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कांग्रेस का भला तब हो सकता है, जब केंद्रीय नेतृत्व के सवाल को इमानदारी से हल करें

ललित गर्ग

सवाल यह है कि पार्टी के भीतर ऐसी नौबत क्यों आयी? देश की सबसे पुरानी एवं ताकतवर पार्टी होकर आज इतनी निस्तेज क्यों है? देश की राजनीति की दिशा एवं दशा तय करने वाली पार्टी हाशिये पर क्यों आ गयी है? क्यों उसकी यह दुर्दशा हुई?

कांग्रेस पार्टी में लोकतांत्रिक भावना से उसके नेतृत्व पर लम्बे समय से छाये अनिश्चय एवं अंधेरों को लेकर भीतर-ही-भीतर एक कुरुक्षेत्र बना हुआ है, इस कुरुक्षेत्र में हर अर्जुन के सामने अपने ही लोग हैं जिनसे वह लड़ रहा है, हर अर्जुन की यही नियति है। ऐसी ही नियतियों का उसे बार-बार सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस पार्टी को जीवंत करने वाले युवा, अनुभवी, कांग्रेसी नेताओं एवं गांधी परिवार के बीच खींचतान की एक झलक तब मिली थी जब कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक दल के नेतृत्व को सुनिश्चित करने की आवश्यकता व्यक्त की। इसी पत्र पर सोमवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक पार्टी के हालिया इतिहास का सर्वाधिक गरमा-गरमी वाला घटनाक्रम बन गया। बावजूद इसके, यह सवाल बना ही रहा कि इससे पार्टी को मिला क्या?

बैठक के अंत में सोनिया गांधी ‘आहत होने के बावजूद’ थोड़े और समय तक अंतरिम अध्यक्ष बने रहने के लिए मान गईं। इस बैठक में स्वतंत्र सोच रखने वाले कांग्रेसी नेताओं पर नाराजगी जताई गयी, नेतृत्व परिवर्तन की मांग करने वाले 23 नेताओं की मंशा एवं नीयत पर सवाल भी उठाये गये थे, इन अलोकतांत्रिक स्थितियों को लेकर कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने आक्रोशित होकर अपने त्याग-पत्र भी प्रस्तुत किये, कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सोशल मीडिया पर ट्वीट कर अपनी नाराजगी भी व्यक्त कर दी थी, भले ही बाद में अपनी सफाई देते हुए अपना ट्वीट हटा दिया था। लेकिन कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी के बयान के बाद काफी आक्रामक शोर एवं सुर उठे, वे पार्टी की चिन्ताजनक स्थिति की गवाही देते हैं। पार्टी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। उससे पार्टी के भविष्य पर सहज ही अनुमान लगाया जाना गलत नहीं होगा। सवाल यह है कि पार्टी के भीतर ऐसी नौबत क्यों आयी? देश की सबसे पुरानी एवं ताकतवर पार्टी होकर आज इतनी निस्तेज क्यों है? देश की राजनीति की दिशा एवं दशा तय करने वाली पार्टी हाशिये पर क्यों आ गयी है? क्यों उसकी यह दुर्दशा हुई? कांग्रेसी नेताओं के बीच नेतृत्व के प्रश्न पर जैसी उठापटक देखने को मिल रही है वह अभूतपूर्व है, उसने पार्टी के पुनर्जीवन की संभावनाओं को एक बार फिर धुंधला दिया है।

एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर हुई कार्यसमिति की बैठक बिना किसी ठोस निर्णय के सम्पन्न हो गयी। इस बैठक में भी राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने का मान-मनव्वल का कार्यक्रम सफल नहीं हुआ और बात गांधी परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को ही अध्यक्ष बनाने की ओर बढ़ी तो पार्टी में दो धड़े बंटे हुए स्पष्ट दिखे। एक बड़ा प्रश्न उभरा है कि क्या हर राज्य में कम से कम दो गुटों में बंटे इन नेताओं के बीच से पार्टी के शीर्ष पद के लिए कोई एक सर्वमान्य नाम निकालना संभव होगा? क्या नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का व्यक्ति प्रभावी एवं सक्षम तरीके से नेतृत्व संभाल पाएगा? क्योंकि राहुल गांधी बिना अध्यक्ष बने ‘सुपर पावर’ और ‘सुपर बॉस’ बने रहना चाहते हैं। पार्टी पर वे अपना नियंत्रण चाहते हैं। ऐसी स्थिति में कौन बाहर का प्रभावी एवं स्वाभिमानी नेता राहुल की अधीनता स्वीकारने को तैयार होगा? उसके लिये कैसे एवं किस तरह काम करना सहज एवं सुगम होगा?

आखिरकार सोनिया गांधी को ही पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनाकर यह बैठक पार्टी की एक साल पहले वाली स्थिति में ही खड़ी हो गयी है। यह बैठक ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए यथास्थिति कायम रखने के पक्ष में सहमति बना पायी है। इसका यह भी अर्थ है कि राहुल गांधी बिना कोई जिम्मेदारी संभाले पार्टी को पहले की तरह पिछले दरवाजे से संचालित करते रहना चाहते हैं। शायद सोनिया गांधी भी यही चाहती हैं। सोनिया का अपना पद छोड़ने की पेशकश करना महज एक दिखावा था या पार्टी के नाराज नेताओं के बीच पार्टी की पुरानी व्यवस्था कायम रखने पर सहमति बनाना। आखिरकार ऐसा ही हुआ, लेकिन इससे तो कांग्रेस की जगहंसाई ही हुई। आम जनता अब इतनी भी भोली नहीं है, वह सब समझती है, आखिर इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि नेतृत्व के मसले को हल करने के लिए बैठक बुलाई जाए और उसमें इस पर कोई निर्णायक स्थिति न बने? यदि नेतृत्व के मसले को हल ही नहीं करना था तो फिर कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई ही क्यों गई? क्योंकि देश की जनता को बार-बार गुमराह किया जाता है, दिग्भ्रम की स्थिति में रखा जाता है।

यह साफ-साफ समझ आता है कि कांग्रेस का गांधी परिवार के बगैर गुजारा नहीं हो सकता, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि परिवार ही यह तय न कर पाए कि पार्टी की कमान किस सदस्य को सौंपी जाए? क्या इस असमंजस का कारण यह है कि पार्टी नेताओं का एक गुट राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं? जो भी हो, यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि सोनिया गांधी उस वक्त का इंतजार कर रही हैं जब पार्टी के सभी प्रमुख नेता एक स्वर से यह मांग करने लगें कि राहुल गांधी के फिर पार्टी अध्यक्ष बने बगैर कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं। इसीलिये लम्बे समय से ये अनिर्णय की स्थितियां बनी हुई रखी जा रही हैं, लेकिन कब तक? मुश्किल यह भी है कि ऐसा होना आसान नहीं, क्योंकि पार्टी की गुटबाजी सबके सामने आ गई है। कांग्रेस का एक खेमा जिस तरह यह साबित करने में लगा हुआ है कि पार्टी के बड़े नेता राहुल गांधी की हां में हां मिलाने से इन्कार करके भाजपा के मन मुताबिक काम कर रहे हैं उससे यही पता चलता है कि सोनिया और राहुल समर्थक नेताओं के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हो गई है। चूंकि दोनों ओर से तलवारें खिंच गई हैं इसलिए आने वाले दिनों में यह खाई और अधिक गहरी ही होनी है। आखिर इस हालत में कांग्रेस रसातल की ओर नहीं जाएगी तो किस ओर जाएगी?

गांधी परिवार के बाहर नेता के नाम पर सहमति बनी तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी उसकी छत्रछाया में फल-फूल पाएगी? पिछली आधी सदी से कांग्रेस का जो हाल बना हुआ है उसे देखते हुए नेहरू-गांधी परिवार के बगैर कांग्रेस की कल्पना करना बहुत कठिन है। कांग्रेस को भाजपा के सामने जिंदा रहना है तो उसे पार्टी मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त और चौबीसों घंटे, बारहों मास सक्रिय रखने वाला नेतृत्व अपनाना होगा। अन्यथा कांग्रेस पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट और गहराता जायेगा। इन जटिल होती परिस्थितियों के बीच पार्टी फिर से मूल्यों पर लौटकर अपने आपको एक नए दौर की पार्टी के तौर पर पुनर्जीवित कैसे कर पाएगी? गांधी परिवार पर निराशाजनक निर्भरता पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है, दूसरी बड़ी चुनौती केन्द्रीय नेतृत्व की है। लेकिन किसी वजह से पार्टी अब भी आगे की दिशा में बड़ा कदम उठाने से कतरा रही है, जिससे पार्टी की टूटती सांसों को नया जीवन मिलने की संभावनाओं पर लगातार विराम लगता जा रहा है।

गांधी परिवार के प्रति निष्ठाशील एवं स्वतंत्र सोच के नेताओं के बीच लम्बे अरसे से खींचतान चल रही है। जिससे पार्टी उभरने की बजाय रसातल की ओर बढ़ती जा रही है। इसका मन्तव्य क्या यह निकाला जा सकता है कि गांधी परिवार के नेतृत्व में परिपक्वता एवं राजनीतिक जिजीविषा का अभाव है। जबकि पार्टी के पास लम्बा राजनीतिक अनुभव भी है और विरासत भी। उसे तो ऐसा होना चाहिए जो पचास वर्ष आगे की सोच रखती हो पर वह पांच दिन आगे की भी नहीं सोच पा रही हैं। केवल खुद की ही न सोचें, परिवार की ही न सोचें, जाति की ही न सोचें, पार्टी की ही न सोचें, राष्ट्र की भी सोचें। जब पार्टी राष्ट्र की सोचने लगेगी तो पार्टी की मजबूती की दिशाएं स्वयं प्रकट होने लगेंगी। लेकिन ऐसा न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस दुर्भाग्य के दंश को मिटाने के लिये पार्टी में स्वतंत्र सोच एवं कार्यशैली को प्राथमिकता देनी ही होगी। कांग्रेस को असमंजस, अन्दरूनी कलह एवं उठापटक से उबरना होगा। वास्तव में पार्टी का भला तब तक नहीं हो सकता जब तक वह केन्द्रीय नेतृत्व के सवाल को ईमानदारी से हल नहीं करती। पार्टी को सोच के कितने ही हाशिये छोड़ने होंगे। कितनी लक्ष्मण रेखाएं बनानी होंगी। सुधार एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। महान् अतीत महान् भविष्य की गारण्टी नहीं होता। पार्टी के सुधार के प्रति संकल्प को सामूहिक तड़प बनाना होगा। पार्टी के चरित्र पर उसकी सौगन्धों से ज्यादा विश्वास करना होगा। कौन समझाये कि जमाना बदल चुका है अब पारिवारिक मोह, सत्ता की लालसा और उसी दौड़ में शामिल होकर जनता के दिलों को नहीं जीता जा सकता। सोच बदलनी होगी, जनता पर विश्वास कायम करना होगा, वरना पार्टी के पुनर्जीवन की संभावनाएं धुंधलाती रहेंगी।

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