प्राचीन भारत में स्त्रियों को सैनिक शिक्षा

INDIA-DEFENCE-BORDER SECURITY-FEMALE CADETSवीणा सेठी
यह बात हमेशा कही जाती है कि जहां पर नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। नारी की भारत के घर घर में किस तरह से पूजा और कैसा सम्मान किया जा रहा है, यह सर्वविदित है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उसे सदैव ही पुरूष के संरक्षण की आवश्यकता का अनुभव इस गंभीरता से कराया जाता है कि वह पुरूष की केवल परछाई मात्र बनकर रह गयी। वास्तव में नारी संरक्षण को उसके चरित्र व कौमार्य से इस तरह जोड़ दिया गया मानों यदि वह पुरूष के अधीन नही रही तो उसका कौमार्य भंग हो सकता है या चरित्र हनन हो सकता है। आज नारी की अस्मिता लोगों को भयावह समस्या की तरह लगती है। आज के भारतीय समाज में नारी के चारों ओर का घेरा इतना तंग है कि वह यदि घर से बाहर भी निकलती है, राह पर चलती है तो सोचती है कि कैसे बचकर निकला जाए? क्या यही दृश्य प्राचीन भारत में भी था? उत्तर है नही, उस काल की नारी रात्रि में भी स्वच्छंद विचरण करती थी। आज की अबला नारी वैदिक काल में शक्तिरूपा समझी जाती थी। उस काल के सभी देवी देवता शस्त्रधारी वर्णित है। किंतु देवियां पुरूषों की अपेक्षा अधिक शस्त्र धारण किया करती थीं। देवताओं के चार या अधिक से अधिक छह हाथ होते थे और उनमें उतने ही शस्त्रास्त्र भी होते थे। वहीं देवियों के अठारह या इक्कीस शस्त्रधारी हाथों का वर्णन मिलता है। देवों की अपेक्षा देवियों के पास अधिक संहारक शस्त्र अस्त्र हैं। इसका तात्पर्य यही है कि राष्ट्र में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों की रक्षा अधिक होनी चाहिए। अत: उनके पास अपनी रक्षा के लिए अधिक शक्ति व साधन होना आवश्यक है। पुरूषों की रक्षा समाज में आवश्यक है किंतु नारियों को असामाजिक तत्वों से रक्षा की अधिक आवश्यकता है। अत: स्वसंरक्षण की शिक्षा समाज की आवश्यकता होती थी। वेदों में गणेश देवता भी स्त्रियों के दल बनाये गये थे और उनके द्वारा राष्ट्रकार्य करवाया गया थ। ऋग्वेद में राजकुमारी विश्पला का वर्णनआता है कि उसने किस वीरता से अपने पिता के राज्य की रक्षा की।
राजकुमारी विश्पला खेल नामक राजा की पुत्री थी। संभवत: वह अफगानिस्तान का कोई राजा था। क्योंकि आज भी पठानों में झाकाखेल ईसाखेल आदि नाम देखे जा सकते हैं। वैदिककाल में खेल नामक ऐसा ही एक राजा था। एक बार शत्रुओं द्वारा उसके राज्य पर आक्रमण करने पर राजा के सेनापति ने सेना सहित शत्रुओं पर आक्रमण कर दिया, किंतु शत्रु बहुत शक्तिशाली था। अत: सेनापति हार गया और सारी सेना नष्ट हो गयी, अत: राजा का चिंतित होना स्वाभाविक था।
हार के समाचार के समय राजकुमारी विश्पला वहीं खड़ी थी उसने अपने पिता को सांत्वना दी कि सेना लेकर शत्रुओं पर आक्रमण करेगी। राजा की स्वीकृति मिलने पर विश्पला सेना एकत्रित कर शत्रुओं पर टूट पड़ी। शत्रु विश्पला से अधिक शक्तिशाली सिद्घ हुए और उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी। उसे घायलावस्था में रणभूमि से वापस लौटा देखकर राजा और भी दुखी हो जाता है। तब विश्पला पिता को सांत्वना देती है और अनुरोध करती है कि वे उसकी टांग वैद्यों से ठीक करवा दें ताकि वह फिर से खड़ी होने योग्य पर शत्रुओं पर आक्रमण कर सकें। इस पर राजा अपने वैद्य को बुलवाकर अपनी कन्या का उपचार करवाता है। खेल राजा के वैद्य ने विश्पला की टूटी हुई टांग काट डाली, घाव ठीक किया तथा उस कटी हुई टांग के स्थान पर लोहे की टांग लगवाकर उसे युद्घ में जाने के योग्य बना दिया। इसका वर्णन ऋग्वेद में इस प्रकार है-जंघा आयसीं विश्पलायै अधत्तम। (ऋ 1.116.15)
विश्पला के लोहे की टांग बिठलायी और विश्पला ने शत्रु पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की। ऋग्वेद का यह मंत्र इस बात का साक्षी है कि वेदकालीन चिकित्सा शास्त्र कितना बढ़ा चढ़ा था।
नारियों को स्वसंरक्षण की शिक्षा
राजा खेल की पुत्री विश्पला वैदिक कालीन नारियों की वीरता का प्रमाण प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त रामायण काल में दशरथ की पत्नी कैकेयी भी युद्घ में अपने पति की सहायता किया करती थी। काली, चण्डी, चामुण्डा आदि देवियां महान सेना लेकर असुर सेना पर आक्रमण करती थीं। महिषासुर जैसे राक्षसों का वध किया करती थीं। गणपति काशीराज के राज्य में स्त्रियों के दल तैयार किये जाते थे और वे दल उत्तम कार्य करते थे। जब पुरूषों के दल हार जाते थे, तब इन स्त्रियों के दल विजयी होते थे।
इस प्रकार पता चलता कि वैदिक कालीन नारियां सेनापति का कार्यभार सफलतापूर्वक संचालित करती थीं। ये नारियां अपने दल तैयार करती थीं, युद्घ करती थीं और शत्रुओं का दमन करती थीं। इन स्त्रियों ने दुर्जेय राक्षसों और दानवों का सफलतापूर्वक संहार किया था। ये सब कार्य बिना पूर्व तैयारी के संभव नही हो सकते थे। इसके लिए विशेष सैन्य प्रशिक्षण और युद्घ कौशल की आवश्यकता थी जो एक दिन में नही हो सकता था। अत: यह तथ्य प्रामाणिक है कि वैदिक कालीन नारियों को इस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता था कि वे अपनी रक्षा कर सकें व समय आने पर राष्ट्र की रक्षा में सहयोग भी कर सकें। यह सब बुद्घ पूर्वकाल में होता था। उस समय की नारियां अट्ठाइस-अट्ठाइस तरह के शस्त्रास्त्रों का कुशलतापूर्वक संचालन कर लेती थीं। आज के देवी देवताओं के चित्रों में ऐसे चित्र सौभाग्य से ही मिलते हैं। किसी देवी के अ_ाइस हाथों को मानने की अपेक्षा यह मानना युक्तिसंगत होगा कि वे अट्ठाइस तरह के शस्त्रास्त्रों का उपयोग कर सकती थीं। अत: नारियों के पास विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्रों का होना और उनका उपयोग यही प्रमाणित करता है कि प्राचीनकाल में नारियों को स्वसंरक्षण की शिक्षा दी जाती थी। वैदिक काल में गार्गी, लोपामुद्रा, वाचक्नवी, वागम्भृणी आदि नारियां ब्रह्ज्ञान में परिपूर्ण हो गयीं थी तथा विश्पला आदि स्त्रियां युद्घ विद्या में पारंगत थीं। जो समय पडऩे पर सेना का संचालन अभूतपूर्व कौशल से करती थीं। भारत में विश्पला, काली, चामुण्डा जैसी वीर नारियों का आज का पूजा बहुसंख्यक समाज आदर करता है उनकी पूजा भी करता है। किंतु यह लज्जा का विषय है कि हिंदू बहुसंख्यक समाज इन नारियों की देवी के रूप में पूजा तो अवश्य करता है किंतु इनके वीरोचित कार्य से आज भी पूर्णत: अनभिज्ञ है। यही कारण है कि नारी की पूजा करने वाले हाथों की आज नारी का अपमान और चरित्र हनन हो रहा है।
नारी वीरा है, पुरंधी है, शक्ति है-
वर्तामान की नारी जिसे अबला समझा जाता है। प्राचीनकाल में शक्तिरूपा थी। काली, चामुण्डा, दुर्गा जैसी देवी नारियों के लिए वेदों में स्तुति की गयी है-
या देवी सर्वभूतेषु कालीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:।।
वैदिक काल में पुत्र को वीर व पुत्री को वीरा कहते थे। ये शब्द अपनी संतानों को पराक्रमी व साहसी बनाने का संकेत देते हैं।
प्राचीन भारत में शिक्षा का पाठ्यक्रम ही इस प्रकार का होता था कि लड़का वीर व कन्या वीरा बनती थी। अन्यथा नारी शक्तिरूपा किस प्रकार बन सकती थी? इस प्रकार की शिक्षा के अभाव में बच्चे स्वत: ही पराक्रमी नही बन सकते।
संस्कृत में नारीके लिए पुरूंध्री, पुरंध्री, पुरंधि इन शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस शब्द की व्युत्पत्ति पुरं धारयति इस प्रकार होती है। पुरं का अर्थ होता है नगर नगर को धारण करने वाली या नगर की रक्षा करने वाली। इस शब्द का मौलिक अर्थ नगर को धारण करने वाली है, पर आज इसका अर्थ घर को धारण करने वाली के अर्थ में लिया जाता है। पुर अथवा पुरी शब्द महानगरियों का वाचक है। ऐसी महानगरियों की रक्षा प्राचीनकाल में स्त्रियां करती थीं। नारियों द्वारा किये जाने वाले इस कार्य से यह प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में देश या राज्य की रक्षा का कार्य पुरूष किया करते होंगे तथा नगर रक्षा का कार्य पुरूष किया करते होंगे तथा नगररक्षा का कार्य स्त्रियां करती रही होंगी। इस काल में यह भी पद्घति थी कि स्त्रियों को शस्त्रास्त्र विद्या सिखाकर समय पडऩे पर सेनापति के पद पर नियुक्त किया जाता था, तब स्त्रियां आह्वान भी करती थीं कि जो मुझे हराएगा मेरा पति होगा।
महिषासुर ने भवानी को अपनी पत्नी बनाने के लिए संदेश भेजा, तो उसने महिषासुर से कहा कि युद्घ में जो मुझे पराजित करेगा, वही मेरा पति होगा। यह संदेश कितना वीरता पूर्ण है। इसी वीरकुमारी भवानी ने राक्षसों का भयंकर संहार किया। इस तरह का वीरता पूर्ण उत्तर देने वाली नारियां अबला हो ही नही सकतीं।
जन्म से वीरा तरूणावस्था में पुरं-धि विवाहिता होने पर शक्ति इस प्रकार उनके नाम सार्थक होते थे। जब वह नेतृत्व करने में समर्थ होती थीं, तब उनका नाम नारी होता था। इन नामों के अर्थ पर दृष्टि डाली जाए तो यह प्रमाणित होता है कि तत्कालीन नारियां अबला नही थीं वे सचमुच सबला और शक्ति थीं। जीवित राष्ट्र में नारी का इसी प्रकार शक्तिरूपा होना आवश्यक है। यदि नारी ही निर्बल या अबला हो तो उसकी संतति भला वीर कैसे हो सकती है।
स्त्रियों को प्राचीनकाल में आर्या भी कहा जाता था, तो फिर ये आर्याएं अब ला किस प्रकार हो सकती हैं? नारियों में शक्ति का अपरिचित स्रोत है। भगवान शंकर जैसे महान पराक्रमी देव भी शक्तिरूपा पार्वती के बिना कुछ न ही कर सकते।
प्राचीन भारत में नारी का उपनयन संस्कार
प्राचीन भारत में शक्ति व नारी एक दूसरे के पर्याय माने जाते थे-ब्रह्मचर्येण कन्य युवानं विन्दते पतिम (अथर्व)
अर्थात ब्रह्मचर्य का पालन करके कन्या तरूण पति को प्राप्त करती है। इसमें स्त्रियों के लिए ब्रह्मचर्य का विधान है। वैदिक काल में नारियों का उपनयन भी होता था, उन्हें भी मेखला धारण तथा दण्ड धारण करना पड़ता था। आज भी स्त्रियां कमरपट्टा बांधती हैं, पर वह स्वर्ण का होने के कारण केवल शोभादायक ही होता है। परंतु आज स्त्रियों का उपनयन नही किया जाता। पारसियों का धर्म भी हिंदू धर्म की तरह ही है। उनकी स्त्रियां भी यज्ञोपवीत धारण करती हैं। पर हमने यह प्रथा बंद कर दी है और स्त्रियों के यज्ञापवीत का भार भी पुरूषों के कंधों पर डाल दिया है। इस प्रकार जो नारियां शक्तिस्वरूपा थीं वे अबला बनकर रह गयीं।
विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति का अतीत इतना गौरवशाली रहा है, उस संस्कृति का वर्तमान और भी उच्च व महान होना चाहिए पर ऐसा नही हो सका। आज नारी की पूजा क्या नारी का सम्मान भी एक मजाक का विषय बनकर रह गया है।
जिस संस्कृति में नारी का सम्मान न हो वह संस्कृति अपने पतन की ओर स्वत: ही अग्रसर हो जाती है। भारतीय समाज में नारी की जिस तरह से अवमानना व अपमान हो रहा है, जिस तरह से दहेज के लिए लड़कियों को जलाया जा रहा है। वह नारी समाज की सड़ी गली व्यवस्था को ललकारती हैं, उनका जिस तरह से अपमान पुरूषों द्वारा किया जाता है, उस समाज और संस्कृति को महान कदापि नही समझा जाना चाहिए। कोई आश्चर्य नही जब इस संस्कृति के गौरवशाली अतीत के चिन्ह भी शेष न रहें। अच्छा यही होगा कि जिस भारतीय संस्कृति की नारियां शक्तिरूपा रही हैं, उन्हें पुन: ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे वे शक्तिस्वरूपा बन सकें।

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