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जनसंख्या नियंत्रण पर मोदी सरकार की क्या हो सकती है नीति ?

सोनम लववंशी


मोदी सरकार ने वर्षों से अटके मुद्दों यथा- धारा 370, तीन तलाक़ और राम मंदिर को चुटकियां बजाते ही मानों ख़त्म कर दिया हो। इतना ही नहीं मोदी सरकार की दूरदर्शिता और सामाजिक सरोकार से जुड़े होने का ही यह परिणाम है, कि देश को नई शिक्षा नीति प्राप्त हो सकी। जिसकी दरकार वर्षों से थी। ऐसे में मोदी सरकार के सामाजिक सरोकारों से जुड़े मैराथन भरे कार्यों को देखते हुए सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या अब आने वाले दिनों में मोदी सरकार का अगला कदम जनसंख्या नियंत्रण बिल होगा? कोरोना काल वैसे तो कई चुनौतियों और संघर्षों से भरा हुआ है। कोविड-19 वायरस ने बड़ी-बड़ी महाशक्तियों को अपने आगे नतमस्तक कर दिया है। चीन से आएं इस वायरस का अब तक कोई तोड़ नही मिल सका है। सम्पूर्ण विश्व आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। भारत की ही बात करे तो इस वायरस से न केवल देश में आर्थिक मंदी का दौर शुरू हुआ है, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और यहां तक कि हमारी संस्कृति पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। आज भले ही लॉकडाउन का दौर लगभग समाप्त हो गया हो; लेकिन इस वायरस ने यह साबित कर दिया है कोई देश चाहे कितनी भी बड़ी महाशक्ति क्यों न बन जाए लेकिन असली जीत तभी होती है, जब संघर्ष के दौर में भी सरकार देश हित के लिए उचित निर्णय ले। जो राष्ट्र निर्माण में अपनी महती भूमिका निभाए। कोरोना काल में भारत सरकार ने ऐसे कई महत्वपूर्ण फैसले लिए है जो आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होंगे।
वर्षों से चले आ रहे हिन्दू आस्था के प्रतीक भगवान श्री राम जी के मंदिर का भूमिपूजन कर देश के मुखिया ने यह साबित कर दिया है कि राम मंदिर न केवल हमारी आस्था का प्रतीक है; बल्कि हमारी संस्कृति में भी राम जी के आदर्शों का कितना महत्व है। करीब 500 वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद राम मंदिर का सपना साकार हो रहा है। राम मंदिर भूमिपूजन के बाद नई शिक्षा नीति लागू करके मोदी सरकार ने यह भी बता दिया है देश मे संस्कृति का जितना महत्व है। उससे भी कहीं अधिक महत्व तो आधुनिक शिक्षा का भी है। हमारी शिक्षा व्यवस्था पर लंबे समय से बहस जारी थी। देश तो आजाद हो गया था, लेकिन हम अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ही शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। जो न तो देश को प्रगति के पथ पर ले जाने का साधन बन पा रही थी और न ही सम्पूर्ण मानवीय चरित्र का विकास कर पा रही थी। ऐसे में मोदी सरकार ने शिक्षा पद्धति में परिवर्तन कर देश को आत्मनिर्भर बनाने की राह में एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। इन सब जनहितैषी कार्यों को देखते हुए अटकलें लगाई जा रही कि अब मोदी सरकार का अगला महत्वपूर्ण कार्य क्या होगा? ऐसे में लग तो यही रहा कि सरकार का अगला क़दम जनसंख्या नियंत्रण बिल हो सकता है। जिसकी पहल बीजेपी के राज्यसभा सांसद अनिल अग्रवाल ने प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिख कर ही दी है। वैसे भी जनसंख्या विस्फोट आज के समय मे सबसे गम्भीर मुद्दा बना हुआ है, लेकिन कोई भी सरकार इस मुद्दे पर निर्णय नही ले सकी है, और न ही कोई उचित कदम बढ़ाया है। ऐसे में अब मोदी सरकार से अपेक्षा की जा रही कि वह इस विषय पर जल्द कुछ न कुछ अवश्य करती हुई नज़र आएगी।
वैसे यह भारत देश की सबसे बड़ी बिडम्बना ही है कि भारत “परिवार नियोजन” अपनाने वाला विश्व का पहला देश था। 1949 में परिवार नियोयन कार्यक्रम का गठन हुआ था तथा 1952 में पहले परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत हो गई थी बावजूद इसके आज भारत विश्व जनसंख्या में दूसरे स्थान पर है। इतना ही नहीं वह दिन दूर नही जब चीन को पीछे छोड़ते हुए हमारा देश जनसंख्या वृद्धि के मामले में पहले स्थान पर पहुँच जाएगा। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक सामाजिक विभाग के अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या 2030 तक 1.5 बिलियन होने का अनुमान है तो वही 2050 तक जनसंख्या 1.64 बिलियन तक पहुंच जाएगी। आज देश की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई जनसंख्या है। 1947 में हमारे देश की कुल आबादी 34.20 करोड़ थी, जो अब 131 करोड़ को पार कर चुकी है।
हमारे देश में जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण लैंगिक असमानता है। 2019 के ग्लोबल जेंडर इक्वलिटी इंडेक्स के मुताविक 129 देशों के सर्वे में भारत 95 वें स्थान पर रहा है। जो यह बताता है कि भले हम 21वीं सदी में जी रहे है, लेकिन हमारी मानसिकता आज भी पुरूषवादी सोच से ग्रस्त है। आज भी हम बेटी से ज्यादा बेटों को ही महत्व देते है और बेटों की चाह में कहीं न कहीं अनजाने में जनसंख्या वृद्धि के वाहक बनते जाते हैं। देखिए न अर्थ ओवर शूट डे 2018 में 1 अगस्त को ही मानना पड़ा। यही अर्थ ओवर शूट डे 2017 में 2 अगस्त तो तो वहीं 1993 में यह 21 अक्टूबर को आया था। इन सब के बीच 2019 में अर्थ ओवर शूट डे 29 जुलाई को ही आ गया। मतलब हर वर्ष यह अपने पूर्ववर्ती समय से पहले ही घटित हो रहा। यहां इस डे का मतलब यह है कि पृथ्वी जितना संसाधन साल भर के लिए पैदा करती। उसे हम तय मियाद से पूर्व ही ख़त्म कर देते। ऐसे में सोचिए आने वाले समय में इसी कदर बेतहाशा जनसंख्या में वृद्धि होती रही फिर किस हद तक लोग दाना और पानी के लिए तराशने लगेंगे! वैसे दाना और पानी तो अभी भी सिर्फ़ भारत में करोड़ो लोगों को मयस्सर नहीं होता। यहां एक अन्य आंकड़े की बात करें तो भारत में परिवार नियोजन के तमाम कार्यक्रम चलाएं जाने के बाद भी प्रजनन क्षमता चीन और अमेरिका से अधिक है। विश्व बैंक के 2016 के आंकड़े के मुताबिक भारत में प्रति महिला प्रजनन क्षमता 2.33 फ़ीसदी है। जबकि अमेरिका में 1.80 और चीन में 1.62 फ़ीसदी है। विदित हो 2.1 को वैश्विक परिदृश्य पर ‘रिप्लेसमेंट रेट’ माना जा रहा। यानी जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए एक महिला के औसतन 2.1 बच्चे ही होने चाहिए। ऐसे में सारी बातें इसी तरफ़ इशारा करती हैं कि अब समय आ गया है कि जनसंख्या नियंत्रण पर सरकार जल्द ही कोई कड़ा कदम उठाए जिससे न केवल प्रकृति का संरक्षण हो पाएगा, साथ ही साथ भारत भूमि पर रहने वाले लोगों के हिस्से में पर्याप्त संसाधन भी आ सकेंगा।
सोनम लववंशी

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