जगन्नाथ के कुछ वैदिक नामों की व्याख्या

अंग्रेजी परम्परा में अंग्रेजी माध्यम से संस्कृत पढ़े लोग कहते हैं कि वेद में जगन्नाथ का नाम या वर्णन नहीं है। स्वयं भगवान् ने कहा है कि पूरा वेद उन्हीं का वर्णन है, अतः ब्रह्म के सभी नाम जगन्नाथ के ही वाचक हैं-
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृत् वेदविदेव चाहम् (गीता १५/१५)
यहां भागवत पुराण के आधार पर उनके कुछ वैदिक नामों की चर्चा की जा रही है। कृष्ण द्वैपायन व्यास ने वेदों का संकलन करने के बाद उनका अर्थ स्पष्ट करने के लिये भागवत पुराण लिखा था (देवीभागवत पुराण, अध्याय १)। अतः १७३० में ब्रह्म सूत्र के गोविन्द भाष्य के आरम्भ में भागवत के आधार पर भाष्य करने का कारण स्पष्ट किया-उक्तं च गारुड़े-
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां, भारतार्थ विनिर्णयः। गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थ परिबृंहणः॥
वेद समझने का यह सूत्र नष्ट करने के लिये ५० वर्ष बाद विलियम जोन्स तथा एरिक पार्जिटर ने गरुड़ पुराण के मुद्रित भाग से यह श्लोक हटा दिया। अंग्रेजों का काम आगे बढ़ाने के लिये दयानन्द ने वेद व्याख्या का काम भागवत खण्डनम् से आरम्भ किया। भागवत पुराण में कृष्ण अवतार वर्णन के आरम्भ में ही जगन्नाथ के कई नाम दिये हैं-
तत्र गत्वा जगन्नाथं वासुदेवं वृषाकपि। पुरुषं पुरुषसूक्तेन उपतस्थे समाहिताः॥ (भागवत पुराण १०/१/२०)
जब पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया तो पृथ्वी गो रूप धारण कर देवों के साथ ब्रह्मा के पास गयी। ब्रह्मा सभी को ले कर विष्णु भगवान् या जगन्नाथ के पास पहुंचे जिनको वासुदेव और वृषाकपि भी कहते हैं। वे पुरुष हैं, अतः उपस्थित देवों ने पुरुष सूक्त से उनकी उपासना की।
१. गो रूप पृथ्वी-वेदों में ३ पृथ्वी तथा उनके ३ आकाश का वर्णन है जिनको ३ माता-पिता कहा गया है।
तिस्रो मातॄस्त्रीन् पितॄन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वतस्थौ नेमवग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ (ऋग्वेद १/१६४/१०)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद २/२७/८)
इनकी व्याख्या विष्णु पुराण में है। सूर्य-चन्द्र से प्रकाशित भाग को पृथ्वी कहते हैं तथा सभी पृथ्वी में नदी, पर्वत समुद्र द्वीपों के वैसे ही नाम हैं जैसे पृथ्वी पर हैं। प्रथम पृथ्वी हमारा ग्रह है जो सूर्य चन्द्र दोनों से प्रकाशित है। इसमें ७ द्वीप, ७ समुद्र, वर्ष-पर्वत (वर्षा क्षेत्र, देश का विभाजन करने वाले), कुल पर्वत (जनपदों की सीमा) आदि हैं। दूसरी पृथ्वी सौर मण्डल है जो सूर्य से प्रकाशित है। इसमें पृथ्वी के चारों तरफ ग्रह गति से बने वलयाकार भागों को द्वीप नाम दिये गये हैं, जो पृथ्वी ग्रह के द्वीपों के नाम हैं। इनके बीच के ७ समुद्रों के भी पृथ्वी जैसे ही नाम हैं। यूरेनस तक ५० करोड़ योजन के चक्राकार क्षेत्र को पृथ्वी का लोक (प्रकाशित) भाग कहा है। उससे बाहर १०० करोड़ योजन व्यास तक अलोक (अन्धकार भाग) है। यह नेपचून तक के ग्रह हैं। लोक-अलोक भाग की सीमा को लोकालोक पर्वत कहा गया है जबकि यह शून्य क्षेत्र है। पृथ्वी पर उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका में उत्तर सीमा से दक्षिण सीमा तक फैले राकी-एण्डीज पर्वतों को लोकालोक पर्वत कहा गया है। इसका केन्द्र भाग उज्जैन से प्रायः १८० अंश पूर्व है जिसे वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड (४०/५४, ६४) में पूर्व दिशा की सीमा कहा गया है।
तीसरी पृथ्वी सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा या सूर्य रूपी विष्णु का परम पद है जो सूर्यों का समूह है। इस सीमा पर सूर्य विन्दु-मात्र दीखता है, उसके बाद वह नहीं दीखता। इसके भी घूमते हुए चक्र को आकाश-गङ्गा कहते हैं जैसे भारत की एक मुख्य नदी का नाम है।
रवि चन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते । स समुद्र सरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता ॥
यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तार परिमण्डलात् ।
नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो द्विज ॥ (विष्णु पुराण २/७/३-४)
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। (ऋक् १/२२/२०)
सूर्य सिद्धान्त (१२)-ख-व्योम-खत्रय-ख-सागर-षट्क-नाग-व्योमा-ष्ट-शून्य-यम-रूप-नगा-ष्ट-चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड संपुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य करप्रसाराः॥९०॥
पृथ्वी जन्म देने के लिये माता है, पालन करने के लिये गो-माता है। ग्रह रूप में पृथ्वी पर ७ द्वीप और ७ सागर हैं। गो रूप में इस पर ४ सागर हैं जिनसे हमारे पालन के लिये सभी प्रकार के पदार्थ मिलते हैं। इनको आजकल की भाषा में स्थलमण्डल, जल-मण्डल, वायु मण्डल तथा वनस्पति मण्डल कहते हैं। इनको गो रूप में राजा पृथु ने दुहा था।
पयोधरी भूतचतुः समुद्रां जुगोप गोरूप धरामिवोर्वीम्। (रघुवंश २/३)
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्वऽन्तरिक्षम्। यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः। इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
(ऋक् १०/१२१/५-६, अथर्व ४/२/५, ७)
अथैष गोसवः स्वाराजो यज्ञः। (ताण्ड्य महाब्राह्मण १९/१३/१)
इमे वै लोका गौः यद् हि किं अ गच्छति इमान् तत् लोकान् गच्छति। (शतपथ ब्राह्मण ६/१/२/३४)
इमे लोका गौः। (शतपथ ब्राह्मण ६/५/२/१७)
धेनुरिव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्येभ्यः सर्वान् कामान् दुहे माता धेनुर्मातेव वाऽइयं (पृथिवी) मनुष्यान् बिभर्त्ति। (शतपथ ब्राह्मण २/२/१/२१)
वायुपुराणम्/ उत्तरार्धम् /अध्यायः१-तत उत्सारयामास शिला-जालानि सर्वशः।
धनुष्कोट्या ततो वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः।।१.१६७।।
मन्वन्तरेष्वतीतेषु विषमासीद् वसुन्धरा। स्वभावेना-भवं-स्तस्याः समानि विषमाणि च।।१.१६८।।
आहारः फलमूलं तु प्रजानाम-भवत् किल। वैन्यात् प्रभृति लोके ऽस्मिन् सर्वस्यैतस्य सम्भवः।।१.१७२।।
शैलैश्च स्तूयते दुग्धा पुनर्देवी वसुन्धरा। तत्रौषधी र्मूर्त्तिमती रत्नानि विविधानि च।।१.१८६।।
विष्णु पुराण-प्रथमांशः /अध्यायः१३-तत उत्सारयामास शैलां शत सहस्त्रशः।
धनुःकोट्या तदा वैन्यस्ततः शैला विवर्ज्जिताः।।८१।।
स कल्पयित्वा वत्सं तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः। स्वे पाणौ पृथिवीनाथो दुदोह पृथिवीं पृथुः।।८६।।
२. जगन्नाथ और विष्णु-विष्णु को प्रायः जगन्नाथ तथा शिव को विश्वनाथ कहते हैं। साहित्य में जगत् तथा विश्व दोनों के एक ही अर्थ हैं पर वेद विज्ञान में इनके अलग अर्थ हैं। विश्व वह रचना है जो एक सीमा के भीतर प्रायः पूर्ण है तथा हृदय केन्द्र से संचालित है। इसका संचालक चेतन तत्त्व जगत् है जो अव्यक्त या अदृश्य है।
जगदव्यक्तमूर्तिना (गीता ९/४) जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं (नारद परिव्राजक उपनिषद् ४/५०)
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३)
सूर्य जीवन का आधार रूप में विष्णु का रूप है। यह आकर्षण द्वारा पृथ्वी को अपनी कक्षा में धारण किये हुए है। यह विष्णु रूप है। उससे जो किरण तथा तेज निकलता है, वह इन्द्र है। किरणों द्वारा यह जीवन का पालन करता है वह जाग्रत रूप या जगन्नाथ है। दुर्गा सप्तशती, अध्याय १ में जबतक जगन्नाथ सोये हुए थे, उनको विष्णु कहा गया है। जैसे ही योगनिद्रा उनके सरीर से निकली उनको जगन्नाथ कहा गया है। यह काली चरित्र है अतः जगन्नाथ को दक्षिणा-काली भी कहते हैं। दक्षिणा का अर्थ है देने वाला, काम या दान दक्षिण हाथ से ही होता है। जीवन देने वाला दक्षिणा-काली, ज्ञान देने वाला दक्षिणामूर्ति शिव।
दुर्गा सप्तशती, अध्याय, १-
विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ। स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥६८॥
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥७१॥
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥८४॥
विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ॥९०॥
जाग्रत होने के बाद-उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तत्या मुक्तो जनार्दनः॥९१॥
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥८६॥
३. वासुदेव-सूर्य सिद्धान्त में पाञ्चरात्र, सांख्य, पुराण तथा वेद समन्वित सृष्टि क्रम है। हिरण्यगर्भ से पहले वासुदेव हुए। उसके बाद क्रम से संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध हुए। यह भागवत पुराण में भगवान कृष्ण, उनके भाई, पुत्र तथा पौत्र के भी नाम हैं। पर इस वर्णन से लगता है कि सृष्टि का आधार प्रथम उत्पन्न आकाश ही वासुदेव रूप है। वास = रहने का स्थान। संकर्षण = परस्पर आकर्षण। आकर्षण के केन्द्र के रूप में स्वयं वासुदेव ही कृष्ण हैं। पर सम् उपसर्ग का अर्थ है सभी पिण्डों के आकर्षण का योग। परस्पर आकर्षण द्वारा ही ब्रह्माण्ड, ग्रह, नक्षत्र आदि रूपों में पदार्थ एक सीमा के भीतर गठित हुआ। प्रद्युम्न = प्रकाशित या तेज का स्रोत। यह स्पष्ट रूप से सूर्य को कहा गया है जो तेज के कारण संसार की आत्मा है और त्रयी रूप में ऋक् (पिण्ड), यजु (जीवन), साम (तेज) तथा आधार (अथर्व) है। उसके बाद विविध सृष्टि अनिरुद्ध है जो अनन्त प्रकार की है। इसका विभाजन १२ प्रकार के आदित्यों से हुआ।सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १२-
वासुदेव: परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुष: पर:। अव्यक्तो निर्गुण: शान्तः पञ्चविंशात् परोऽव्यय:।।१२।।
प्रकृतयन्तर्गतो देवो बहिरन्तश्च सर्वग:। सङ्कर्षणोऽयं: सृष्ट्वादौ तासु वीर्यमवासृजत् ।१३।।
तदण्डमभवद् हैमं सर्वत्र तमसावृतम्। तत्रानिरुद्धः प्रथमं व्यक्तीभूतः सनातनः॥१४॥
हिरण्यगर्भो भगवानेषछन्दसि पठ्यते। आदित्यो ह्यादिभूतत्वात् प्रसूत्या सूर्य उच्यते॥१५॥
परं ज्योतिस्तमः पारेसूरोऽयं सवितेति च। पर्येति भुवनान्येव भावयन् भूतभावनः॥१६॥
प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्येष विश्रुतः। ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युग्रामूर्तिर्यजूंषि च॥१७॥
त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्मा कालकृद् विभुः। सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वमस्मिन् प्रतिष्ठितम्॥१८॥
रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम्। छन्दांस्यश्वाः सप्तयुक्ताः पर्य्यटत्येष सर्वदा॥१९॥
त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत्। सोऽहङ्कारं जगत् सृष्ट्यै ब्रह्माणमसृजद् विभुः॥२०॥
तस्मै वेदान् वरान् दत्वा सर्वलोक पितामहम्। प्रतिष्ठाप्याण्डमध्ये तु स्वयं पर्येति भावयन्॥२१।
अथ सृष्ट्यां मनश्चक्रे ब्रह्माऽहङ्कारमूर्तिभृत्। मनसश्चन्द्रमा जज्ञे चक्षुषस्तेजसां निधिः॥२२॥
मनसः खं ततो वायुरग्निरापो धरा क्रमात्। गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे॥२३॥
अग्नीषोमौ भानुचन्द्रौ ततस्त्वङ्गारकादयः। तेजो भूरवाम्बुवातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे॥२४॥
पुनर्द्वादशधाऽऽत्मानं विभजे राशिसंज्ञितम्। नक्षत्र रूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं वशी॥२५॥
४. वृषाकपि-संसार में हर सृष्टि पहले जैसी ही हुई है क्योंकि सृष्टि के नियम वही रहते हैं। ब्रह्मा ने भी इस कल्प में सृष्टि करने के लिये सोचा कि इससे पहले कैसे सृष्टि हुई थी। तब उन्होंने पुराणों का स्मरण किया जिससे पता चला कि पिछले कल्प में कैसे सृष्टि हुई थी। तब उनको ४ वेदों का स्मरण हुआ और उसके द्वारा सृष्टि की। वेद में भी यही कहा है कि पहले जैसी सृष्टि हुई।
प्रथमं सर्वशास्त्राणां पुराणं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ॥
(वायु पुराण १/६१, मत्स्य पुराण ५३/३)
सूर्या चन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । (ऋग्वेद १०/१९०/३)
सृष्टि कैसे होती है? विभिन्न स्तरों पर फैला पदार्थ जल भण्डार जैसा समुद्र है। उससे बना पिण्ड भूमि है। बीच का निर्माण मेघ या वराह है जो मिश्रण है। मेघ जल-वायु का मिश्रण, वराह जल-स्थल का प्राणी है। स्वयम्भू मण्डल में रस रूप समुद्र था। उसमें तरंग होने से सलिल या सरिर हुआ। अस्पष्ट सीमा के भीतर मेघ जैसा पदार्थ हुआ। थोड़ा और संगठित होने पर वे अलग अलग पिण्ड बनकर निकले जैसे मेघ से जलविन्दु निकलते हैं। जल विन्दुओं जैसे पिण्ड (ब्रह्माण्ड) को द्रप्सः कहा है, उनका निकलना या गिरना स्कन्द है। इसी प्रकार हर ब्रह्माण्ड का निर्माण पदार्थ आण्ड था, उससे तारा रूप बहुत से विन्दु निकले। हर तारा मण्डल में भी ग्रह रूपी विन्दु बने। स्वयम्भू का मेघ या वराह अर्यमा, ब्रह्माण्ड का वरुण तथा सौरमण्डल का मित्र है। इनके समुद्र क्रमशः सरिर्, अम्भ (अप् + शब्द), मर हैं।
पहले जैसी सृष्टि करने वाला कपि है। अतः मनुष्य का अनुकरण करने वले पशु को भी कपि कहते हैं। मेघ से जल विन्दु समान वर्षा करनेवाला वृषा है। दोनों प्रकार से सृष्टि करने वाला वृषा कपि वासुदेव का ही रूप है।
तद् यत् कम्पाय-मानो रेतो वर्षति तस्माद् वृषाकपिः, तद् वृषाकपेः वृषा कपित्वम्। … आदित्यो वै वृषाकपिः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर ६/१२) यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद् २/७) समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा, सरिराय त्वा वाताय स्वाहा । (वा॰ यजुर्वेद ३८/७)
अयं वै सरिरो योऽयं वायुः पवत एतस्माद्वै सरिरात् सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि सहेरते (शतपथ ब्राह्मण १४/२/२/३)
वातस्य जूतिं वरुणस्य नाभिमश्वं जज्ञानं सरिरस्य मध्ये। (वा॰ यजुर्वेद १३/४२) आपो ह वाऽ इदमग्रे महत्सलिलमेवासीत् (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण १/५६/१)
वेदिर्वै सलिलम् (शतपथ ब्राह्मण ३/६/२/५) तद्यदब्रवीत् (ब्रह्म) आभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किंचेति तस्मादापोऽभवंस्तदपामप्त्वमाप्नोति वै स सर्वान् कामान् यान् कामयते । (गोपथ ब्राह्मण पूर्व १/२) स इमाँल्लोकनसृजत । अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद् १/१/२) तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद २/२७/८)
असौ वा आदित्यो द्रप्सः (शतपथ ब्राह्मण ७/४/१/२०)
स्तोको वै द्रप्सः। (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर २/१२)
स (प्रजापतिः) वै वराहो रूपं कृत्वा उपन्यमज्जत्। (तैत्तिरीय ब्राह्मण १/१/३/६)
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः॥ (ऋक् ६/४१/३)
अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद् द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तुविष्मान्। (ऋक् ६/८७/६)
द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः (ऋक् १०/१७/११)
यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते अंशुर्बाहुच्युतो धिषणाया उपस्थात्। (ऋक् १०/१७/१२)
५. पुरुष-पुरुष सूक्त में इसके सभी रूप वर्णित हैं अतः उसी सूक्त से उनकी उपासना हुई। पुरुष सूक्त के कुछ रूपों के क्रम हैं-(१) पूरुष = ४ पाद का मूल स्वरूप, (२) सहस्रशीर्ष-उससे १००० प्रकार के सृष्टि विकल्प या धारा, (३) सहस्राक्ष =हर स्थान अक्ष या केन्द्र मान सकते हैं, (३) सहस्रपाद-३ स्तरों की अनन्त पृथ्वी, (४) विराट् पुरुष-दृश्य जगत् जिसमें ४ पाद में १ पाद से ही सृष्टि हुई। १ अव्यक्त से ९ प्रकार के व्यक्त हुए जिनके ९ प्रकार के कालमान सूर्य सिद्धान्त (१५/१) में दिये हैं। अतः विराट् छन्द के हर पाद में ९ अक्षर हैं। (५) अधिपूरुष (६) देव, साध्य, ऋषि आदि, (६) ७ लोक का षोडषी पुरुष, (७) सर्वहुत यज्ञ का पशु पुरुष, (८) आरण्य और ग्राम्य पशु, (९) यज्ञ पुरुष (१०) अन्तर्यामी आदि।
पुरुष की सभी परिभाषा मधुसूदन ओझा जी ने श्लोकों में दी हैं-
पुरु व्यवस्यन् पुरुधा स्यति स्वतस्ततः स उक्तः पुरुषश्च पूरुषः।
पुरा स रुष्यत्यथ पूर्षुरुच्यते स पूरुषो वा पुरुषस्तदुच्यते। धी प्राणभूतस्य पुरे स्थितस्य सर्वस्य सर्वानपि पाप्मनः खे।
यत्सर्वतोऽस्मादपि पूर्व औषत् स पूरुषस्तेन मतोऽयमात्मा॥ स व्यक्तभूते वसति प्रभूते शरीरभूते पुरुषस्ततोऽसौ।
पुरे निवासाद्दहरादिके वा वसत्यतं ब्रह्मपुरे ततोऽपि॥ (ब्रह्म सिद्धान्त ११/१७२-१७४)
त्रिदण्डी स्वामी की पुरुष सूक्त व्याख्या में पद्म पुराण की परिभाषा उद्धृत है जो अभी उपलब्ध पुराण में नहीं मिलती-
पुं संज्ञे तु शरीरेऽस्मिन् शयनात् पुरुषो हरिः। शकारस्य षकारोऽयं व्यत्ययेन प्रयुज्यते॥
यद्वा पुरे शरीरेऽस्मिन्नास्ते स पुरुषो हरिः। यदि वा पुरवासीति पुरुषः प्रोच्यते हरिः॥
यदि वा पूर्वमेवासमिहेति पुरुषं विदुः। यदि वा बहुदानाद्वै विष्णुः पुरुष उच्यते॥
पूर्णत्वात् पुरुषो विष्णुः पुराणत्वाच्च शार्ङ्गिणः। पुराणभजनाच्चापि विष्णुः पुरुष ईर्यते॥
यद्वा पुरुष शब्दोऽयं रूढ्या वक्ति जनार्दनम्।
पुरुष (विश्व या व्यक्ति या वस्तु) के ४ रूप कहे गये हैं-बाहरी स्थूल रूप क्षर है जो दीखता है पर सदा क्षरण होता रहता है। इसका कूटस्थ परिचय प्रायः स्थायी है पर वह दीखता नहीं है-यह अक्षर पुरुष है। सामान्यतः क्षर-अक्षर दो ही विभाग किये जाते हैं। अक्षर का ही जो रूप कभी नष्ट नहीं होता वह अव्यय है। इसे निर्माण क्रम या वृक्ष भी कहा गया है। यह क्षर तथा अक्षर दोनों से श्रेष्ठ होने के कारण पुरुषोत्तम कहा गया है। पुरुषोत्तम रूप में प्रथित होने के कारण १ का विशेषण प्रथम होता है। जगन्नाथ का पुरुषोत्तम रूप राम है जो प्रथित है। अतः धान आदि तौलने के लिये प्रथम के बदले राम कहते हैं। कृष्ण मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं थे, उन्होंने जन्म से ही ऐसे चमत्कार आरम्भ दिखाये जो मनुष्य के लिये अकल्पनीय है।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥ (गीता, अध्याय १५)
अजोऽपि अन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। (गीता ४/६)
✍🏻अरुण उपाध्याय

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