ईश्वर संबंधी कुछ शंकाओं के ऋषि दयानंद के समाधान

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ओ३म्
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आज हम वेदों के अविद्वतीय विद्वान वेद-ऋषि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी द्वारा ईश्वर विषय में की जाने वाली कुछ शंकाओं के समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने प्रश्न उपस्थित किया है कि आप ईश्वर-ईश्वर कहते हो परन्तु ईश्वर की सिद्धि किस प्रकार करते हो? इसका उत्तर देते हुए वह कहते हैं कि वह सब प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ईश्वर को सिद्ध करते हैं। इसका स्वयं प्रतिवाद करते हुए वह कहते हैं कि ईश्वर में प्रत्यक्षादि प्रमाण कभी नहीं घट सकते। इस प्रतिवाद का उत्तर देते हुए वह न्याय दर्शन का एक सूत्र प्रस्तुत कर उसके अर्थ पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि जो श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण और मन का शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सुख, दुःख, सत्यासत्य विषयों के साथ सम्बन्ध होने से ज्ञान उत्पन्न होता है उसको प्रत्यक्ष कहते हैं। यह जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह निभ्र्रम अर्थात् भ्रान्तिरहित होना चाहिये। अब इस विषय में विचार करना चाहिये कि इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं। इसका अर्थ यह है कि इन्द्रियों व मन से हमें किसी पदार्थ के गुणों का प्रत्यक्ष होता है, उस गुणी जिसके वह गुण है, उस गुणी पदार्थ का प्रत्यक्ष व ज्ञान नहीं होता। जैसे नेत्र, जिह्वा, नासिका और त्वचा आदि चार इन्द्रियों से रूप, रस, गन्ध और स्पर्श गुणों का ज्ञान होने से गुणी जो पृथिवी उस का आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है, वैसे ही इस प्रत्यक्ष सृष्टि में रचना विशेष आदि ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष होता है। उदाहरण के रूप में हम इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि संसार में हमें इस सृष्टि को देखकर सृष्टिकर्ता के सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु आदि गुणों का प्रत्यक्ष होता है। सृष्टि की रचना एवं सृष्टि के पालन आदि गुणों का गुणी परमात्मा भी इन गुणों से ही जाना जाता व प्रत्यक्ष होता है। इसका कारण यह है कि कोई भी गुण बिना गुणी के आधार पर अस्तित्ववान् नही रहते। सृष्टिकर्ता ईश्वर के इन गुणों को हम संसार में विद्यमान पाते हैं। अतः इन गुणों के गुणी परमेश्वर का प्रत्यक्ष उसके इन व अन्य गुणों के द्वारा ही होता है। इस प्रकार से ईश्वर के कार्य जगत वा सृष्टि में विद्यमान गुणों से ईश्वर का प्रत्यक्ष होता और वह सिद्ध भी होता है।

ऋषि दयानन्द जी ने इस प्रसंग में आगे कहा है कि जब आत्मा मन और मन इन्द्रियों को किसी विषय में लगाता वा चोरी आदि बुरी वा परोपकार आदि अच्छी बात के करने का जिस क्षण में आरम्भ करता है, उस समय जीव की इच्छा, ज्ञानादि उसी इच्छित विषय पर झुक जाते हैं। उसी क्षण में आत्मा के भीतर से बुरे काम करने में भय, शंका और लज्जा तथा अच्छे कामों के करने में अभय, निःशंकता और आन्दोत्साह उठता है। यह भय, लज्जा, आनन्द व उत्साह आदि जीवात्मा में अपनी ओर से नहीं किन्तु परमात्मा के द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। परमात्मा का उद्देश्य जीवों को बुरे कामों को करने से रोकना व परामर्श देना होता है। इस परामर्श को बहुत से लोग मान लेते हैं और जिन कामों को करने में भय व लज्जा होती है, उन्हें नहीं करते। मनुष्य का आत्मा स्वतन्त्र होने से ईश्वर उसे रोकता नहीं अपितु प्रेरणा मात्र ही करता है। बहुत से लोग ईश्वर की प्रेरणा को ठुकरा देते और बुरे कामों को कर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं जिसके कारण वह कर्म बन्धनों में फंस कर कुछ काल पश्चात वा परजन्मों में अपने बुरे कर्मों का फल भोगते हैं।

ऋषि दयानन्द इस प्रकरण में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात यह लिखते हैं कि जब जीवात्मा शुद्ध होके परमात्मा का विचार करने में तत्पर रहता है (तब) उस को उसी समय दोनों प्रत्यक्ष होते हैं। जब परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है तो अनुमानादि से परमेश्वर के ज्ञान होने में क्या सन्देह है? क्योंकि कार्य को देख के कारण का अनुमान होता है। इससे यह अभिप्राय लिया जा सकता है कि जगत में सृष्टि वा अपौरुषेय पदार्थों सूर्य, पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, आकाश, मनुष्यों व अन्य प्राणियों के शरीर, वृक्ष, वनस्पति, अन्न, ओषधियों आदि को देखकर इनके रचयिता व पालक ईश्वर का ज्ञान होता है। ईश्वर सभी अपौरुषेय पदार्थों का निमित्त कारण, प्रकृति उपादान कारण तथा यह सृष्टि व प्राणियों के शरीर, वृक्ष, वनस्पति, ओषधि आदि ईश्वर से उत्पन्न कार्य हैं।

ईश्वर की सिद्धि हो जाने पर शंका होती है कि ईश्वर व्यापक है वा किसी देश व स्थान विशेष में रहता है? इस शंका का समाधान करते हुए ऋषि बताते हैं कि ईश्वर व्यापक वा सर्वव्यापक है। वह व्यापक इसलिये है क्योंकि जो एक देश में रहता तो सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता, सब का स्रष्टा, सब का धत्र्ता और प्रलयकर्ता नहीं हो सकता था। अप्राप्त देश में कर्ता की क्रिया का होना असम्भव है। ऐसा ही एक प्रश्न है कि परमेश्वर दयालु और न्यायकारी है अथवा नहीं? इसका उत्तर है कि ईश्वर दयालु और न्यायकारी दोनों है।

इस उत्तर पर शंका होती है और लगता है कि ये दया और न्याय दोनों गुण परस्पर विरुद्ध हैं। यदि ईश्वर न्याय करे तो दया और दया करे तो उससे न्याय छूट जाये। ऐसा इसलिये कि न्याय उस को कहते हैं कि जो कर्मों के अनुसार न अधिक न न्यून सुख दुःख पहुंचाना ओर दया उस को कहते हैं जो अपराधी को बिना दण्ड दिये छोड़ देना। यह शंकायें प्रस्तुत कर इनका समाधान करते हुए ऋषि बतातें हैं कि न्याय और दया का नाममात्र ही भेद है क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करना छोड़ कर दुःखों को प्राप्त न हों, वही दया कहलाती है। जो पराये दुःखों का छुड़ाना और जैसा अर्थ दया और न्याय का शंका करने वाले मनुष्यों ने किया व करते हैं वह ठीक नहीं क्योंकि जिस मनुष्य ने जैसा व जितना बुरा कर्म किया हो, उस को उतना व वैसा ही दण्ड देना चाहिये। उसी का नाम न्याय है। और जो अपराधी को दण्ड न दिया जाय तो दया का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी डाकू को छोड़ देने से सहस्रों धर्मात्मा पुरुषों को दुःख देना होता है। जब एक के छोड़ने से सहस्रों मनुष्यों को दुःख प्राप्त होता है तो वह दया किस प्रकार हो सकती है? अर्थात् वह दया नहीं हो सकती।

दया वही है कि चोरी डकैती का काम करने वाले उस डाकू को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना और उस डाकू को मार देने से अन्य सहस्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित होती है। इस विवेचन से परमेश्वर दयालु और न्याय करने वाला सिद्ध हो जाता है। ऋषि दयानन्द जी इस प्रकरण में दया और न्याय शब्दों के वास्तविक अर्थ भी बतायें हैं। वह लिखते हैं कि देखो! ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिस ने सब जीवों के सुख आदि प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत् में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इस से भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि जीवों के कर्मानुसार सुख दुःख की व्यवस्था, अधिक और न्यूनता से, फल को प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सब को सुख होने और दुःख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और बाह्य चेष्टा अर्थात् बन्धन छेदनादि यथावत् दण्ड देना न्याय कहाता है। दोनों (दया और न्याय) का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुःखों से पृथक् कर देना।

ईश्वर के स्वरूप के विषय में धार्मिक व सामाजिक जगत में कई मत हैं। कुछ ईश्वर को साकार मानते हैं और कुछ निराकार। इस प्रश्न वा शंका को करते हुए ऋषि ने प्रश्न उपस्थित किया है कि ईश्वर साकार है वा निराकार? ऋषिकृत इस शंका का समाधान है कि ईश्वर निराकार है। क्योंकि जो ईश्वर साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वज्ञादि गुण भी ईश्वर में न घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण, क्षुधा, तृषा और रोग, दोष, छेदन, भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता। इससे यही निश्चित है कि ईश्वर निराकार है। जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आंख आदि अवयवों का बनानेवाला दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता है उसको संयुक्त करनेवाला निराकार चेतन अवश्य होना चाहिये। जो कोई यहां ऐसा कहे कि ईश्वर ने स्वेच्छा से आप ही आप अपना शरीर बना लिया तो भी वही सिद्ध हुआ कि शरीर बनने के पूर्व निराकार था। इसलिए परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता किन्तु निराकार होने से सब जगत् को सूक्ष्म कारणों से स्थूलाकार बना देता है।

हमने इस लेख में ईश्वर विषयक कुछ प्रश्नों व शंकाओं को प्रस्तुत किया है। इस विषय को विस्तार से जानने के लिए पाठकों को सत्यार्थप्रकाश का सातवां समुल्लास पढ़ना चाहिये। इससे ईश्वर विषयक उनकी सभी प्रकार की शंकाओं का निराकरण होगा। ईश्वर विषयक भ्रान्तियां दूर होने पर मनुष्य को ईश्वर की उपासना व सत्कर्मों को करने की प्रेरणा भी मिलेगी। ऐसा होना मनुष्य, देश व समाज के लिए शुभ लक्षण है। वेदाध्ययन से ही मनुष्य के जीवन व व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है। मनुष्य पूर्ण पुरुष अर्थात् सभी मानवीय गुणों से युक्त होता है। अतः सबको वेद एवं सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। इससे उन्हें अनेक लाभ होंगे जो अन्य किसी साधन से नहीं होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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