समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से भी नई शिक्षा नीति को समझना पड़ेगा

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डॉ. ज्योति सिडाना

ऐसा माना जाता है कि शिक्षा मनुष्य में आलोचनात्मक चेतना विकसित करती है, उन्हें आर्थिक, सांस्कृतिक और मानव पूंजी में परिवर्तित करती है तथा शोषण व दमन का विरोध करने हेतु जागरूक करती है. हाल ही में भारत सरकार द्वारा जारी नई शिक्षा नीति चर्चा में है क्योंकि इसमें अनेक बड़े बदलावों को स्थान दिया गया है इसलिए अकादमिक गलियारे में इस नीति पर बौद्धिक विचार-विमर्श करना आवश्यक हो जाता है। इस शिक्षा नीति की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से लिखा है कि शिक्षा से चरित्र निर्माण होना चाहिए, विद्यार्थियों में नैतिकता, तार्किकता, करुणा और संवेदनशीलता विकसित होनी चाहिए और साथ ही रोजगार के लिए सक्षम बनाना चाहिए। यह प्रस्तावना इस ओर संकेत करती है कि शिक्षा प्रणाली बच्चों में मानवीय गुणों को विकसित करने के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा विकसित करने की पक्षधर है ताकि वे आत्मनिर्भर एवं एक संगठित व्यक्तित्व के धनी बन सके। इसके साथ ही वर्ष 2040 तक समतामूलक एवं समावेशी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य भी रखा गया है। प्राचीन भारतीय मौलिकता के समावेश के कारण यह नीति सातत्य एवं परिवर्तन को व्यक्त करती है, पर यह पक्ष अपूर्ण है क्योंकि मध्ययुगीन भारतीय शिक्षा, स्वाधीनता संघर्ष के दौरान शिक्षा की गत्यात्मकता एवं स्वतन्त्र भारत में 1991 तक हुए शैक्षिक बदलावों पर यह नीति लगभग खामोश है।

यह भी सच है कि किसी भी राष्ट्र और अकादमिक जगत के विकास एवं विस्तार के लिए बनायी गई नीति संसद एवं विधान सभाओं में बहस के बाद क्रियान्वित की जाए तभी शिक्षा में लोकतंत्र को सशक्त किया जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस नीति का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालय से लेकर माध्यमिक स्तर तक सभी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना एक सराहनीय कदम है। स्कूली पाठ्यक्रम के 10 + 2 प्रारूप के स्थान पर 5 + 3 + 3 + 4 का नया पाठयक्रम प्रारूप लागू करना जो क्रमशः 3 से 8, 8 से 11, 11 से 14 और 14 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए है। 5+3+3+4 का प्रारूप वर्तमान स्थितियों की देखते हुए उपयुक्त है पर 3 साल के बच्चे को स्कूल से जोड़ने का मन्तव्य समझ से परे है। उनके तर्कानुसार ऐसा करना बच्चे के मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण चरण सिद्ध होगा। जबकि ऐसा करना उनके बचपन की समाप्ति का संकेत बन सकता है। मानव जीवन में हर अवस्था केवल एक ही बार मिलती है और हर अवस्था का अपना महत्व होता है, हर अवस्था में मनुष्य स्वाभाविक रूप से बहुत कुछ सीखता है जो जीवन भर उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बना रहता है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी अवस्था (बचपन) को नष्ट न होने दिया जाए क्योंकि स्वाभाविकता की समाप्ति कृत्रिम व्यक्तित्व को विकसित करती है और परिणामस्वरुप वह कृत्रिमता सामाजिक परिवेश और सामाजिक संबंधों में भी दिखाई देती है। उसी तरह कक्षा 6 से विद्यार्थियों को कौशल प्रशिक्षण देना भी बचपन को खत्म करने की ओर एक कदम होगा। समय व आयु से पहले बच्चों पर इस तरह का बोझ डालना उनकी सृजनात्मकता और कल्पनाशीलता को चुनौती दे सकता है। उनमें बंधक मस्तिष्क (कैप्टिव माइंड) को उत्पन्न कर सकता है।

त्रि-भाषायी फार्मूला विद्यार्थियों पर बोझ का पर्याय बनेगा परन्तु स्थानीय भाषाओं में शिक्षण अच्छा कदम है जो शिक्षा के वि-औपनिवेशीकरण को बढ़ावा देगा। धीरे-धीरे स्थानीय भाषाएं हाशिए पर होती जा रही हैं क्योंकि वैश्वीकरण के दौर में अंग्रेजी भाषा का महत्व स्थापित हो चुका है चाहे नौकरी हो या कोई प्रतियोगी परीक्षा। परिणामस्वरुप स्थानीय भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं इसलिए शिक्षा में स्थानीय भाषाओं को स्थान देना एक सराहनीय कदम कहा जा सकता है। दूसरी तरफ इस नीति में विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में प्रवेश देने का विचार एक विरोधाभास जान पड़ता है। एक तरफ शिक्षा में स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का प्रयास और दूसरी तरफ विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों का भारत में प्रवेश शिक्षा के कारपोरेटीयकरण को उत्पन्न करेगा जिससे विद्यार्थियों का एक बड़ा हिस्सा असमान प्रतियोगिता का हिस्सा बन जायेगा। क्योंकि विदेशी विश्विद्यालय स्थानीय भाषा में शिक्षा नहीं देंगे अपितु अंग्रेजी भाषा में देंगे। इस नयी शिक्षा नीति में ऐसे कई और पक्ष भी हैं जो संदेह के घेरे मे हैं जैसे शिक्षकों का विद्यार्थी द्वारा और अन्यों के द्वारा मूल्यांकन करना किस हद तक सही कहा जाना चाहिए क्योंकि इस पर फिर बहस या विवाद करने की अनुमति नहीं होगी। क्या यह शिक्षकों को दबाने या डराने का एक प्रयास नहीं होगा?

एक और पक्ष भी महत्वपूर्ण है कि इस नीति में शिक्षा पर सरकारी ख़र्च को 4.43% से बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद का 6 फ़ीसद तक करने का लक्ष्य है। आज की स्थिति में इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता जबकि 1986 की शिक्षा नीति में इसका सुझाव दिया था परन्तु आज यह पर्याप्त नहीं है इसमें वृद्धि करने की जरुरत है तभी नई शिक्षा नीति के लक्ष्यों को पूरा किया जा सकता है। वहीं नयी शिक्षा नीति में वर्ष 2030 तक प्री-स्कूल से माध्यमिक स्तर में 100% सकल नामांकन अनुपात प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। एन.एस.एस.ओ. के 75वें राउंड सर्वे के अनुसार 6-17 वर्ष के बीच की आयु के विद्यालय न जाने वाले बच्चों की संख्या 3.22 करोड़ है। नियमित शिक्षकों का अभाव, शिक्षण संस्थाओं में आधारभूत संसाधनों का अभाव जैसे पीने के स्वच्छ पानी, शौचालय, आधुनिक संसाधनों से युक्त पुस्तकालय, रीडिंग रूम, घर से अधिक दूरी एवं स्कूल का असुरक्षित वातावरण इत्यादि ऐसे पक्ष हैं जो विद्यार्थियों को बीच में पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर करते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार हर साल 16.88% लड़कियाँ आठवीं के बाद स्कूल छोड़ देती हैं। एन.एस.एस.ओ. के एक सर्वे में सामने आया कि लड़कियों के स्कूल छोड़ने की बड़ी वजह कम उम्र में शादी, स्कूल दूर होना और घर के कामकाज में लगना है और तो और अब स्कूल का असुरक्षित वातावरण भी लड़कियों के ड्राप आउट का एक बड़ा कारण है । ऐसे में जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं किया जायेगा तब तक लड़कियां स्कूल छोड़ने पर मजबूर होती रहेंगी।

नीति में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि विद्यार्थियों को कम आयु में ‘सही को करने’ के महत्त्व को सिखाया जायेगा और नैतिक निर्णय लेने के लिए एक तार्किक ढांचा दिया जायेगा। यहाँ सवाल उठता है कैसे? एक तरफ तो ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ने के लिए बच्चों को आधुनिक टेक्नोलॉजी (कंप्यूटर/मोबाइल) थमा दी जिस पर कुछ भी देखने-सुनने और करने के लिए वे स्वतंत्र हैं और यह भी एक तथ्य है कि श्रव्य माध्यम/मीडिया की तुलना में दृश्य माध्यम/मीडिया का बच्चों के बाल मन पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में सही-गलत के बीच अंतर करना सिखाना या नैतिकता के पक्षों को सिखाना संदेह के घेरे में आ जाता है। समाज वैज्ञानिक मार्गरेट मीड के कथन पर फोकस करने की जरुरत है जब वह कहती हैं कि ‘बच्चों को सिखाए कि कैसे सोचा जाए, न कि क्या सोचा जाए’। सच है कि मूल्य सिखाए नहीं जाते बल्कि व्यवहार के माध्यम से हम उन्हें अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाते हैं। हम प्राथमिक कक्षाओं से ही इन मूल्यों को बताना शुरू कर देते हैं, पाठ्यक्रम में शामिल करते हैं परन्तु क्या हम इन मूल्यों जैसे लैंगिक भेदभाव, धर्मनिरपेक्षता, जाति व धार्मिक भेदभाव, समानता, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, समाजवाद इत्यादि की सही व्याख्या करते हैं?

नीति में इस ओर भी संकेत किया गया है कि 6 वर्ष की आयु तक 85% मस्तिष्क का विकास हो जाता है। हो सकता है कि बौद्धिक विकास संभव हो परन्तु सामाजिक-सांस्कृतिक समझ, आलोचनात्मक दृष्टि और तार्किकता इतनी छोटी आयु तक विकसित होना असंभव होता है। क्योंकि इस समय तक सामाजिक परिवेश से उसकी अंतःक्रिया बहुत अधिक नहीं होती। व्यक्तित्व निर्माण के लिए केवल शारीरिक और मानसिक परिपक्वता ही जरुरी नहीं होती अपितु सामाजिक-सांस्कृतिक परिपक्वता भी जरुरी होती है। इसलिए इस तर्क को आधार बना कर छोटी उम्र में बच्चों के स्कूल में प्रवेश या कौशल प्रशिक्षण का पक्षधर होना सही नहीं कहा जा सकता।

शोध कार्य पर बल देना उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माना गया है और इस नीति में इस बात का ध्यान भी रखा गया है। इसलिए शोध करने के लिए एक मज़बूत अनुसंधान संस्कृति तथा अनुसंधान क्षमता को बढ़ावा देने के लिए एक शीर्ष निकाय के रूप में नेशनल रिसर्च फ़ाउंडेशन (एन.आर.एफ.) की स्थापना करने का भी उल्लेख है जिसे स्वतंत्र रूप से सरकार द्वारा एक बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स द्वारा शासित किया जाएगा। परन्तु यहाँ एक सवाल यह उठता है कि शोध के विषय और शोध पद्धति पर भी क्या इस फाउंडेशन का नियंत्रण होगा? क्या शोधार्थी सत्ता के पक्षधर विषयों को ही शोध हेतु चुनेने के लिए बाध्य होंगे? अगर ऐसा होता है तो अकादमिक स्वायत्ता के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी। साथ ही पहली बार मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम लागू किया गया है। अगर चार साल इंजीनियरिंग पढ़ने या छह सेमेस्टर पढ़ने के बाद किसी कारणवश कोई विद्यार्थी आगे नहीं पढ़ पाते हैं तो उन्हें एक साल के बाद सर्टिफ़िकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और तीन-चार साल के बाद डिग्री मिल जाएगी। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि इससे उन छात्रों को बहुत फ़ायदा होगा जिनकी पढ़ाई बीच में किसी वजह से छूट जाती है। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या 3-4 वर्ष का सम्पूर्ण पाठ्यक्रम वह एक या दो साल में कर पायेगा? या उस पाठ्यक्रम में पूर्ण पारंगत हो पायेगा? या केवल सर्टिफ़िकेट और डिप्लोमा पास का लेबल ही प्राप्त कर पायेगा? इस योग्यता के आधार पर उसके भविष्य की क्या संभावनाएं होंगी? इन सब पक्षों का अभी स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। यह भी स्पष्ट है कि शिक्षक, विद्यार्थी और शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता संदिग्ध है।

इन सब पक्षों को ध्यान में रखकर इस नयी शिक्षा नीति पर व्यापक बहस की जरुरत है। वरना इस नीति के उद्देश्य भले ही कितने अच्छे क्यों न हो इसके परिणामों की कल्पना नहीं की जा सकती।

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