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भारत का अमेरिका के साथ बढ़ता व्यापार एवं निवेश की सम्भावनाएँ

अभी हाल ही में भारत अमेरिका व्यापार परिषद की स्थापना के 45 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी ने भारत विचार शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए अमेरिका सहित विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश करने के लिए आमंत्रण दिया। प्रधानमंत्री ने, स्वास्थ्य, रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, बीमा समेत कई अन्य क्षेत्रों में विदेशी निवेश के लिए भारत में अवसर उत्पन्न होने के कई कारण गिनाए। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अवसरों की भूमि के रूप में उभर रहा है। विशेष रूप से स्वास्थ्य, रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, बीमा आदि क्षेत्रों पर निवेशकों का ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विदेशी निवेशकों को स्वास्थ्य सेवा, रक्षा और अंतरिक्ष, ऊर्जा, बीमा आदि क्षेत्रों में निवेश करने के लिए आमंत्रित करता है। भारत में स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र प्रति वर्ष 22 प्रतिशत से भी अधिक तेजी से बढ़ रहा है। भारत रक्षा के क्षेत्र में विदेशी निवेश के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 74% तक बढ़ा रहा है। इसी प्रकार, चूँकि भारत में गैस आधारित अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है अतः ऊर्जा के क्षेत्र में भी विदेशी निवेश के लिए भारत में अपार सम्भावनाएँ पैदा हो रही हैं। भारत ने बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 49% तक बढ़ा दिया है। साथ ही, अब बीमा मध्यस्थों के व्यवसाय में विदेशी निवेश के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 100% तक बढ़ा दिया गया है।

हाल ही के समय में भारत और अमेरिका के बीच आपस में व्यापार और निवेश के सम्बंध मज़बूत होते जा रहे हैं। विशेष तौर पर विदेशी व्यापार के क्षेत्र में अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा साझीदार बन गया है। हालाँकि भारत की अर्थव्यवस्था मूलतः निर्यात आधारित नहीं है। परंतु, अमेरिका को भारत से निर्यात की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। जिसके चलते व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में हो गया है। इसके ठीक विपरीत चीन से विदेशी व्यापार का मतलब चीन से वस्तुओं का आयात करना है, चीन भारत से निर्यात को प्रोत्साहित नहीं करता है, जिसके कारण चीन के साथ भारत का विदेशी व्यापार संतुलन हमेशा ऋणात्मक रहता है। इसलिए अमेरिका का महत्व भारत के लिए बढ़ जाता है। जो भी सीमांत तकनीकी आज भारत में इस्तेमाल हो रही है, यथा सूचना तकनीकी के क्षेत्र में एवं बायो तकनीकी के क्षेत्र में, इसे विकसित अवस्था में पहुँचाने में अमेरिका का भी विशेष योगदान रहा है। सूचना तकनीकी क्षेत्र में भारत से 70 प्रतिशत तक का निर्यात अकेले अमेरिका को हो रहा है। अभी हाल ही के समय में सुरक्षा के क्षेत्र में भारत ने अमेरिका से अपने आयात को बढ़ाया है जबकि कुछ ही समय पहिले तक यह बिलकुल नहीं होता था अथवा बहुत ही कम मात्रा में होता था। कुछ समय पहिले ही भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खोली है एवं अब दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ा है। विदेशी व्यापार में तो अमेरिका अब हमारा मुख्य साझीदार बन गया है। परंतु, भारत में, अमेरिकी कम्पनियों का विदेशी निवेश, विशेष रूप से विनिर्माण के क्षेत्र में बहुत ही कम है। यह उम्मीद के मुताबिक़ नहीं बढ़ सका है। सेवा के क्षेत्र में ज़रूर कुछ-कुछ विदेशी निवेश भारत में होना प्रारम्भ हुआ है। जैसे कि गूगल, एमेजान, फ़ेसबुक आदि कम्पनियों ने हाल ही में भारतीय कम्पनियों में निवेश किया है क्योंकि सेवा के क्षेत्र में भारत उनके लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार है। सामरिक दृष्टि से भी दोनों देश आज एक दूसरे के क़रीब आ रहे हैं क्योंकि इंडो पेसिफ़िक क्षेत्र में चीन का दख़ल बढ़ता जा रहा है। अतः चीन आज दोनों देशों के लिए एक साझी चुनौती बन गया है। उक्त परिस्थितियों के चलते आज यह एक अच्छा मौक़ा बन पड़ा है कि दोनों देश अपने सम्बन्धों में प्रगाढ़ता लाएँ।

वैसे देखा जाय तो भारत और अमेरिका आपस में स्वाभाविक मित्र भी हैं। दोनों देशों में बहुत लम्बे समय से जनतंत्र स्थापित है, दोनों ही देश विश्व के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक हैं, दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ ज्ञान आधारित हैं, दोनों देशों की भौगोलिक एवं राजनीतिक रणनीतियाँ लगभग एक जैसी हैं। जिसके कारण दोनों देशों के बीच साझेदारी बहुत सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रही है। इस साझेदारी को मज़बूती प्रदान करने के लिए दोनों ही देश प्रयासरत हैं। जैसी कि सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि शीघ्र ही भारत और अमेरिका के बीच एक विस्तृत व्यापार संधि सम्पन्न होने जा रही है। इस व्यापार संधि के सम्पन्न होने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक सम्बंध और अधिक मज़बूत होंगे।

अभी हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने सुरक्षा प्राधिकृत अधिनियम पारित किया है इसमें चीन द्वारा हाल ही में भारत के विरूद्ध की जा रही गतिविधियों की आलोचना की गई है एवं भारत के साथ खड़े होने का संकल्प दोहराया गया है। यह पहली बार है कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय हितों की ओर खुलकर ध्यान दिया है। दोनों देश अब समझ रहे हैं कि इंडो पेसिफ़िक क्षेत्र में जिस तरह से चीन की दख़ल बढ़ती जा रही है इससे भारत एवं अमेरिका के साझा हितों पर आँच आती दिख रही है। चीन आज दूसरे देशों को न केवल डरा रहा है बल्कि सैन्य कार्यवाही करने में भी नहीं हिचक रहा है। जैसे हाल ही में चीन ने लद्दाख़ के क्षेत्र में भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया था तथा दक्षिणी चीन समुद्री क्षेत्र में वियतनाम, फ़िलिपींस, मलेशिया एवं पूर्वी चीन समुद्री क्षेत्र में जापान, ताईवान आदि देशों के विरूद्ध भी कार्यवाही करने का प्रयास किया है। इससे विश्व के सभी देशों में स्वाभाविक रूप से चिंता जागी है कि चीन अपने कई पड़ोसी देशों पर अपना दबदबा बनाने का प्रयास लगातार कर रहा है। जबकि विश्व के अन्य सभी देश चाह रहे हैं कि इस क्षेत्र सहित पूरे विश्व में क़ानूनी राज की स्थापना हो और सभी समस्याओं को बातचीत के माध्यम से हल किया जाय न कि बल प्रयोग किया जाय। अतः चीन के संतुलन को क़ायम रखने के लिए अमेरिका अपनी ताक़त का इस्तेमाल अन्य देशों यथा, भारत, जापान, दक्षिणी कोरीया, आस्ट्रेलिया आदि मज़बूत देशों को साथ लेकर कर सकता है। इसलिए भी भारत और अमेरिका का एक दूसरे को सहयोग करना आज की एक आवश्यता बनता जा रहा है।

पूर्व में दोनों देशों, भारत और अमेरिका, के बीच आर्थिक क्षेत्र में कुछ समस्याएँ आती रहीं हैं क्योंकि ट्रम्प प्रशासन संरक्षणवाद की नीतियों पर चल रहा है तथा हाल ही में अमेरिका ने नए एच1बी वीज़ा को दिसम्बर 2020 तक जारी करना बंद कर दिया है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव भारतीयों पर ही पड़ा है। इस तरह के निर्णय दोनों देशों के बीच व्यापार के सामान्य प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिका की भी भारत से कुछ उम्मीदें हैं। जैसे, अमेरिका भारतीय बाज़ार में अपनी पहुँच को बढ़ाना चाहता है एवं इस सम्बंध में भारतीय क़ानूनों में कुछ ढील दिए जाने की उम्मीद करता है। साथ ही, बौद्धिक सम्पदा अधिकार सम्बंधी क़ानूनी प्रावधानों में भी कुछ छूट की आशा रखता है। भारत का इस मामले में साफ़ कहना है कि दोनों देशों के क़ानूनों में कुछ फ़र्क़ इसलिए भी स्पष्ट रूप से द्रष्टिगोचर होता है क्योंकि अमेरिका एक विकसित देश है एवं भारत एक विकासशील देश है, अतः भारत की प्राथमिकताएँ अलग हैं। हाँ, भारत को अपनी नीतियों में स्थिरता ज़रूर रखनी होगी क्योंकि जो भी निवेशक बड़े स्तर पर विदेशी निवेश भारत में करेगा, वह चाहेगा कि उसे पता होने चाहिए कि अगले लगभग 10 वर्षों तक उसे किस प्रकार का और कितना टैक्स भरना है एवं समस्त ख़र्चों के बाद उसे कितनी आय उस निवेश से होने वाली है। यदि जल्दी जल्दी इस सम्बंध में नियमों को परिवर्तित किया जाता रहेगा तो विदेशी निवेशकों के लिए यह एक अस्थिर स्थिति निर्मित हो जाएगी। कुल मिलाकर दोनों देशों के बीच आपस में चर्चा चलते रहना चाहिए ताकि अमेरिकी निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़े।

अमेरिका और भारत के बीच विदेशी व्यापार लगातार बढ़ता जा रहा है। आज यह 16005 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष (निर्यात 8875 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं आयात 7133 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं व्यापार संतुलन 1742 करोड़ अमेरिकी डॉलर भारत के पक्ष में) तक पहुँच गया है। इसके और आगे बढ़ने की उम्मीद की जा रही है। माहौल में काफ़ी सुधार आ रहा है एवं दोनों देशों का एक दूसरे पर विश्वास भी बढ़ता जा रहा है। साथ ही, दोनों देशों की सरकारें भी प्रयास कर रही हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार एवं निवेश बढ़े। हाँ, अब समय आ गया है कि भारत को यह प्रयास करने चाहिए कि ग्लोबल वैल्यू चैन में भारत अपना स्थान बनाए। दवाईयों को निर्मित करने के लिए कच्चा माल (API), ऑटो के कलपुर्ज़ों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, फ़र्टिलायज़र, आदि के लिए केवल एक ही देश अर्थात चीन पर अधिक निर्भर नहीं रहना चाहिए। भारत को अब अपनी सप्लाई चैन को मज़बूत करना ही होगा। अमेरिकी निवेशक आज भारत की भूरी भूरी प्रशंसा करते हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ा वैक्सीन एवं दवा उत्पादक देश है एवं आज, कोरोना महामारी के दौर में भी, पूरे विश्व को वैक्सीन एवं दवाईयाँ उपलब्ध करवा रहा है।

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