Categories
स्वर्णिम इतिहास

अरब के खलीफा भी भय खाते थे गुर्जर सम्राट मिहिर भोज से

गुर्जर सम्राट की जयंती के अवसर पर विशेष

सम्राट मिहिर भोज का शासनकाल अरब साम्राज्य के अब्बासी वंश के खलीफाओं मौतसिम (833 से 842 ई0 ), वासिक ( 842 से 847 ई0 ) मुतवक्कल ( 847 से 861 ई0 ) , मुन्तशिर ( 861 से 862 ई0 ) मुस्तईन ( 862 से 866 ई0 ) , मुहताज (866 से 869 ई0 ) , मुहतदी ( 869 से 870 ई0 ) , मौतमिद ( 887 से 892 ई0 ) का समकालीन रहा। इस प्रकार कुल आठ खलीफा ऐसे रहे जो इस महाप्रतापी गुर्जर सम्राट से सीधे शत्रुता मानते रहे । जो भी खलीफा आता था , वही इस प्रयास में रहता था कि भारत में प्रवेश करने का संकल्प उसके शासन में यदि पूर्ण हो जाए तो अच्छा रहेगा । दूसरे, अभी तक जितने भी प्रयास अरब आक्रमणकारियों को भारत से बाहर रोके रखने हेतु सम्राट मिहिर भोज के पूर्ववर्ती गुर्जर शासकों ने किए थे , उन सबके कारण भी प्रतिशोध का भाव अरब में क्रोधाग्नि के रूप में उबल रहा था । इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रतिशोध की अग्नि में जलते शत्रु के कितने भारी प्रतिशोध का सामना इस गुर्जर सम्राट मिहिर भोज को करना पड़ा होगा ?
वैसे भी मुस्लिम शासकों के दृष्टिकोण में ‘प्यार में और वार’ में सब कुछ जायज माना जाता है , अर्थात अनैतिकता की किसी भी सीमा को लांघ जाना या अनैतिकता के किसी भी हथकंडे को अपना लेना मुस्लिम शासकों का धर्म था । उनकी रणनीति इसी दृष्टिकोण से बनती थी कि शत्रु को जैसे भी हो वैसे ही परास्त किया जाए या समाप्त कर दिया जाए । जबकि भारतीय शासकों का दृष्टिकोण ‘युद्ध में भी धर्म’ का निर्वाह करने का होता था। हमारे शासक मानवतावादी दृष्टिकोण रखकर शत्रु पक्ष के साथ मानवीय व्यवहार करने को भी किन्ही विशिष्ट परिस्थितियों में मान्यता देते थे । जबकि शत्रु पक्ष दानवतावादी होकर युद्ध करता था। यद्यपि सम्राट मिहिर भोज भारत की उस परम्परा में विश्वास रखते थे जो युद्ध में शत्रु को शत्रु ही मानती आ रही थी, उनके दृष्टिकोण में जो भी शत्रु हमारे देश को या हमारे राष्ट्र को या हमारे राष्ट्रवासियों को किसी भी प्रकार की क्षति पहुंचाने का संकल्प रखता है या सपना संजोता है , उसका विनाश करना ही एकमात्र उपाय है । उनका मानना था कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना ही नीति है। यही धर्म है और यही देशभक्ति है।

यही कारण रहा कि सम्राट मिहिर भोज ने सिंध प्रान्त की सुरक्षा और वहाँ अरब आक्रमणकारियों की चल रही किसी भी प्रकार की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर पूर्ण नियन्त्रण स्थापित रखने का वन्दनीय प्रयास किया । सम्राट ने अपने पूर्ववर्ती नागभट्ट द्वितीय की सैनिक नीति का अनुकरण किया और अरब आक्रमणकारियों के विरुद्ध कठोर दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें भारत के बाहर ही रोके रखने में सफलता प्राप्त की ।

अरबों को सम्राट ने कर दिया था बेहाल ।
झांक सके न इस तरफ मिली नहीं कोई ढाल ।।

सम्राट ने इन भारत विरोधी शक्तियों से कई युद्ध किए और अपने स्वामीभक्त व देशभक्त सेनानायकों और सामंतों की सहायता से अरब की शत्रु सेनाओं को पछाड़कर उनकी शक्ति का पूर्ण विनाश कर दिया । उन्होंने सिंध नदी के पश्चिमी क्षेत्रों पर भी अधिकार स्थापित किया और समस्त सिंध प्रान्त (मनसूरा व मुल्तान के अतिरिक्त ) को गुर्जर साम्राज्य में मिला लिया। धौलपुर के सामन्त चन्द्र महासेन चौहान के 842 ई0 के एक लेख में यह स्पष्ट किया गया है कि सम्राट मिहिर भोज ने म्लेच्छों को अपने आधीन करके अर्थात उन पर अपना नियन्त्रण स्थापित करके उनसे कर वसूल किया था।

सम्राट के विरुद्ध बना तिकोना मोर्चा

उस समय के अरब के नेतृत्व ने भी बहुत कूटनीति का परिचय देते हुए बड़ी सावधानी से अपनी गोटियां बिछानी आरंभ की थीं । खलीफाओं ने अपने लोगों को भारत के राष्ट्रकूटों के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया । जो गुर्जर प्रतिहार शासकों के शत्रु थे । उधर राष्ट्रकूट शासकों को भी किसी मित्र की आवश्यकता थी । यह उनके विचारों की पतन की अवस्था को सूचित करता है कि उन्होंने देश विरोधी शक्तियों से भी उस समय हाथ मिलाना उचित समझा और उसका कारण केवल यह था कि अरब के लोग मिहिर भोज से शत्रुता मानते थे । यही कारण रहा कि राष्ट्रकूट शासकों ने भी शत्रु के शत्रु को अपना मित्र बना लिया उधर अरब वालों ने भी शत्रु के शत्रु अर्थात अरब वालों को अपना मित्र बनाना आरम्भ किया । इसी समय बंगाल के पाल वंश के शासक ने भी राष्ट्रकूट और अरबों का सहयोग व समर्थन करना आरम्भ किया । क्योंकि वह भी भारत के महानायक गुर्जर सम्राट मिहिर भोज से शत्रुता मानता था ।
इस प्रकार एक तिकोना मोर्चा गुर्जर सम्राट मिहिर भोज के विरुद्ध बना। जिसमें पश्चिम बंगाल का पाल वंश , दक्षिण का राष्ट्रकूट वंश और अरब के खलीफा सम्मिलित थे । इसके लिए अरब के खलीफा अपनी योजना को सिरे चढ़ाने के लिए वहाँ से बेशकीमती घोड़े भेजते थे और उन्हें अपने लोगों के माध्यम से राष्ट्रकूट शासकों को सप्रेम भेंट करवाते थे । बदले में राष्ट्रकूट शासक अपनी ही धरती पर विदेशी शत्रुओं ससम्मान बसाते थे और उनकी बस्तियों में वह अपनी इच्छा से अपना प्रशासक नियुक्त कर सकें ऐसी छूट भी उन्हें प्रदान करते थे । इस प्रकार बहुत बड़ी चुनौती इस तिकोने मोर्चे ने सम्राट मिहिर भोज के सम्मुख खड़ी कर दी थी , परन्तु इस सबके उपरान्त भी सम्राट मिहिर भोज भी ‘मिहिर भोज’ ही थे , इसलिए वह भी तिकोने मोर्चे के सम्मुख कभी झुके नहीं ।उनकी वीर सेना ने अपने पराक्रम और शौर्य से सदा इस ने मोर्चे को पराजित ही किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
mariobet giriş
betvole giriş
mariobet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
mariobet giriş
betpas giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
dedebet
betkanyon
radissonbet
casinofast
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
norabahis giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betwild giriş
redwin giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
redwin giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
hilarionbet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş