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भारत सरकार का बैंकों की दिशा एवं दशा सुधारने हेतु प्रयास जारी

प्रह्लाद सबनानी

कुल मिलाकर प्रयास यह हो रहा है कि किस प्रकार बैंकों में जमाकर्ताओं के हित सुरक्षित रहें। बोर्ड के सदस्यों की बैंक के जमाकर्ताओं के प्रति भी कुछ जवाबदारी बनती है। हालाँकि अभी के नियमों के अंतर्गत, बैंक का प्रबंधन बैंक के बोर्ड के प्रति जवाबदेह होता है।
आपको शायद याद होगा, अभी हाल ही के समय में एक निजी क्षेत्र के बैंक को कोरपोरेट अभिशासन सम्बंधी कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। निजी क्षेत्र के इस बैंक में पिछले कई सालों से प्रमोटर स्वयं ही मुख्य कार्यपालक अधिकारी के तौर पर कार्य कर रहे थे। शायद इसी वजह से कई प्रकार की समस्याएँ जो बैंक में आंतरिक रूप से महसूस की जा रही थीं, परंतु बाहर नहीं आ पाईं।
निजी क्षेत्र की बैंकों में प्रायः यह देखा गया है कि जब प्रमोटर ख़ुद ही उस बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्य करता है तब वह स्वयं ही सभी उच्च अधिकारियों की नियुक्ति भी करता है। इस प्रकार, प्रमोटर का बैंक में बहुत ज़्यादा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। कई बार यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि इस प्रकार के निजी बैंकों में एक ओर तो कुछ चुनी हुई कम्पनियों को ही भारी मात्रा में ऋण प्रदान कर दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ उच्च मूल्य की जमाराशियाँ तुलनात्मक रूप से ब्याज की अधिक दर प्रदान कर कुछ विशेष कम्पनियों से प्राप्त की जाती हैं। इस प्रकार के बैंकों द्वारा न तो सविंग्स एवं चालू खातों में कम ब्याज की दर पर जमाराशियाँ प्राप्त किए जाने का प्रयास किया जाता है और ना ही खुदरा मूल्य के ऋण प्रदान किए जाने का प्रयास होता है। इस प्रकार इन बैंकों में सम्पत्तियाँ एवं देयताएँ दोनों तरफ़ ही जोखिम बढ़ जाता है। उक्त के साथ ही, प्रमोटर के समूह की कुछ कम्पनियों को वित्तीय कम्पनियाँ बनाकर सम्बंधित व्यवसाय भी किया जाता है। जिससे अंततः समूह की इन कम्पनियों के हितों के बीच टकराव उत्पन्न होने लगता है। इस तरह की स्थितियाँ सामान्यतः तभी पनपती हैं जब प्रमोटर ख़ुद कई साल तक मुख्य कार्यपालक अधिकारी बना रहता है। इस प्रकार के बैंकों में ग़ैर निष्पादनकारी आस्तियों की एवर ग्रीनिंग भी की जाती है। अतः अब समय आ गया है कि निजी क्षेत्र की इस प्रकार की बैंकों में उक्त वर्णित एवं इसी प्रकार की अन्य ग़लत प्रथाओं को तुरंत प्रभाव से रोका जाये।
उक्त वर्णित मुद्दों को ध्यान में रखते हुए हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक ने वाणिज्यिक बैंकों में अभिशासन सम्बंधी मुद्दों पर एक चर्चा पत्र तैयार किया है। इस चर्चा पत्र में कई बातों का ज़िक्र किया गया है। जैसे, बैंकों में अच्छी शासन परम्परा किस प्रकार स्थापित की जाये, बैंकों में पेशेवर प्रबंधन की एक मज़बूत संस्कृति किस प्रकार विकसित की जाये, प्रबंधकों एवं मालिकों के हितों को अलग करने सम्बंधी सिद्धांत को किस प्रकार लागू किया जाये, आदि।
भारतीय रिज़र्व बैंक पूर्व में भी लगातार यह प्रयास करता रहा है कि प्रबंधन और स्वामित्व में थोड़ा अलगाव बनाए रखा जाए। इसलिए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जब निजी क्षेत्र में नए बैंक स्थापित करने के लिए लाइसेन्स जारी किए जा रहे थे तब किसी भी बड़े औद्योगिक घराने को लाइसेन्स प्रदान नहीं किया गया था क्योंकि उसे शायद यह शक था कि कहीं यह उद्योग घराना इस बैंक से अधिकतम ऋण अपने समूह की कम्पनियों को ही प्रदान नहीं कर दे। इसके बाद तो भारतीय रिज़र्व बैंक ने प्रमोटर के लिए बैंकिंग कम्पनी में शेयर की अधिकतम सीमा भी तय करने की बात की थी। उस समय ऐसा कहा गया था कि बैंक की स्थापना के शुरुआती दौर में तो प्रमोटर द्वारा भले ही ज़्यादा शेयर होल्डिंग रखी जा सकती है परंतु एक पूर्व निर्धारित समय सीमा के अंदर प्रमोटर को अपनी शेयर होल्डिंग को निर्धारित सीमा के नीचे लाना अनिवार्य होगा। साथ ही, यह भी तय किया गया था कि किन्हीं परिस्थितियों में यदि प्रमोटर की शेयर होल्डिंग निर्धारित सीमा से अधिक रहती है तो प्रमोटर के वोटिंग अधिकार सीमित रहेंगे। लेकिन जब वर्ष 2008 में वित्तीय संकट का दौर आया था तब उक्त वर्णित नियमों के बावजूद यह कहा जाने लगा कि इस संकट काल में चूँकि बैंक को पूँजी की ज़्यादा ज़रूरत है अतः प्रमोटर द्वारा बैंक में अपनी शेयर होल्डिंग को बढ़ाया जा सकता है। जब बैंकों की वित्तीय स्थिति ख़राब हो रही है तब इन बैंकों को प्रमोटर की सहायता की ज़्यादा ज़रूरत है। परंतु, अब इस सम्बंध में साफ़ सुथरे एवं पारदर्शी नियमों का बनाया जाना आवश्यक हो गया है और इसी दिशा में एक प्रयास भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने उक्त चर्चा पत्र के माध्यम से किया है।
उक्त चर्चा पत्र में यह भी बताया गया है कि किसी भी बैंक का प्रमोटर अथवा प्रमुख शेयरहोल्डर, इसी बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी अथवा पूर्णकालिक निदेशक के पद पर अधिकतम 10 वर्षों तक अथवा 70 साल की उम्र प्राप्त करने तक ही रह सकता है। इस समय अवधि के बाद उसे पेशेवर प्रबंधन के पद को हर हाल में छोड़ना होगा। इसी प्रकार, बैंक के अच्छे अभिशासन की दृष्टि से कोई प्रबंधन पदाधिकारी जो प्रमोटर अथवा प्रमुख शेयरहोल्डर नहीं है वह किसी बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी अथवा पूर्णकालिक निदेशक के पद पर अधिकतम 15 वर्षों तक लगातार रह सकता है। उसके बाद यह व्यक्ति तीन साल तक की अवधि के लिए कूलिंग ऑफ़ अवधि में चला जाएगा अर्थात तीन वर्ष बीत जाने के बाद ही वह फिर से मुख्य कार्यपालक अधिकारी अथवा पूर्णकालिक निदेशक के पद पर नियुक्ति पाने का पात्र हो सकेगा। इस तीन साल की अवधि के दौरान वह व्यक्ति किसी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में बैंक से जुड़ा नहीं रहेगा।
उक्त 10 वर्ष की अवधि का सुझाव शायद इसलिए दिया गया है कि यह अवधि अपने आप में एक लम्बी अवधि है और इस अवधि में यदि कारपोरेट अभिशासन सम्बंधी किसी भी प्रकार की कोई कमी इस बैंक में चल रही है और वह इस समयावधि में बाहर नहीं आ पाई है तो कम से कम इस अवधि के बाद प्रबंधन में बदलाव के साथ उक्त कमियों का पता चल सके। भारत में कई बैंकों में तो आज भी इस प्रकार का प्रावधान है कि कोई भी अधिकारी किसी भी संवेदनशील पद पर तीन वर्षों से अधिक समय तक बना नहीं रह सकता है, ताकि इस कार्यकाल के दौरान यदि किसी भी प्रकार की ग़लतियाँ अथवा कमियाँ हो रही हैं तो उन्हें बाहर लाया जा सके। अब इस प्रकार के नियमों को उच्च प्रबंधन के लिए भी लागू किए जाने का प्रयास भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा किया जा रहा है, जो कि उचित प्रतीत होता है।
किसी भी संस्था को स्थापित किए जाने पर शुरुआती दौर में उस संस्था की मज़बूत नींव रखने के उद्देश्य से प्रमोटर को कुछ समय के लिए मुख्य कार्यपालक अधिकारी बनाये जाने सम्बंधी छूट दी जा सकती है क्योंकि शुरुआती दौर में अक्सर प्रमोटर, संस्था के निर्माण के लिए, अपने पूरे मनोयोग से काम करता है। एक बार संस्था के सफलतापूर्वक खड़े होने के बाद उस संस्था और व्यक्ति के बीच का अंतर कम अथवा समाप्त होने लगता है, यह एक मानव प्रकृति है, जिसके चलते प्रमोटर संस्था के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में बहुत अधिक शक्तिशाली व्यक्ति के तौर पर उभर आता है और उस संस्था के सभी कार्यों में उस व्यक्ति का नियंत्रण हो जाता है। अतः भारतीय रिज़र्व बैंक ने सबसे पहले तो मुख्य कार्यपालक अधिकारी की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष निर्धारित की थी परंतु उसे बाद में बढ़ाकर 70 वर्ष कर दिया गया था, अब इसे और आगे बढ़ाए जाने की आवश्यकता नहीं है।
कई बैंकों में कॉरपोरेट अभिशासन सम्बंधी मुद्दों में मुखबिर (विसल ब्लोअर) की भूमिका को भी कई बार उठाया जाता रहा है। जिन कम्पनियों में प्रमोटर ही मुख्य कार्यपालक अधिकारी के तौर पर कार्य करता है वहाँ विसल ब्लोअर अपनी भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं कर पाता है। क्योंकि जब विसल ब्लोअर कोई मुद्दा उठाता भी है तो उसे बोर्ड की कमेटी अथवा वरिष्ठ कार्यपालकों की समिति के हवाले कर दिया जाता है और वे उसे नज़र अन्दाज़ कर देते हैं। इस प्रकार पारदर्शिता दिखाई नहीं देती है। लेकिन अब विसल ब्लोअर की भूमिका को मज़बूत बनाए जाने का प्रयास किया जा रहा है।
अब भारतीय रिज़र्व बैंक ने संवैधानिक लेख परीक्षकों की समय सीमा भी तय कर दी है, इसके पूर्व कई वर्षों तक एक ही संवैधानिक लेखा परीक्षक नियुक्त रहता था। संवैधानिक लेखा परीक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहती है क्योंकि संस्था के सभी लेनदेन की जाँच उन्हें करनी होती है। इसी प्रकार कम्पनी लॉ बोर्ड ने भी सभी स्वतंत्र निदेशकों की समय सीमा को बाँध दिया है। अभी तक कई कम्पनियों में कुछ स्वतंत्र निदेशक कई सालों तक बोर्ड में सदस्य बने रहते थे।
कुल मिलाकर प्रयास यह हो रहा है कि किस प्रकार बैंकों में जमाकर्ताओं के हित सुरक्षित रहें। बोर्ड के सदस्यों की बैंक के जमाकर्ताओं के प्रति भी कुछ जवाबदारी बनती है। हालाँकि अभी के नियमों के अंतर्गत, बैंक का प्रबंधन बैंक के बोर्ड के प्रति जवाबदेह होता है और बैंक का बोर्ड बैंक के शेयर होल्डर्ज़ के प्रति जवाबदेह रहता है। बैंकों में जबकि सबसे अधिक पैसा तो जमाकर्ताओं का लगा हुआ है, जिसे बैंक ऋण के रूप में प्रदान करते हैं। ऋण प्रदान करते समय पारदर्शिता का पूरा ध्यान रखना चाहिए एवं इसी समय पर हितों के टकराव का भी पूरा ध्यान रखना ज़रूरी है। बैंक प्रबंधन को तो जमाकर्ताओं के ट्रस्टी के रूप में कार्य करना चाहिए। अतः बैंक के प्रबंधन एवं ऋण प्राप्तकर्ता के बीच की दूरी सम्बंधी सिद्धांत का पालन किया जाना भी अति आवश्यक है। भारतीय रिज़र्व बैंक के चर्चा पत्र में इस प्रकार के मुद्दों को भी छुआ गया है। बैकों में जोखिम प्रबंधन कमेटी एवं ऑडिट कमेटी आदि को भी मज़बूत बनाए जाने की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है।

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