वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-40

अनुसूचित जाति, जनजाति की अवधारणा नितांत भ्रामक
भारतीय समाज में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति शब्दों की उत्पत्ति अंग्रेजी काल से आयी है। इससे पूर्व महाभारत युद्घ के पश्चात भारत के पराभव के काल में भारत में जाति व्यवस्था का श्रीगणेश हुआ। उस जाति व्यवस्था ने भारत के एक बहुत बड़े समाज को अछूत बना दिया। यह भावना सचमुच मानवता के प्रति एक अपराध ही था। मनुष्य की ये ऊंच-नीच की व्यवस्था प्राकृतिक और स्वाभाविक नही है, अपितु कृत्रिम है। जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नही है। वेद, उपनिषद और अन्य आर्ष ग्रंथो में कहीं भी व्यक्ति के मध्य जन्म के आधार पर विभेद करने या मनुष्य समाज को जातीय आधार पर ऊंच नीच में विभाजित करने का संकेत तक नही है। जिन लोगों ने अपना स्वार्थ साधने के लिए बाद में ऐसा कहीं इन ग्रंथों में जोड़ा तो यह इन लोगों की सोच हो सकती है, परंतु वह उक्त ग्रंथो की मौलिक भावना कदापि नही कही जा सकती।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर कहा था-‘अतीत पर दृष्टिपात करने का एकमात्र प्रायोजन उन तत्वों को समझना है, जिन्होंने ऐतिहासिक उथल पुथल के बावजूद हमें एक राष्ट्र के रूप में जीवित रखा है। अपने अतीत का अध्ययन करने का और कोई प्रयोजन नही हो सकता।’
यदि हम भारत के अतीत का अवलोकन करें तो हमारे यहां वर्ण व्यवस्था थी। जिसमें व्यक्ति अपने कैरियर (व्यक्तित्व के निर्माण) के लिए कोई न कोई व्यवसाय चुनता था। कैरियर शब्द आजकल अधिक प्रचलित है, इसलिए हमने यहां जानबूझ कर यह शब्द प्रयुक्त किया है। कैरियर का चयन आज भी एक बड़ी समस्या है और एक चुनौती भी। भारतीय समाज ने प्राचीन काल में इस कैरियर को एक वर्ण नाम दिया। आप अपने जीविकोपार्जन के लिए अपनी योग्यतानुसार जो चाहें वर्ण चुन सकते थे। ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण थे।
तब सभी सवर्ण थे
आज सवर्ण उच्च जाति के लोगों को कहा जाता है। वास्तव में ऐसा कहा जाना हमारी अज्ञानता है। संसार का कोई भी व्यक्ति किसी न किसी कर्म, कार्य, वर्ण को अपने जीवन व्यापार के लिए चुनता है। इसलिए हर व्यक्ति सवर्ण है। सवर्ण का अर्थ किसी न किसी वर्ण से सहित होना ही है। शूद्र भी सवर्ण है, क्योंकि वर्ण तो उसका भी है। किसी भी ऊंची जाति के व्यक्ति को ही सवर्ण कहना अनुचित है। अत: यदि सवर्ण एक अच्छा शब्द है तो वह प्रत्येक मानव के लिए है न कि किसी विशिष्टï व्यक्ति या समुदाय के लोगों के लिए है।
ब्राहमणवादी सोच घातक रही
जिन लोगों ने स्वयं को ऊंचा घोषित किया और अन्य जातियों से अपनी सेवा सुश्रूषा कराने का पूरा प्रबंध किया, उनकी यह सोच ब्राहमणवादी सोच के रूप में आजकल मानी, जानी व पहचानी जाती है। यद्यपि प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जो समाज के लिए ज्ञान दान कर रहा है स्वभावत: संसार के लोगों के लिए पूज्यनीय और वंदनीय बन जाता है, परंतु गलती तब होती है जब कोई व्यक्ति स्वयं को केवल इसलिए पूजित कराना चाहता है कि वह किसी विशिष्ट परिवार और वंश में उत्पन्न हुआ होता है। महानता और पूजा वंदन किसी विशिष्ट परिवार की बपौती नही होती है। ये व्यक्ति की निजी योग्यता होती है और जिस किसी के भी भीतर है उसे पूजित होना ही चाहिए। डॉ भीमराव अंबेडकर जैसी प्रतिभाएं इसीलिए सम्माननीय हैं। उन्हें किसी जाति विशेष से बांधकर नही देखा जा सकता। इनकी अपनी आभा है और अपनी प्रतिभा है, जो सम्मानित होनी ही चाहिए।
एक बार शंकराचार्य जी ने अपने लेख में लिखा कि वेदों के अनुसार यदि नीची जाति का कोई व्यक्ति किसी मंदिर में चला जाए तो मंदिर दूषित हो जाता है। उनका कहना था कि इस प्रकार प्रेतात्माएं मंदिर की मूर्तियों में प्रवेश कर जाती हैं, और जब इन मूर्तियों की पूजा की जाती है तो वे आत्माएं अधिक शक्तिशाली हो जाती हैं। उसके परिणाम स्वरूप संघर्ष क्रोध और घृणा की भावनाएं बढ़ती हैं, जिनमें रोग, अव्यवस्था, बाढ़, सूखा, दुर्भिक्ष, तथा भूचाल जन्म लेते हैं। इस प्रकार लोगों को विनाश का सामना करना पड़ता है।
ऐसी सोच मानवीय नही थी। वास्तव में सच ये है कि इसी प्रकार की सोच के कारण भारत में एक बहुत बड़ा वर्ग उपेक्षित और उत्पीडि़त जीवन जीने के लिए विवश हो गया। कालांतर में समाज की मार झेलता हुआ यही समाज सब प्रकार से विकास में पिछड़ गया। आज इसी समाज को हम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के नाम से जानते हैं।
हमारे संविधान ने इन लोगों की पहचान जाति लगाकर की है, यह समाज की एक विसंगति को और भी अधिक प्रोत्साहित करने वाली भावना है। वास्तव में जाति शब्द किसी भी वर्ग के लोगों को उन्नति के समान अव सर देते समय भी प्रयुक्त नही करना चाहिए। बाबू जगजीवनराम जी लिखते हैं-जब तक जातिवाद को पूर्णतया निर्मूल नही कर दिया जाता, भूमि का नये सिरे से बंटवारा नही होता, और अछूत कहे जाने वाले इन लोगों को बराबर के अवसर नही दिये जाते, तब तक भारत फल फूल नही सकता….मैं यह भी समझता हूं कि जाति सूचक नाम और उपाधियां अपने नाम के साथ लगाने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
महर्षि दयानंद ने भारतीयों को जाति सूचक नामों के दुष्परिणामों से बहुत पहले सचेत किया था। इसलिए उन्होंने मानव को सर्वप्रथम मानव बने रहने के लिए प्रेरित किया और सबसे कहा कि अपने नाम के पीछे आर्य (एक मानव जाति का प्रतीक शब्द) लगाओ! महर्षि की यह देन बड़ी अनुपम थी। इस शब्द के माध्यम से वह राष्ट्रीय एकता का ताना बाना बुन रहे थे।
समाज में यदि विखण्डन है तो राष्ट्र में विखंडन स्वयं ही हो जाएगा। इसलिए राष्ट्र के विखंडन को रोकने के लिए समाज के विखंडन को रोकना आवश्यक है। इसलिए उन्होंने हमसे कहा कि सब आर्य बन जाओ। जातिवाद स्वयं समाप्त हो जाएगा। उनकी मान्यता थी कि एक देव, एक देश, एक वेश और एक गणवेश के उपासक बन जाओ, राष्ट्रीय एकता स्वयंमेव आ जाएगी।
बाबू जगजीवन राम जी इस विषय में लिखते हैं-मैं इस विचार से पूर्णत: सहमत हूं कि जात, कबीला, नस्ल या सम्प्रदाय पर आधारित समूहों की आज के युग में कोई सार्थकता नही रही और आधुनिक मानव को मानवीय संस्कृति अपनी थाती में मिली है। मैं बताना चाहता हूं कि जातिवाद और छुआछूत को समाप्त करने के लिए कौन से कार्य करने आवश्यक हैं। छुआछूत जाति के संदर्भ में ही है। यदि जाति का उन्मूलन कर दिया जाता है तो छुआछूत अपने आप समाप्त हो जाएगी और किसी के मन में छूत और अछूत का विचार भी नही रहेगा।’
स्वतंत्रता के उपरांत भारत सरकार ने अस्पृश्यता निवारण अधिनियम लागू किया। परंतु जाति उन्मूलन अधिनियम जैसा कोई कानून नही बनाया। जाति को नेताओं ने बड़ी चतुराई से अपनी राजनीति करने के लिए अलग से सुरक्षित रख लिया, इसी में उन्होंने आरक्षित और अनारक्षित समाज की कल्पनाओं के सपने बनाये बुने और उधेड़े। यह सर्वमान्य सत्य है कि उनकी कल्पनाओं के सपने जितने अनुपात में बुने गये उतने ही अनुपात में भारतीय राष्ट्रवाद पर मकड़ी का जाल फैलता गया और उसके चित्र को और चरित्र को धुंधला करता चला गया। आज का भारत इसी धुंधलके में से झांक कर अपने भविष्य को देख रहा है पर उसे स्पष्ट कुछ नही दीख रहा है। वास्तव में पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की अवधारणा नितांत भ्रामक है। राज्य की कृपा का पात्र व्यक्ति होना चाहिए। आधुनिक युग में शोषण के लिए पनपे नये सामंती समाज का वर्चस्व तोडऩे के लिए यह और भी आवश्यक है कि हम भ्रांतियों के शिकार ना हों। आज सरकारी कार्यालयों तक में कर्मचारियों के जातीय समूह या गुट मिल जाते हैं। ये लोग नि:संदेह एक दूसरे से जातीय द्वेष भाव रखते हैं, और उनकी यह भावना उनकी कार्य क्षमता पर भी निश्चित रूप से घातक प्रभाव डालती है। आरक्षण की व्यवस्था को भीख मान लिया गया है और आरक्षण के माध्यम से आगे बढ़े व्यक्ति को दया का पात्र मानकर बेचारा माना जाता है। हमें चाहिए कि हमारी सरकारें उपेक्षित और शोषित समाज के बच्चों की प्रतिभा का विकास करें और उनकी योग्यता को समाजोपयोगी स्वरूप देकर उन्हें उन्नति और विकास का रास्ता दिखायें।

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