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धर्म-अध्यात्म

किस वेद में स्त्रियों और शूद्रों के वेदाधिकार का निषेध है ?

हम बड़ी नम्रतापूर्वक इन धर्माचार्यों से पूछना चाहते हैं कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन चारों संहिताओं में कहीं एक भी मन्त्र या मन्त्रांश ऐसा दिखा दीजिए जो महिलाओं और शूद्रों के वेदाध्ययन का निषेध करता हो??

महिला या पुरुष नहीं अपितु मानवमात्र को वेदाध्ययन का अधिकार है। मध्यकाल में जब बहुत प्रकार के अनार्ष मिथ्या और साम्प्रदायिक मतवाद प्रचलित होने लगे तो कर्मकाण्ड के अनार्ष ग्रन्थों में ‘स्त्री शूद्रौ न वेदमधीयाताम ‘ और ‘स्त्री शूद्रद्विजबन्धूनाम् त्रयी न श्रुतिगोचरा’ जैसी उक्तियाँ और विधान प्रचलित हुये । यह भारतीय संस्कृति और वैदिक परम्परा का अन्धकारपूर्ण युग था । वेद मनुष्य मात्र के लिये है । वेद परमेश्वर की वाणी हैं । जैसे पृथ्वी, जल, वायु, सूर्य, आकाश परमेश्वर निर्मित है और मनुष्यमात्र के लिये है, उसी प्रकार वेद भी परमेश्वर की वाणी होने के कारण मनुष्यमात्र के लिये है।

प्रसिद्ध वेदोद्धारक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यजुर्वेद के २६वें अध्याय के दूसरे मन्त्र का प्रमाण देकर कहा –

“यथेमां वाचं कल्याणीमवदानि जनेभ्यः।
ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्रायचार्याय च स्वाय चारणाय॥”

अर्थात् – परमेश्वर उपदेश करते हैं कि जैसे मैं सब मनुष्यों के लिये इस कल्याणी वेदवाणी का उपदेश करता हूँ वैसे सब मनुष्य किया करें । इसमें प्रजनेभ्यः शब्द तो है ही वैश्य, शूद्र और अति शूद्र आदि की गणना भी आ गई है । यह बड़ा सुस्पष्ट प्रमाण है । वेद के विद्वानों ने स्वामी दयानन्द सरस्वती के इस अद्भुत प्रमाण का हृदय खोल कर देश और विदेश में स्वागत किया । उस अन्धकार युग में यह वेद का सूर्यवत् प्रकाश था।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध वेद विद्वान् श्री सत्यव्रत सामश्रमी ने अपने अति सम्मानित ग्रन्थ “ऐतरेयालोचन” में लिखा है कि स्वामी दयानन्द ने मनुष्य मात्र के वेदाधिकार में साक्षात् वेदमन्त्र का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया है ।

विश्व विख्यात विचारक और समालोचक रोमा रोलाँ ने स्वामी दयानन्द को यह कहकर श्रद्धांजलि दी है कि सचमुच वह दिन भारत के लिये एक नव युग के निर्माण का दिन था जब स्वामी दयानन्द ने एक ब्राह्मण संन्यासी होकर भी सैकड़ों वर्षों से ताला में बन्द वेदों को मनुष्य मात्र के पढ़ने के अधिकार का प्रतिपादन किया।

स्वामी दयानन्द जी ने तो आर्य समाज के नियमों में एक नियम ही बना दिया कि वेद का पढ़ना पढ़ाना परम धर्म है। आज के दिन दर्जनों कन्या गुरुकुलों में हजारों छात्रायें वेद पढ़ रही हैं और सैकड़ों वेद विद्या की गम्भीर विदुषियाँ, आचार्याएँ वेद पढ़ा रही हैं।

प्राचीन काल में वेद विदुषी महिलाएँ – ऋषि मन्त्रद्रष्टा होते हैं, ऋषिकायें भी मन्त्रद्रष्टा होती हैं । लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी इत्यादि कई इतिहास प्रसिद्ध ऋषिकायें हैं।सोलह ऋषिकाएँ ऋग्वेद में हैं।

संस्कारों में स्त्रियाँ मन्त्र पाठ करती थीं “इमं मन्त्रं पत्नी पठेत्” ऐसा कर्मकाण्ड के ग्रन्थों में निर्देश है अतः स्त्री का मन्त्रपाठ स्वतः सिद्ध है।

कन्याओं का उपनयन – कन्याओं का भी उपनयन होता था और आज भी बहुत सारे वैदिक परिवारों में कन्याओं का उपनयन होता है और स्त्रियाँ यज्ञोपवीत पहनती हैं । सन्ध्या, अग्निहोत्र करती हैं वेदपाठ भी करती हैं ।

निर्णय सिन्धु तृतीय परिच्छेद में लिखा है –

“पुराकल्पेतु नारीणा नौञ्जीबन्धनमिष्यते। अध्ययनंच वेदानां भिक्षाचर्यं तथैव च॥”
इसमें यज्ञोपवीत और वेदों का अध्ययन दोनों का विधान है।

हारीत संहिता में दो प्रकार की स्त्रियों का उल्लेख हैं –
(१) ब्रह्मवादिनी
(२) सद्योवधू ।

ब्रह्मवादिनी – तत्र ब्रह्मवादिनीनाम् उपनयनं अग्निबधनं वेदाध्ययनं स्वगृहे भिक्षा इति।

पराशर संहिता के अनुसार ब्रह्मवादिनी स्त्रियों का उपनयन होता है, वे अग्नि होत्र करती हैं, वेदाध्ययन करती हैं और अपने परिवार में भिक्षावृत्ति करती हैं।

सद्योबधू- ‘सद्योबधूनां तू उपस्थिते विवाहे कथंचित् उपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः।’ – सद्योवधू वे स्त्रियाँ हैं जिनका विवाह के समय उपनयन करके विवाह कर दिया जाता है। जैसा आजकल पुरुषों के विवाह में कई जगह होता है।

वेद में उपनीता स्त्री – ऋग्वेद के मण्डल १० सूक्त १०९ मन्त्र ४ में लिखा है – “भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता” यहाँ उपनीता जाया बहुत सुस्पष्ट है।

आचार्या और उपाध्याया वे स्त्रियाँ है, जो स्वयं पढ़ाती हैं नहीं तो आचार्य की स्त्री आचार्यानी और उपाध्याय की स्त्री उपाध्यायानी कहलाती हैं।

शंकर दिग्विजय में मण्डन मिश्र की पत्नी भारती देवी के विषय में लिखा है –
‘शास्त्रणि सर्वाणि षडवेदान् काव्यादिकान्वेत्ति यदत्र सर्वम्।’
इसमें भारती देवी के षडङ्गवेदाध्ययन की बात सुस्पष्ट है।

माता कौशल्या का अग्निहोत्र- अग्निहोत्र में वेदमन्त्र बोले जाते हैं और कौशल्या अग्निहोत्र करती थी बाल्मीकि रामायण में अयोध्या काण्ड अः २०-१५ श्लोक में द्रष्टव्य है –

साक्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा।
अग्नि जहोतिस्म तदा मन्त्रवत्कृतमज्जला।।
कौशल्या रेशमी वस्त्र पहने हुए व्रत पारायण होकर प्रसन्न मुद्रा में मन्त्र पूर्वक अग्निहोत्र कर रही थी। इसी प्रकार अयोध्या काण्ड आ० २५ श्लोक ४६ में कौशल्या के यथाविधि स्वतिवाचन का भी वर्णन है।

माता सीता की सन्ध्या – लंका में महाबली हनुमान माता सीता को खोजते हुए अशोक वाटिका में गये किन्तु उन्हें माता सीता न मिली । हनुमान ने वहाँ एक पवित्र जल वाली नदी को देखा । हनुमान जी को निश्चय था कि यदि माता सीता यहाँ होगी तो सन्ध्या का समय आ गया है और व यहाँ सन्ध्या करने के लिये अवश्य आयेंगी। सुन्दरकाण्ड अ० १४, श्लोक ४९ में लिखा है –

सन्ध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदींचेमांशुभजला सध्यार्थ वरवर्णिनी॥
अर्थात् वर वर्णिनी सीता इस शुभ जल वाली नदी पर सन्ध्या करने के निमित्ति अवश्य आयेंगी।

इस छोटे से प्रयास में हमने साक्षात् वेद वचन उद्धृत करके यह प्रमाण दे दिया है कि वेद मनुष्य मात्र के लिये हैं और ‘धर्मजिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः’ धर्म के लिये वेद परम प्रमाण हैं ।

किसी वेद संहिता में या वैदिक ऋषि कृत ग्रन्थ में स्त्रियों के वेद पढ़ने का निषेध नहीं है । वेदों की लोपामुद्रा, गार्गी, भारती आदि स्त्रियाँ विदुषी थीं और वेद पढ़ी थीं। आज भी वेद पढ़ती हैं ।
– प्रो० उमाकान्त उपाध्याय

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