मोदी जी की बात पर देना चाहिए विश्व समुदाय को ध्यान

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प्रधानमंत्री मोदी अपनी कई बातों के लिए इतिहास में विशेष रूप से जाने जाएंगे । उनके विरोधी उन पर बड़बोलेपन का आरोप लगाते हैं , परंतु उनके विषय में यह सत्य है कि वह अनेकों बातों को केवल उसी समय बोलते हैं जिस समय बोलना उचित होता है, और उनमें से भी कई बातें तो ऐसी होती हैं जिन्हें वे बोलते नहीं केवल कर देते हैं । जैसे अभी हाल ही में अपने सैनिकों के बीच वह लेह में अचानक जाकर खड़े हो गए । देश और दुनिया को यह खबर नहीं थी कि मोदी क्या करने वाले हैं ? इतना ही नहीं वहां पर जाकर भी वह क्या बोलेंगे ? – यह भी किसी को पता नहीं था । उन्होंने जो कुछ भी वहां बोला , वह बहुत ही नपा तुला था, लेकिन उस सब में से एक महत्वपूर्ण बात जो उनके द्वारा कही गई वह यह थी कि विस्तारवाद और साम्राज्यवाद के दिन अब लद चुके हैं। मोदी की इस बात को सारी दुनिया को स्वीकार करना चाहिए । हमारा मानना है कि मोदी जी के भाषण के इस अंश को दुनिया का कोई भी देश और कोई भी राजनीतिक विश्लेषक काट नहीं सकता । हमें यह भी समझना चाहिए कि यदि आज फिर कोई साम्राज्यवादी या विस्तारवादी शक्ति खड़ी होती है तो वह संसार के लिए केवल और केवल विनाश ही लाएगी । सर्वनाश देखने से बेहतर है कि दुनिया के देश किसी ऐसी रणनीति पर काम करें जो विस्तारवाद पर अंकुश लगाने में सफल हो। निश्चय ही प्रधानमंत्री मोदी के इस संदेश में दुनिया के गंभीर लोगों को गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित किया है। सबने इस बात को स्वीकार किया है कि यदि विश्व शांति स्थापित करनी और रखनी है तो इसका एक ही उपाय है कि फिर किसी प्रकार के नाजीवाद को उभरने न दिया जाए। सभी देश एक दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ें ।

विश्व के देशों का चिंतन इस ओर मुड़ा है कि जो लोग विस्तारवाद से प्रेरित हैं, वे सदा विश्व के लिए एक खतरा सिद्ध हुए हैं। इतिहास इस तथ्य की साक्षी देता है। विस्तारवाद और साम्राज्यवाद कष्टदायक होता है। यही कारण है कि विश्व के अनेकों देश आज चीन के इस प्रकार के साम्राज्यवाद या विस्तारवाद के विरुद्ध एकजुट होते जा रहे हैं ।
प्रधानमंत्री मोदी के भाषण पर भारत में चीनी दूतावास के प्रवक्ता जी रोंग ने इस बात से इनकार किया कि चीन विस्तारवादी है, और कहा कि यह दावा ‘अतिरंजित और मनगढ़ंत’ है। भारत में चीनी दूतावास के प्रवक्ता ऐसा कहकर अपने आपको कुछ हल्का अनुभव कर सकते हैं , परंतु सच यह है कि वह हल्के नहीं हुए हैं , बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषण ने उन्हें और उनके देश को बड़ी टेंशन में डाल दिया है। उनकी जुबान ने चाहे यह कह दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी का बयान अतिरंजित और मनगढ़ंत है , पर उनकी अंतरात्मा उन्हें कचोट रही है कि भारत के प्रधानमंत्री ने जो कुछ बोला है ,बात तो वही सही है।
जब आपका शत्रु आपके शब्द -शब्द से विचलित हो उठे तो समझो कि आप की कूटनीति सफल हो रही है, साथ ही ऐसी स्थिति को यह भी समझना चाहिए कि इससे आपके मित्रों की संख्या बढ़ रही है।
यह तथ्य किसी से छुपा हुआ नहीं है कि चीन एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, साथ ही कई और विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं में गहराई से प्रवेश कर चुका है। उसके पंजे जिस देश में भी जाकर टिकते हैं , वहीं वह अपने लिए कुछ ऐसे स्रोत बना लेता है जिनसे उस देश की अर्थव्यवस्था को निचोड़ कर उसके रक्त को चूसने में वह सफल हो जाए । जब किसी देश की नीतियां इस प्रकार की हो जाती हैं तो उसे साम्राज्यवादी देश के रूप में जाना जाता है और जब वह अपनी सीमाओं को बढ़ाने के उद्देश्य से दूसरे देशों पर रौब झाड़ने लगता है , तब उसे विस्तार वादी कहा जाता है । 1930 – 40 के दशक में इस प्रकार की हरकतों को करने के लिए नाजीवाद पनपा था ।आज उसी की नकल करते हुए चीन आगे बढ़ रहा है । लेकिन चीन को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय नाजीवाद का हश्र क्या हुआ था ? निश्चय ही नाजीवाद को कुचलने के लिए उस समय सारा विश्व एक हुआ था , आज फिर ऐसी ही परिस्थितियां बन रही हैं कि विश्व के सभी बड़े देश चीन को कुचलने के लिए एक साथ आ रहे हैं।

तिब्बत और लद्दाख जैसे पर्वतीय क्षेत्र साइबेरिया की तरह बंजर दिखाई दे सकते हैं, लेकिन साइबेरिया की तरह ही वे बहुमूल्य खनिजों और अन्य प्राकृतिक संपदा से भरे हुए हैं। यही असली कारण है कि चीनी सैनिकों ने गलवान घाटी, पैंगॉन्ग त्सो, हॉट स्प्रिंग्स, डेमचोक, फाइव फिंगर्स आदि में घुसपैठ की और नि:स्संदेह लद्दाख में और घुसने की कोशिश करेंगे, अगर इन्हें रोका नहीं गया।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि चीन ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में गहराई से प्रवेश कर लिया है । बलूचिस्तान के गैस, सोना, कोयला, तांबा, सल्फर आदि के विशाल प्राकृतिक संसाधन पाकिस्तान के अधिकारियों ने चीनियों को सौंप दिए हैं। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के लोगों को कुचलने और उनके अधिकारों का शोषण करने के दृष्टिकोण से ऐसा किया है । जिसको लेकर बलूचियों में भी गहरी नाराजगी है । यही कारण है कि वहां पर चीनी सामान और चीनी नेतृत्व के विरुद्ध भी उतना ही आक्रोश है , जितना पाकिस्तान के नेतृत्व के विरुद्ध है । प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के पश्चात बलूचियों के भीतर भी एक आत्मविश्वास पैदा हुआ है । उन्हें कुछ ऐसा लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जैसे उनके भी दिल की बात कह दी हो। यही कारण है कि बलूचिस्तान के लोग प्रधानमंत्री मोदी से अत्यधिक प्रेम करते हैं । उन्हें यह उम्मीद है कि आज के साम्राज्यवाद और विस्तारवादी शक्तियों से उन्हें और संसार की अन्य अनेकों जातियों को केवल प्रधानमंत्री मोदी ही मुक्ति दिला सकते हैं। चीन ने पाकिस्तान पर अपना शिकंजा इस कदर कस लिया है कि वहां के पत्रकारों को भी पाकिस्तानी अखबारों में चीन के विरुद्ध कुछ भी न लिखने व छापने के सरकारी निर्देश जारी किए गए हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसार के सभी बड़े देश एक साथ मिलकर चीन को सही रास्ते पर लाने के उपाय खोजें । इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र का गठन फिर से किया जाए । जिसमें भारत को वीटो पावर वाले देशों में सम्मिलित किया जाए । भारत सहित कई ऐसे देश संसार के मानचित्र पर हैं जिनकी बात को संयुक्त राष्ट्र को सुनना चाहिए और उन्हें भी स्थाई सदस्य के रूप में मान्यता देनी चाहिए । यह आवश्यक नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र के स्थाई सदस्यों की संख्या केवल 5 ही हो , इसे 11 भी किया जा सकता है । अभी भी संयुक्त राष्ट्र में सारे विश्व का प्रतिनिधित्व होता हुआ दिखाई नहीं देता । जिससे यह संस्था प्रभावहीन हो चुकी है । किसी खास देश का मोहरा बनकर काम करने से बेहतर है सारे संसार की प्रतिनिधि संस्था के रूप में काम किया जाए। जिसके लिए आवश्यक है कि भारत जैसे शांतिप्रिय देश हो को नेतृत्व के लिए अवसर प्रदान किया जाए । हथियारों के सौदागर और हथियारों के निर्माताओं से कभी भी विश्व शांति नहीं आ सकती , क्योंकि वह अपने हथियारों को बेचने के लिए कहीं ना कहीं उपद्रव कराएंगे और एक देश को दूसरे देश का डर दिखाकर अपने हथियार बेचेंगे । विश्व शांति तभी आ सकती है जब भारत जैसे देश सामने आएंगे जो केवल और केवल विश्व शांति के प्रति समर्पित होते हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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