अच्छे लगते थे पर वह प्रभावित गांधी जी से थे। संसद में वह कांग्रेस की तरफ से नेहरू जी के साथ थे पर उसने चिर प्रतिद्वंदी लोहिया को साहसी और वीर कहने से भी नहीं चूकते थे।

वह अपने समकालीन कवियों में भी उतने ही सहज थे जितना कि वे आम लोगों के बीच थे। वह भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति और भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार भी बने। कविता रचने का भाव रामधारी सिंह दिनकर के मन में उनके घर में प्रतिदिन होने वाले रामचरित मानस के पाठ को सुनकर जागा। पहले जहां छायावादी कविताओं का बोलबाला था दिनकर ने हिंदी कविताओं को छायावाद से मुक्ति दिलाकर आम जनता के बीच पहुंचाने का काम किया। दिनकर ने अधिकतर कविताएं वीर रस में लिखीं। जनवादी, राष्ट्रवादी कविताओं के अलावा दिनकर ने बच्चों के लिए भी बहुत ही सुंदर कविताओं की रचना की। बच्चों के लिए लिखी उनकी कविताओं में ‘चांद का कुर्ता’, ‘सूरज की शादी’, ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’ इत्यादि प्रमुख हैं। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कृतियों की बदौलत भारत और विश्व में खूब लोकप्रियता हासिल की। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है। वही उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है। रामधारी सिंह दिनकर ने काव्य और गद्य, दोनों में हिंदी की सेवा की। गद्य में संस्कृति के चार अध्याय खूब लोकप्रिय हुई। दिनकर जी की प्रथम तीन काव्य संग्रह- रेणुका, हुंकार और रसवंती उनके आरंभिक आत्ममंथन के युग की रचनाएं है।

दिनकर जी को उनकी हिंदी सेवा के लिए उन्हें खूब सम्मान मिला। उनकी रचना कुरुक्षेत्र के लिए काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार से सम्मान मिला। संस्कृति के चार अध्याय के लिए उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया। 1959 में ही भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। भागलपुर विश्वविद्यालय से उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिए उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। मरणोपरान्त 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर रामधारी सिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व पुस्तक का विमोचन किया गया। उनके जन्म शताब्दी के अवसर पर बिहार में उनकी भव्य प्रतिमा का भी अनावरण किया गया। उनके सम्मान में उनके चित्र को भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने साल 2008 में संसद के केंद्रीय हॉल में लगाया था। रामधारी सिंह दिनकर ने हिंदी साहित्य में ना सिर्फ वीर रस के काव्य को एक नई ऊंचाई दी बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का सृजन किया।

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