दिल्ली रैली से ऊर्जान्वित कांग्रेस कैग को पंगु बनाना चाहती है सरकार

राकेश कुमार आर्य
जब शासक वर्ग लोकप्रियता खोता है तो उसका ग्राफ तेजी से गिरा करता है। अपनी लोकप्रियता के गिरते ग्राफ को पुन: उठाने के लिए शासक वर्ग ऐसी परिस्थितियों में बौखलाहट और हताशा में कुछ ऐसे निर्णय लेने की जल्दी करता है जो उसे तात्कालिक आधार पर कुछ राहत देते से लगते हैं, लेकिन वास्तव में उन निर्णयों के परिणाम उसके विरूद्घ ही आते हैं। केन्द्र की कांग्रेस नीत संप्रग सरकार इस समय कुछ ऐसी ही हताशा में घिरी फंसी खड़ी है। दिल्ली में हुई रैली से पार्टी को कुछ ऊर्जा मिली है। यद्यपि रैलियों में पहुंचे लोग कभी भी चुनाव की दिशा को तय नही कर पाते हैं। यहां तक कि चुनावी सभाएं भी कई बार बड़ी सफल हो जाती है, लेकिन उनके परिणाम उल्टे ही आते हैं। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ने बहुत सी सफल चुनावी सभाओं को संबोधित किया था, लेकिन चुनाव परिणाम उनके खिलाफ आए।
अब दिल्ली रैली से पार्टी को भ्रम हुआ है और भ्रमवश पार्टी कैग को लुंजपुंज बनाने की योजना पर कार्य करने का मन बना रही है। पार्टी का विचार है कि इस निकाय को कई सदस्यों वाला बना दिया जाए, ताकि इस निकाय में भी अपने पसंद के लोगों को बैठाकर राजनीति की जा सके। कई सदस्यीय निकायों में शासक दल से प्रभावित लोगों का मिलना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायण सामी ने कहा है कि कैग को कई सदस्यीय बनाने पर गंभीरता से विचार हो रहा है। सरकार बड़ी सक्रियता से इस पर विचार कर रही है। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक वीके शुंगलू का सुझाव सरकार को मिल चुका है। जिसमें कैग को कई सदस्यीय बनाने की बात कही गयी है।
यद्यपि शुंगलू का कहना है कि कई सदस्यीय कैग के काम में पारदर्शिता आएगी। लेकिन उनका यह तर्क सरकार की नीति और नीयत पर पर्दा डालने वाला है। देश में जनसाधारण की ओर से या विपक्ष की ओर से ऐसी ना तो मांग है और ना ही शिकायत है, कि कैग के कार्य में पारदर्शिता नही है, इसलिए इसे कई सदस्यीय बनाया जाए। स्पष्ट है कि कैग की निष्पक्षता और सरकार की नीतियों से उसके संभावित विरोध को ठिकाने लगाने के लिए उसे कई सदस्य बनाए जाने पर विचर किया जा रहा है।
संवैधानिक संस्थाओं का और संस्थानों का कांग्रेस ने इससे पूर्व भी मनमाने ढंग से दोहन किया है। यह अलग बात है कि आजादी की भोर में इसी पार्टी के नेता पंडित नेहरू ने संवैधानिक संस्थाओं को पनपने दिया और बड़ा होने दिया। उस समय पीएम और इन संस्थानों में टकराव नही हुआ तो अब क्या बात हो चुकी है जो वर्चस्व की लड़ाई लड़ी जा रही है। जाहिर है कि कहीं पीएम और उनकी पार्टी कमजोर हुए हैं और उस कमजोरी पर पर्दा डालने के लिए कैग को पंगु बनाया जा रहा है। वैसे विपक्ष इस विषय पर कड़ा हो रहा है और जनता की भी भौहे तनी रही हैं।

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