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भारतीय संस्कृति

गंगा , गंगापुत्र भीष्म , मच्छोदरी के बारे में व्याप्त भ्रान्ति

विद्वत जनों!
समाज में बहुत सारी भ्रांतियां फैली हुई हैं। हम इन भ्रांतियों को निवारण करते – करते अपना जीवन समाप्त कर लेंगे परंतु भ्रांतियां समाप्त नहीं होंगी। ऐसी भ्रांतियां समाज में बहुत गहरी जड़ जमा चुकी हैं ।हमारे द्वारा जो लिखा जा रहा है, कितने लोग इसको पढ़ते होंगे, और फिर कितने लोग उस पर अमल करते होंगे ,? – यह अतिन्यून मात्रा अथवा प्रतिशत होगा। इतना बड़ा स्वरूप भ्रांतियों का है। हमारे मन में आज विचार आया है एक अन्य भ्रांति भी बहुत ही विशिष्ट स्थान रखती है ,अर्थात सर्वोपरि भ्रांति है । उसको भी सबुद्ध पाठकों के और विचारकों के समक्ष रखा जाए।
महर्षि दयानंद ,महर्षिश्रृंग ,महर्षि लोमश , महर्षि वेद व्यास, योगीराज श्री कृष्ण जी महाराज, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, आदि अनेक महापुरुष इस पृथ्वी पर आए , जिन्होंने धर्म का और सत्य का आचरण किया। धर्म और सत्य की पताका को विश्व में फहराया। लेकिन सत्य को छोड़कर असत्य के ग्रहण करने के लिए उसका प्रचार – प्रसार करने के लिए जो विपरीत शक्तियां जोर लगाती हैं ,उनका प्रचार-प्रसार बहुत तेजी से होता है। सत्य को धारण करना ,सत्य को स्वीकार करना, सत्य को अपने हृदय में मान लेना , सत्य को स्थापित करना ,बहुत कम मात्रा अथवा प्रतिशत में आता है। लेकिन जब सत्य पर आ जाता है तो फिर उनसे कोई पथ विमुख कर नहीं पाता ।
आज की भ्रांति है कि भीष्म पितामह की माता गंगा नदी थी क्या ? गंगा नदी ने देवकन्या का स्वरूप धारण करके शांतनु के साथ शादी की थी ?

देवव्रत इसी गंगा का पुत्र था ? वेदव्यास जी किसके पुत्र थे ? मस्त्योदरी या मच्छोदरी कौन थी ? क्या वेदव्यास जी इसी के उदर से पैदा हुए थे ? पारा मुनि कौन थे ? क्या पारा मुनि ने कागा को गुप्त इंद्रिय का मंथन करके ब्रह्मचर्य को किसी यंत्र में स्थापित करके पत्नी को देने के लिए कहा था ? इन भ्रांतियों पर ब्रह्म ऋषि कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी जिनमें श्रृंग ऋषि की आत्मा थी, उनका अपने शिष्य महानंद मुनि से क्या कहना है ? जरा सुनो।
“सत्य को स्वीकार करो।
पूज्य महानंद जी ! अच्छा भगवन।
तो गुरू जी! हमें आपने कल द्वापर के समय का कुछ आदेश दिया और महाराजा गंगशील ब्रह्मचारी (देवव्रत भीष्म पितामह )के विषय में कहा था , परंतु आज हम अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा जब लाक्षागृह पर विचरण कर रहे थे ,तब हमने सुना था कि गंगशील भीष्म की माता वह गंगा नदी थी जो आज भी पर्वतों से निकल कर मृत्युलोक पृथ्वी पर बह रही है और इसी गंगा नदी का महाराजा शांतनु के साथ विवाह संस्कार हुआ था ।इसने देवकन्या स्वरूप धारण किया था। संस्कार के समय महाराजा शांतनु से यह वचन हुआ था कि जो भी मेरा पुत्र होगा , उसका आहार मैं स्वयं कर जाया करूंगी।
(थोड़ा सा स्पष्ट करने के लिए अपने शब्दों को जोड़ना चाहूंगा ।यह महानंद मुनि अपने गुरु श्रृंग ऋषि से जानना चाह रहे हैं कि पृथ्वी पर इस प्रकार से कहा जा रहा है और यह भ्रांति फैलाई जा रही है , इसकी वास्तविकता क्या है ?- जो हमने आज लाक्ष्याग्रह पर अपने सूक्ष्म शरीर से सुना है। सूक्ष्म शरीर के विषय में तो आप जानते ही हैं कि वह मुक्त आत्मा इस संसार में सब कुछ देखती व सुनती रहती है कि पृथ्वी पर क्या हो रहा है ? )
दूसरा प्रश्न यह है कि एक समय महाराजा इंद्र ने गणों और आठ गंधर्व को शाप दे दिया था ।वही 8 गंधर्व थे कि जो माता गंगा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। परंतु आपने(यानी कि श्रृंग ऋषि ने )तो इस सबकी रूपरेखा ही बदल दी,। आप की रूपरेखा समझ में नहीं आ रही है ,क्योंकि आधुनिक महाभारत में भी हमारे कथन अनुसार ही अंकित हैं । अब हम यह जानना चाहते हैं कि हम आपके वचनों को स्वीकार करें या आधुनिक काल के महाभारत की वार्ताओं को स्वीकार करें।
(अभी कुछ समय पूर्व में महाभारत का प्रसारण हुआ तो उसमें इस घटना का उल्लेख इस प्रकार से किया गया है कि शांतनु की शादी गंगा नदी के साथ हुई थी और भीष्म गंगा का पुत्र था। )

हूं, महानंद जी ! इसमें तो कोई उलझन की वार्ता नहीं है , क्योंकि जो तुम्हें सत्य प्रतीत होता हो ,उसी को स्वीकार कर लो। हमारी तो इसमें कोई हानि नहीं ।परंतु बेटा !तुम्हारे उच्चारण के अनुसार हम एक वार्ता जानना चाहते हैं कि तुमने एक बार कहा था कि ब्रह्मा जी की कृपा से यह गंगा पहले ब्रह्मलोक में बहती थी। उस समय गंधर्व को शाप दे दिया गया था ।तब इन गंधर्व ने ब्रह्मा की पुत्री गंगा से याचना की थी कि हे माता ! आप मृत्युलोक में चलें। क्योंकि वहां हम तेरे गर्भ से जन्म धारण करें । तुम स्वयं आहार करके हमारा उद्धार करते रहना। ऐसा ही तो तुम्हारा कथन था।

पूज्य महानंद जी , हां! हां!
अच्छा बेटा! इसका संक्षिप्त में उत्तर यह है कि परमात्मा की कृपा से पर्वतों से गंगा झरने के रूप में निकलकर अन्य नदी नदों आदि से मिलकर वैश्य तथा कृषकों की खेती को जीवनदान करती हुई कीट पतंगों, पशु पक्षियों एवं मानव आदि को अपने अमृत रूपी जल से संतुष्ट करती हुई जीवन दान देती हुई बहती है । आस्तिक इस अनुपम रचना के द्वारा परमात्मा के चिंतन की ओर लग जाता है। परमात्मा में रमने लगता है।
मानव का एक सिद्धांत होना चाहिए कि सत्य को सत्य मानने में या उसके उच्चारण करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह गंगा तो जल की बह रही है। यह तो सर्वथा जड़ है। चेतना शून्य है ।ज्ञान शून्य है। जल कहीं कन्या रूप में आता है ,क्या यह हो सकता है ? बेटा! यह तो हो सकता है कि कोई कन्या गंगा नदी में किसी स्थान पर गिरकर बह गई हो उसको किसी ने निकाल कर गंगा नाम रख दिया हो। बेटा ! परंतु जल वाली गंगा नदी देवकन्या बन गई हो, हम तुम्हारे ऐसे वाक्यों को कभी भी मानने को तैयार नहीं , क्योंकि यह परमात्मा की बनाई हुई प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध है। यह भी हो सकता है कि गंगा नामक देवकन्या कभी गंगा में गिर गई हो ।उसकी राजा शांतनु ने रक्षा कर दी हो ,परंतु तुम्हारी कल्पना को हम कभी नहीं मानेंगे, क्योंकि यह प्राकृतिक नियम के विरुद्ध है।
बेटा ! तुमने जो यह कहा कि यह ब्रह्मा की पुत्री है , यह वाक्य तो सत्य है क्योंकि जो जहां से उत्पन्न होती है , वह उसी की पुत्री होती है। परंतु आज के मानव ने इस वार्ता को अच्छी प्रकार से विचारा नहीं ,उन्हें अच्छी प्रकार से समझा ही नहीं है। मानव अपने अज्ञान के कारण कुछ का कुछ मान बैठा है।
जीवात्मा ही गंगा है।
इसका अभिप्राय यह है कि हमारे शरीर में 9 द्वार हैं। वही गंधर्व हैं। मुनिवरों ! मूलाधार चक्र से लेकर ब्रह्मरंध्र तक इडा ,पिंगला , सुषुम्ना नाड़ी (गंगा , यमुना, सरस्वती) यह 3 नदियां बह रही हैं , जिनको तुम आकाशगंगा, मृत्यु लोक की गंगा, और पाताल लोक की गंगा कहते हो ।तीनों गंगा हैं, हमारे स्वर्गीय शरीर में हैं। गंगा ही नौ द्वारों में रमण कर रही है ।इनको स्वच्छ करती रहती है। ऐसी कौन सी गंगा है जो ब्रह्मा की पुत्री है ?

मुनिवरों!

देखो गंगा नाम आत्मा का है। जो इन 9 द्वारों वाले शरीर को पवित्र कर रहा है। यदि यह महान आत्मा इस नौ द्वार वाले शरीर में न होता तो इन नौ द्वारों का कुछ भी नहीं बन सकता था। इसी के द्वारा शरीर पवित्र होता है, जैसे अलौकिक गंगा में स्नान करके स्वच्छ हो जाते हैं। अपने शरीरों को पवित्र कर लेते हैं उसी प्रकार से ब्रह्मा की पुत्री रूपी गंगा के द्वारा यह 9 द्वारों का शरीर पवित्र होता रहता है। परमात्मा का तथा आत्मा का संबंध पिता पुत्र का है ।बेटा ! यह ध्यान देने वाला विषय है कि जब आत्मा इस शरीर को त्याग कर चल देता है तब इस निष्प्राण शरीर को मानव अपवित्र मानते हैं। इसमें आत्मा के निवास तक ही इसको पवित्र माना जाता है। अतः पवित्र करने वाली गंगा आत्मा ही है।
गंगा का अलंकारिक स्वरूप।
बेटा ! गंगा का एक आध्यात्मिक योगाभ्यासियों का अलंकारिक वर्णन भी है। जिसको मानव ने समझा नहीं। इस मानव शरीर में तीन नाड़ियों इडा, पिंगला, सुषुम्ना या गंगा ,यमुना, सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हैं। जब मानव योगाभ्यासी बनकर मूलाधार में ध्यान करके रमण करता है तब उसको मृत्यु लोक की गंगा का ज्ञान होता है। इसके पश्चात जब आत्मा नाभि चक्र में और हृदय चक्र में ध्यान अवस्था में पहुंचता है , तब उसे आकाशगंगा का ज्ञान होता है ।जब योगाभ्यासी आत्मा समाधि अवस्था में आज्ञाचक्र में ध्यान लगाता है तब वह त्रिवेणी में पहुंच जाता है या त्रिवेणी का साक्षात्कार करता है। इससे आगे चलकर आत्मा जब ब्रह्मरंध्र में पहुंच जाता है तब उसी योगी आत्मा को ब्रह्मलोक की गंगा का ज्ञान होता है। परंतु मानव ने इस रूपरेखा को ठीक प्रकार से जाना तो है नहीं ।इसलिए मानव स्थूल अर्थों की कल्पना द्वारा स्थापित करके भटक रहा है ।भौतिक नदी गंगा को ही आज का मानव मुक्ति का साधन अपनी अज्ञानता से समझ बैठा है।
इस गंगा से तो केवल भौतिक शरीर ही स्वच्छ किया जा सकता है या प्यासे को उसके स्वच्छ जल से संतुष्ट किया जा सकता है। अब रही बात कि राजा शांतनु के समक्ष यह भौतिक नदी गंगा देवकन्या का शरीर धारण करके प्रस्तुत हो गई। तो बेटा !यह वार्ता तो अज्ञानियों के समाज में कहना । वहां तुम्हारी वार्ता स्वीकार कर लेंगे। इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं, परंतु यहां तो तुम्हारी यह वार्ता चलेगी नहीं। हास्य——।
पूज्य महाराज जी , धन्य हो भगवन।
गंगा माता।

मुनिवरो!

वहमने तो द्वापर काल में यह देखा था कि राजा गंगेश्वर की गंगा नाम की पुत्री थी। इस गंगा से महाराज शांतनु का विवाह संस्कार हुआ था। इसके सात पुत्र उत्पन्न होकर समाप्त हो गए थे। इसके पश्चात इनके गंगशील नाम का आठवां पुत्र उत्पन्न हुआ ।यह दीर्घायु हुआ। इसको समय-समय पर ब्रह्मचारी पर्जन्य , कौडली ब्रह्मचारी, देवव्रत और भीष्म पितामह तथा गंगाय आदि नाम प्रसिद्ध हुए।
पूज्य महानंद , गुरुजी ! इस विषय में तो हमारे बहुत से प्रश्न समाधान के लिए शेष हैं।
हां तो बेटा ! समय मिलेगा तो उनको उत्तर देते रहेंगे।
पूज्य महानंद जी गुरुजी ! जब इसके पश्चात यह गंगा समाप्त हो गई तो इन महाराजा शांतनु का संस्कार मत्स्योदरी के साथ हुआ।
हां ! हां!!
पूज्य महानंद जी, अच्छा तो गुरुजी ! यह मत्स्योदरी किसकी पुत्री थी । हास्य—–।
बेटा !किसकी उच्चारण करें महानंद जी !महर्षि व्यास जी ने तो इसके विषय में लिखा है कि वह नौका चलाने वाले मल्लाह की कन्या थी।
उजमा आनंद जी, अच्छा भगवान ! तो यह कन्या उस मल्लाह के यहां कहां से आई ?
बेटा! इस कन्या ने उस मल्लाह के गृह में जन्म लिया था। पूज्य महानंद जी , अच्छा तो गुरु जी !इस विषय में तो हमने बहुत ही अनोखी वार्ता सुनी है।
वह क्या ?
पूज्य महानंद जी, हमने यह सुना है कि महर्षि पारा कि यह पुत्री थी।
हूं ।
पूज्य महानंद जी, महर्षि पारा का ब्रह्मचर्य मछली के गर्भ में चला गया था और उस मछली से ही इस मत्स्योदरी का जन्म हुआ। हास्य—–।
समझते हुए भी महानंद जी के प्रश्न करने का कारण।
महानंद जी, गुरुजी ! क्या करें,? यह हमारे और तुम्हारे वाक्य मृत मंडल में जा रहे हैं ।और हमारे व्याख्यानों को सभी पा रहे हैं ।इसमें कोई भ्रांति नहीं। भगवान ! आपसे प्रश्न करना हमारा कर्तव्य है । यदि आपसे ही प्रश्न नहीं करेंगे तो किस के समक्ष प्रश्न करेंगे ?
हूं।
तो क्या सुना बेटा ?
महर्षि व्यास की उत्पत्ति का पौराणिक आख्यान।
पूज्य महानंद जी गुरु जी ! इसके विषय में ऐसा सुना है कि जब महर्षि पारा मुनि को विवेक हुआ।
हूं ।
पूज्य महानंद जी, और अपनी धर्मपत्नी उच्चांगना से कहा कि हे धर्म देवी मुझे आज्ञा दो। मैं इस समय मार्ग में तपस्या करने के लिए जा रहा हूं। उस समय महाराजा शांतनु भी वहीं विराजमान थे। धर्म देवी ने एक वाक्य कहा कि भगवान ! आप तो जा रहे हैं , परंतु यदि मुझे पुत्र की इच्छा हुई तो मुझे पुत्र को तो अवश्य उत्पन्न करना है।
मुनि वरों ! तो उस समय महर्षि पारा मुनि ने यह कहा कि तुम कागा को मेरे समक्ष नियुक्त कर देना। मैं उसको अपनी मन्मनता धारण करूंगा। ऐसा कहकर पारा मुनि प्रस्थान कर गए। वन में जाकर अखंड तपस्या करने लगे। उसके पश्चात उनकी धर्मपत्नी में पुत्र की इच्छा से कामासक्ति उत्पन्न हुई । तब उन्होंने उस समय कागा को अपने संदेश के साथ महर्षि पारा के पास भेजा। उस समय पारा मुनि ने अपने गुप्त इंद्रिय को मंथन करके अपने ब्रह्मचर्य को किसी यंत्र में स्थापित करके कागा को दे दिया। कागा वहां से लेकर जब गंगा के स्थान पर पहुंचे वहां बहुत से व्यक्ति अपने – अपने वाक्य उच्चारण कर रहे थे। वहां कागा को उनके वाक्यों को सुनने की इच्छा हुई। ऐसी परिस्थिति में कुछ ऐसा असवधानी के कारण हुई कि वे यंत्र गंगा में गिर कर मछली के मुखारविंद में चला गया, तो देखो महर्षि पारा का महान ब्रह्मचर्य था वह व्यर्थ नहीं जाता। तब उस मछली के गर्भाधान हो गया ।उस मछली को किसी मछली पकड़ने वाले ने पकड़ लिया। उस मछलीमार ने उस मछली को पकड़कर उसके दो भाग कर दिए तब उसने उसको निकाल लिया।
दूसरी ओर कागा महर्षि की धर्म पत्नी के पास पहुंचे तब पत्नी ने कहा कि कहो भाई कागा ! तो उन्होंने कहा कि मुझको तो समर्पण कर दिया था परंतु मध्य में ही समाप्त हो गया।
तब ऋषि पत्नी ने शाप दे दिया।
उधर उस मछली ने वह कन्या को किसी मल्लाह महाराज को समर्पण कर दी। मल्लाह लोग उसको मत्स्योदरी कहने लगे ।इसके पश्चात वह कन्या चंद्रमा के तुल्य बढ़ने लगी। शीघ्र ही पूर्ण चंद्रमा के तुल्य पूर्ण यौवन और पूर्ण सौंदर्य को प्राप्त हो गई। भगवन ! कुछ काल पश्चात महर्षि पारा मुनि गंगा को पार करने के लिए वहां पहुंचे। जहां वह मत्स्योदरी सुशोभित हो रही थी ।महर्षि तुरंत ही गंगा नदी पार करना चाहते थे ,परंतु उस समय मत्स्योदरी के पालक पिता भोजन पर नियुक्त थे। कहीं ऋषि क्रोधित न हो जाएं इस कारण उसने मत्स्योदरी से कहा कि तुम नौका द्वारा ऋषि को गंगा पार करा आओ।
गुरुजी !ऐसा सुना है कि उस समय वह मल्लाह की कन्या ऋषि के समक्ष पहुंची। उस समय कन्या को पा करके ऋषि का मन वासनामय हो गया। उसका ह्रदय चंचल गति को प्राप्त हो गया। उस मत्स्योदरी से ऋषि ने अपनी इच्छा प्रकट की ।तब मत्स्योदरी ने उत्तर दिया कि महाराज यह तो बड़ा पाप है। सूर्य उदय हुआ है। सूर्य का प्रकाश संसार में फैला हुआ है और वरुण हमारे समक्ष है । हम क्या करें ?
गुरुदेव ऐसा सुना जाता है कि उस समय महर्षि पारा ने गंगा से जल लेकर ऊपर को उछाल दिया। मानो इंद्र बरसने लगा और वहां उन्होंने अपनी कामासक्ति को पूर्ण किया । भगवन ! हमने तो ऊपर कहे अनुसार ही सुना है। आपने तो इसकी रूपरेखा को भिन्न कर दिया तो वास्तव में हम क्या मानें ?
गुरुदेव! हमने सुना है कि उससे मत्स्योदरी के गर्भ की स्थापना हो गई। उस कुमारी कन्या मत्स्योदरी के गर्भ से महर्षि व्यास उत्पन्न हुए। तो गुरु जी !इस वार्ता में कहां तक यथार्थता है ? कहां तक सत्य है ? हास्य—-।
बेटा ! जो तुम उच्चारण कर रहे हो उस सबको हम मान लेते । यदि हम स्वयं द्वापर काल को नहीं देखते। तब हम तुम्हारे सभी वाक्य मान लेते । परंतु आज कैसे करें ? असत्य और निराधार वार्ता पर विश्वास नहीं होता। प्रकृति नियम के विरुद्ध वार्ता को स्वीकार नहीं करते। इसकी तो रूपरेखा इस प्रकार है।

महर्षि व्यास के जन्म का सत्य इतिहास

बेटा! महर्षि पारा के अपनी धर्म पत्नी से 2 पुत्र थे। महर्षि व्यास और दुंदु ऋषि (धुंध ऋषि)। तो बेटा ! जैसा यह वार्ता तुमने सुनाई है यह सब किसी धूर्त (वाममार्गी) मानव की बनाई हुई वार्ता है।
तुम जानते हो कि मछली का गर्भाशय कैसा होता है ? माता का जैसा गर्भाशय होगा वैसी ही उसकी संतान होगी। अर्थात मानव स्त्री के गर्भाशय से मानव और मछली के गर्भाशय से मछली। ऐसा परमात्मा का प्राकृतिक नियम है। इसमें कहीं भी अपवाद तक नहीं मिलता ।यह तो बेटा ! तुम जानते ही हो।
पूज्य महानंद जी हां ! गुरुजी! इसमें यह है कि योगी जन् अपने योग की शक्ति से परमात्मा के नियम विरुद्ध भी कर सकते हैं। इसलिए संभव है कि ऊपर की घटना भी उसी रूप में घटी हो।
अच्छा बेटा ! हमने एक वाक्य निर्णय कराया था कि जो जिसके निकट पहुंच जाता है , वह उसके विरुद्ध कोई कार्य नहीं करता। जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति किसी राजा के राष्ट्र में पहुंच जाए और वह वहां भाग्यवश राज्य का मंत्री बन जाए तो वह राजा के विरुद्ध कार्य नहीं करेगा ।इसी प्रकार जो व्यक्ति परमात्मा के निकट पहुंच जाता है परमात्मा के ज्ञान को जानने वाला बन जाता है, वह परमात्मा के नियम के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करेगा। बेटा! यह भी जान लो कि पारा मुनि एक ऐसे व्यक्ति नहीं थे कि वह परमात्मा के नियम के विरुद्ध कोई कार्य करते । यह तो हो सकता है कि मानव के हृदय की गति चंचल हो जाए ,परंतु ऐसे महान ऋषि तुरंत ही उस पर अपना नियंत्रण कर लेते हैं। मछली के गर्भ से मानव कन्या जन्म होना तो स्वत: ही नियम के विरुद्ध है। इसको तो कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी स्वीकार नहीं करेगा ,क्योंकि परमात्मा के बनाए नियम तो अटल हैं ।सत्य हैं। तीनों कालों में एक से हैं। परमात्मा की चलाई परंपरा को कोई भी तोड़ नहीं सकता ।चाहे महर्षि हो, चाहे योगी हो, और चाहे मुनि हो।
बेटा ! तुम्हें हमने प्रमाण दिया था कि जैसे मानव को शीत लगने लगे और वह अग्नि के साथ चला जाए तो ज्यों – ज्यों उसमें अग्नि के परमाणु प्रवेश करते जाएंगे तब त्यों – त्यों उसका शीत दूर हो जाएगा ।ऐसे ही जो मानव उस परमात्मा के गुणों को जान लेता है और ज्यों – ज्यों शनै: -शनै: परमात्मा के गुण उसमें प्रविष्ट होते जाते हैं त्यों – त्यों परमात्मा के नियमों में गिरकर कर्तव्य करने लगता है।
बेटा ! योगियों का तो ऐसा सुंदर सिद्धांत है । आज हमको उसे मान लेना चाहिए ।इससे हमारा भी जीवन बनेगा ,और उसी में हमारा महत्व है।
बेटा! महर्षि पारा मुनि के 2 पुत्र थे जो उनकी धर्मपत्नी के गर्भ से ही उत्पन्न हुए थे ।एक महर्षि व्यास मुनि महाराज और दूसरे धुंध ऋषि महाराज।
मुनिवरो! मत्स्योदरी के दो बालक थे। जो कि मत्स्योदरी के साथ शांतनु का विवाह संस्कार होने के पश्चात उत्पन्न हुए थे।
मुनिवरों ! यह है तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर। बेटा ! हमने ऐसा देखा और सुना था। यदि कोई ऋषियों पर इस प्रकार का लांछन आरोपित करता है तो यह उसकी बुद्धिमत्ता नहीं।
इस पर तुम कहोगे कि ऐसे वाक्य तो महर्षि व्यास ने स्वयं कहे हैं।वास्तव में महर्षि व्यास ने तो यह कहा है कि वह गंगेश्वरी राजा की पुत्री गंगा थी ।उसकी मृत्यु के पश्चात महाराज शांतनु ने मल्लाह की अत्यंत सुंदरी कन्या मत्स्योदरी से विवाह संस्कार किया। बेटा ! हमने तो ऐसा देखा और सुना है। अब रही वार्ता आधुनिक समय की यह तो तुम मूर्ख वाली वार्ता हमारे सामने नियुक्त करने लगे हो ।अब बताओ तो हम तुम्हारी ऐसी वार्ताओं का कहां तक निर्णय करते रहेंगे।
पूज्य महानंद जी , धन्य हो भगवन!
मुनिवरों,! आज हम अपने आख्यान में महानंद जी के प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे। मानव को ऐसा विचारवान होना चाहिए कि उसको सच मानने में कोई किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।जो सत्य वाक्य हो उसको स्वीकार करने में न तुम्हारी हानि है और न हमारी हानि है।”

श्रृंग ऋषि की आत्मा ब्रह्म ऋषि कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी के शरीर में आई हुई का यह व्याख्यान इस प्रकार यहीं पर समाप्त हुआ ।लेकिन बहुत सारी भ्रांतियों को दूर कर गया ।अब यह आप जैसे विचारवानों का कर्तव्य है कि इन सब भ्रांतियों को, मूर्खता पूर्ण वार्ताओं को, गलत परंपराओं को, अज्ञान को, दूर करने का आप अपने स्तर से भरसक प्रयास करें ।जैसे यज्ञ करने से उत्पन्न हुआ धुआं वातावरण को शुद्ध कर देता है ऐसे ही आपके विचारों से उत्पन्न हुई वार्ता मूर्खतापूर्ण वातावरण को ,अज्ञान को, रूढ़िवादिता को समाप्त करेगी , ऐसा मेरा विचार है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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