ममता बनर्जी की तानाशाही और बंगाल की जनता

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श्यामसुंदर पोद्दार

ममता बनर्जी ने मेरे बहुत बाद छात्र परिषद की राजनीति आरम्भ की। मैंने १९७० में नक्स्लवादियों से त्रस्त यादवपुर विश्व विद्यालय में छात्र परिषद को जन्म देकर राजनीति आरम्भ की। ममता बनर्जी ने मेरे बहुत बाद मे दक्षिण कलकत्ता क़ी
आशुतोष कॉलेज की महिला कालेज योगमाया कालेज से राजनीति आरम्भ की। छात्र परिषद में ममता प्रदेश स्तर पर कभी भी नही उठ सकी। 1980 मे सुब्रत मुखर्जी राज्य इंटक के अध्यक्ष बने । मेरी तरह ममता भी सुब्रतों मुखर्जी के यहाँ बहुत आती थी तथा सुब्रतों दा की मेरी तरह ही नज़दीक लोगों में बन गयी। सुब्रत दा ने ममता को ट्रेड यूनीयन राजनीति नहीं क़रने के बावजूद इंटक के प्रतिनिधि के तौर पर बिदेश भेजा। १९८२ के बाद प्रदेश कांग्रेस सुब्रत दा के हाथ से निकल कर प्रियरंजन दासमुंशी जो कांग्रेस समाजवादी से कांग्रेस में आए थे उनके हाथ में चली गयी। १९८४ के लोकसभा चुनाव मेंलोकसभा की बंगाल से ४२ सीटों मे अधिकांश सीटों पर दासमुंशी ग्रूप व गनी खान ग्रूप ने क़ब्ज़ा कर लिया। सुब्रत दा के हिस्से मे एक भी सीट नही आयी। जादवपुर व दमदम बामपंथियों के गढ़ थे। वहा से कोयी सीट का दावेदार नही था। तब सुब्रत दा ने यादवपुर से ममता की दावेदारी पेश कर दी।

वह सीट सुब्रतों दा के ग्रूप को मिल गयी। १९८४के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के समर्थन में ऐसी आँधी चली कि देश में कांग्रेस को ४०० से अधिक सीटें प्राप्त हुईं तथा पश्चिम बंगाल में ५ सीटों से बढ़ कर १६ पार पहुँच गयी। बामपंथियो के १९५२ से चले आये गढ दमदम व यादवपुर धराशायी हो गए।
दमदम से विजयी कांग्रेस के प्रत्याशी आशुतोष लाहा भी राज्य रजनीति में ममता की तरह अनजान व्यक्ति थे पर नाम उनका नाम ममता के समान नही हुवा। कारण ममता के सामने सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चैटर्जी उम्मीदवार थे।
ममता ने१९९१ का चुनाव दक्षिण कलकत्ता लोक सभा केंद्र सें जीता। २ बार कांग्रेस के टिकट पर ३ बार टीएमसी के टिकट पर पर भाजपा के सहयोग के चलते जीती । २००९ में टीएमसी के टिकट पर कांग्रेस के समर्थन से वह लोकसभा में पहुँची। २००६ का बिधान सभा का चुनाव अकेले के दम पर लड़ी मात्र ३० सीटों पर ही जीत पायी। २०११ विधान सभा चुनावों में सीपीएम को सबक़ सिखाने के लिए सोनिया गांधी ने कांग्रेस क़े लिए ९० सीटों की माँग के बावजूद मात्र ४९ सीट पर चुनाव लड़ा तथा ममता अपने बलबूते पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब रही।
ममता को अपने सहयोगी को बदलने में देर नही करती १९९८,भाजपा,१९९९भाजपा,२००४ भाजपा। २००९ में सहयोग़ी कांग्रेस। वैसे ही कभी कहती बंगलादेशी घुसपैठियों को निकालो तो आज कहती इनको कोई भी निकाल नहीं सकता अर्थात नीति विहीन पार्टी है। ममता की सबसे बड़ी मजबूरी उसके भाई भतीजे हैं , जो ममता राज में ज़बरदस्त पैसा बना रहे हैं । सम्पत्ति पर संपत्ति ख़रीद रहे हैं। हरीश चैटर्जी स्ट्रीट की ८० प्रतिशत से अधिक संपत्ति इसके भाइयों ने ख़रीद ली। इसका भतीजा अभिषेक बंदोपाध्याय का राजनीति करने क़ा शौक है डाइमंडहॉर्बर केंद्र से सांसद है। पैसा बनाने का शौख। उशने ममता के घर के पास ही बहुमंज़िला मकान बनाया है। उसमें लिफ़्ट लगाया यहाँ तक तो ठीक है। उसके साथ एक्सीलेटर भी लगाया , कितने पैसों की बर्बादी ? कांग्रेस
के हाथ से मुस्लिम वोट छीनने क़े लिए मायनॉरिटी को इतना देती है की वह अब मेज़ोरिटी कम्यूनिटी को अखरने लगा है। राज्य में सिंडिकेट का आतंक चरम पर है भयावह बेरोज़गारी है। कल कारखाने लग नही रहे है। पार्टी में निचले स्तर तक गुट बाज़ी है। मारपीट होती रहती है । प्रशान्त किशोर उन्हें कितनी सफलता दिली पाएँगे संदेह पूर्ण है। इस समय इनके नाटक करने की आदत के चलते पूरा राज्य त्रस्त है। विपक्ष अधिक आक्रामक है। ममता के लिए आने वाले चुनाव बहुत बड़ी चुनौती है।

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