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धर्म-अध्यात्म

धर्म सत्य गुणों के धारण और वेद अनुकूल आचरण को कहते हैं

मनुष्य की प्रमुख आवश्यकता सद्ज्ञान है जिससे युक्त होकर वह अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर सके और संसार व जीवन विषयक सभी शंकाओं व प्रश्नों के सत्य उत्तर वा समाधान प्राप्त कर सके। यह कार्य कैसे सम्भव हो? यदि सृष्टि के आरम्भ की स्थिति पर विचार करें तो परिस्थितियों के आधार पर यह स्वीकार करना पड़ता है कि सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि उत्पन्न हुई थी। इस सृष्टि में सभी स्त्री व पुरुष युवावस्था में उत्पन्न हुए थे। इसका कारण यह था कि बच्चों का पालन पोषण करने के लिये जिन माता-पिता की आवश्यकता होती है वह विद्यमान नहीं थे। यदि वृद्धावस्था में अमैथुनी सृष्टि होती तो उनसे सन्तानों का जन्म न होने के कारण यह सृष्टि आगे चल नहीं सकती थी। अतः युक्ति एवं तर्क संगत सिद्धान्त यही है कि सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों की अमैथुनी सृष्टि हुई और सभी उत्पन्न हुए स्त्री व पुरुष युवावस्था में थे। यह सृष्टि किसने उत्पन्न की, इसका उत्तर है कि जिसने इस सृष्टि में सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व नक्षत्रों आदि को बनाया था, उसी सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने ही मनुष्यों, पशु-पक्षी जगत सहित वनस्पतियों आदि को भी बनाया।

वह परमात्मा ज्ञान व विज्ञान का आति व अजस्र स्रोत है। उसने ही मनुष्य शरीर में देखने के लिये आंखे, सुनने के लिए कान, शब्दोच्चार करने के लिए मुख, कण्ठ, जिह्वा आदि अवयवों को बनाया है। मनुष्य का जीवात्मा अल्पज्ञ होता है। हम जिस भाषा को बोलते व जानते हैं वह सब हमें अपने जन्म से पूर्व ही संसार में प्रवृत्त हुई प्राप्त होती है। हमारे माता-पिता व उनके पूर्वजों को भी हमारी ही भांति पहले से ही भाषा व ज्ञान प्राप्त हुआ था। अतः सृष्टि के आरम्भ में भाषा व ज्ञान का अधिष्ठाता व दाता परमात्मा को ही मानना पड़ता है। ईश्वर निराकार व सर्वव्यापक होने से मनुष्यों के शरीर व सृष्टि को बना सकता है तो वह उन्हें भाषा व जीवनयापन हेतु ज्ञान भी दे सकता है। यदि न देता तो वह अन्यायकारी कहा जा सकता था। जिसने मनुष्यों को जन्म दिया, उन्हें बोलने व समझने के लिए मुंख, जिह्वा, कण्ठ, नासिका तथा बुद्धि आदि अवयव बनाकर दिये, वह यदि भाषा व ज्ञान न देता तो न्यायकर्ता नहीं कहा जा सकता था। इससे सिद्ध है कि परमात्मा से ही आदि सृष्टि में मनुष्यों को भाषा व ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वह भाषा व ज्ञान ‘‘चार वेद” हैं। वेद की परीक्षा करने पर भी इस सत्य की पुष्टि होती है कि वेदों का ज्ञान मनुष्यकृत नहीं है। इससे भाषा व वेद अपौरुषेय अर्थात् परमात्मा द्वारा प्रदत्त सिद्ध होते हैं। यहां एक तथ्य का और उल्लेख करना समीचीन प्रतीत होता है, वह यह कि परमात्मा भी एक चेतन एवं विचारशील सत्ता है। परमात्मा की भी अपनी भाषा अवश्य है जिसमें वह विचार करता व उसके अनुसार कार्यों को करता है। अतः उसी भाषा व उसी ज्ञान को, जो व जितना मनुष्यों के लिए आवश्यक एवं ग्राह्य होता है, वह सृष्टि के आरम्भ में वेदों के रूप में देता है। इस वेदज्ञान से ही यह संसार सुव्यवस्थित रूप से चलता है। यदि वह ऐसा न करता तो वह सभी प्राणियों का माता, पिता, आचार्य, गुरु, राजा, न्यायाधीश, ज्ञान का दाता व सुखों का दाता नहीं कहला सकता था। ऐसा ही वह है, इसलिये उसे ऐसा कहा व बताया जाता है।

मनुष्य का आत्मा अल्पज्ञ होता है। अतः प्रत्येक कार्य में यह उचित व अनुचित का विवेकपूर्ण निर्णय नहीं ले सकता। इसके लिये उसे ईश्वर प्रदत्त ज्ञान वेद तथा परमात्मा को यथार्थरूप में जानने वाले ऋषियों के उपदेशों व उनके आचार संहिताओं विषयक ग्रन्थों की आवश्यकता होती है। हमारे देश में परमात्मा का वेदज्ञान और प्रक्षेपों से रहित मनुस्मृति आदि ग्रन्थ इन आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहे हैं। मनु महाराज ने कहा है चारों वेद धर्म के मूल हैं। धर्म विषयक सभी बातों का ज्ञान वेदों से होता है। आज भी वेदों से धर्म विषयक जिज्ञासाओं के सही उत्तर प्राप्त किये जा सकते हैं। इस आवश्यकता की पूर्ति को सरल बनाते हुए ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि आदि अनेक ग्रन्थों की रचना की जिससे धर्म जिज्ञासा का प्रयोजन व उसका समाधान सिद्ध होता है। ऋषि दयानन्द के अनुवर्ती विद्वानों ने इस कार्य को आगे बढ़ाया और वेद व्याख्या के ग्रन्थों के द्वारा मनुष्य के लिये धर्म व अधर्म तथा कर्तव्य व अकर्तव्यों का बोध कराया है।

सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को वेदों से ही ईश्वर, उसके गुण, कर्म, स्वभाव सहित मनुष्यों के नानाविध कर्तव्यों का ज्ञान हुआ था। यही ज्ञान महाभारत से पूर्वकाल तक पूरे विश्व में प्रचारित था। महाभारत के बाद जब विश्व में वेदों का प्रचार-प्रसार अवरुद्ध हो गया था तब पूर्व प्रचलित कुछ मान्यताओं के आधार पर ही वहां उत्पन्न मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में ईश्वर व धर्म-कर्म विषयक विचार प्रचलित किये गये। इसी आधार पर ऋषि दयानन्द ने कहा है कि मत-मतान्तरों में जो जो सत्य बातें हैं वह सब वेदों से उन मतों में गई हैं और जो उनमें अविद्यायुक्त बातें हैं वह उन मत-मतान्तरों की अपनी हैं। इस आधार पर वेद स्वतः प्रमाण धर्मग्रन्थ सिद्ध होते हैं और अन्य ग्रन्थ वेदानुकूल होने पर परतः प्रमाण के रूप में प्रतिष्ठित किये जाते हैं। वेदों के होते हुए संसार में किसी मत व विद्याविद्यासंयुक्त ग्रन्थ की आवश्यकता नहीं है। दीपक की आवश्यकता तभी होती है कि जब सूर्य का पूर्ण प्रकाश उपलब्ध न हो। जब सूर्य का पूर्ण प्रकाश उपलब्ध नहीं होता तब दीपक की सहायता ली जाती व ली जा सकती है। रात्रि के अन्धकार में भी दीपक की आवश्यकता होती है। वर्तमान में वेदों का सूर्यसम प्रकाश उपलब्ध है, वेदानुकूल सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ भी उपलब्ध है, तब वेदविरुद्ध ग्रन्थों की किंचित भी आवश्यकता नहीं है। इन मत-पंथ-सम्प्रदायों के ग्रन्थों से धर्म के साथ अधर्म भी फैलता है जिससे संसार में अशांति भी उत्पन्न होती है। अतः मत-पंथ-सम्प्रदायों के ग्रन्थों का त्याग कर वेदों की सत्य व प्राणीमात्र की हितकारी मान्यताओं व सिद्धान्तों को अपनाना ही सभी मनुष्यों का कर्तव्य सिद्ध होता है। ऐसा करके ही सभी मनुष्य एक ईश्वर के पुत्र व पुत्रियां सिद्ध हो सकते हैं और पूरा विश्व ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्” का स्वरूप ले सकता है।

धर्म किसी वस्तु व पदार्थ में निहित उसके स्वाभाविक गुणों को कहते हैं। अग्नि का धर्म रूप, दाहकता व प्रकाश उत्पन्न करना होता है। यह सदैव उसमें रहते हैं और उससे कभी पृथक नहीं होते। इसी प्रकार से जल का गुण शीतलता व पिपासा शान्त करना होता है। जल में यह गुण आदि काल से लेकर आज तक बने हुए हैं। इसी प्रकार से मनुष्य का धर्म सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया, करुणा, परस्पर सहयोग, एक दूसरे की सहायता, ज्ञान देना व प्राप्त करना, भूखे को भोजन कराना, रोगियों के उपचार में सहायक होना, निर्बलों का बल बनना, असहायों का सहायक होना, ईश्वर के सत्यस्वरूप को समग्र रूप से जानकर उसकी भक्ति व उपासना करना, वायु शुद्धि, रोग निवारण, आरोग्य, विद्वानों का सत्कार, उनसे संगतिकरण तथा सद्गुणों का आदान-प्रदान के लिए यज्ञ-अग्निहोत्र करना आदि भी धर्म हैं। इसी प्रकार से माता-पिता-आचार्यों-वृद्धों की सेवा-सुश्रुषा, उनका रक्षण, आज्ञा पालन, उनको भोजन, वस्त्र व ओषधियों से सन्तुष्ट रखना आदि मनुष्य के कर्तव्य सिद्ध होते हैं। यही सभी मनुष्यों के धर्म हैं। इसके विपरीत व उलटे कार्य अधर्म कहलाते हैं। संसार का कोई मनुष्य अछूत नहीं है। सबके साथ प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य व्यवहार किया जाना चाहिये। सत्य का ग्रहण करना और असत्य का त्याग करना भी धर्म का प्रमुख सिद्धान्त है। ईश्वर निराकार और सर्वव्यापक है, अतः उसे इसी रूप में मानना व ध्यान करना धर्म और इसके विपरीत उसे साकार तथा एकदेशी मानकर भक्ति व पूजा करना धर्मविरुद्ध सिद्ध होता है। यही सब स्त्री व पुरुषों का धर्म व कर्तव्य है। देश, काल व परिस्थतियों के कारण इनमें न्यूनाधिक किया जा सकता है परन्तु वह सत्य के विपरीत कदापि नहीं होने चाहिये। यह भी उल्लेखनीय है कि परमात्मा ने ही पशु व पक्षियों को भी मनुष्यों के समान ही उनके पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार कर्म-फल भोग के लिए बनाया है। उनको मारना व उनका मांस खाना घोर अधर्म व कुकृत्य है। जो ऐसा करते हैं वह ईश्वर के कर्म-फल सिद्धान्तों के अनुसार इस जन्म के कर्मों का न्याय होने पर परजन्म में अवश्य दण्ड पायेंगे। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, उन्हें पशु हत्या, मांसाहार तथा तामसिक भोजन को तुरन्त छोड़ देना चाहिये। यदि वह ऐसा नहीं करते तो इनके फल भोगने के लिये तैयार रहना चाहिये।

संसार में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। इनकी जो मान्यतायें सत्य व वेदानुकूल हैं वह धर्म तथा जो असत्य, वेदविरुद्ध व किसी मनुष्य व प्राणी के लिए हानिकारक हैं, हिंसा, स्वमत प्रशंसा, परमत निन्दा, मतान्तरण आदि कार्य हैं, वह सब अधर्म के कार्य हैं। इनको छोड़ दिया जाये और अपनी मान्यताओं को वेदानुकूल करते हुए उन्हें धर्म के लक्षणों धैर्य, क्षमा, इन्द्रियों पर नियंत्रण, अस्तेय, शौच, अनुचित इच्छाओं व द्वेष का त्याग, ज्ञान व विवेक से युक्त होना, विद्या पढ़ना व पढ़ाना, सत्य का धारण व पोषण तथा अक्रोध आदि का पालन करना ही धर्म है। जब तक ऐसा नहीं होगा संसार व मानव समाज का कल्याण नहीं हो सकता। धर्म का अर्थ ही सब मनुष्यों का कल्याण होना व करना है। जिस जिस कार्य से अपना व दूसरों का अहित होता वह सब काम अधर्म हैं। हम अपने सुख व स्वार्थ के लिये जो काम करते हैं, जिससे दूसरों को कष्ट व हानि होती है, वह सब काम अधर्म के होते हैं। धर्म के नाम पर निर्दोष लोगों की हत्या व उत्पीडन महापाप है। ऐसा धर्माधर्म का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है। जिनको धर्म को जानने की जिज्ञासा है उन्हें वेद, विशुद्ध मनुस्मृति, उपनिषद, दर्शन सहित सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। इतिहास में जितने व जिस मत के भी अत्याचारी व मतान्ध लोग हुए हैं, जिन्होंने अकारण सज्जन पुरुषों को दुःख व यातनायें दी हैं, उनका जीवन अधर्म का प्रतीत माना जा सकता है। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं।

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