भारतीय रेलवे और साम्यवादी लेखक

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साम्यवादी लोगों की एक विशेष पहचान होती है। ये लोग सदा देश के हित के विरुद्ध लेखन करते है। अब देखिये इस जमात ने अंग्रेजीशासन का गुणगान करते हुए यह लिख दिया कि अंग्रेजी शासन भारत पर उपकार के समान था। अंग्रेजों ने भारतीयों को रेल व्यवस्था दी, डाक व्यवस्था दी। अन्यथा भारतीय इतने गंवार थे जो आदिम युग में जीते रहते। इस लेख के माध्यम से साम्यवादियों के इस भ्रम का निराकरण करेंगे।

कुछ मूर्ख लोग कहते है कि अंग्रेज देश मे आये तो रेल लाये उससे भी बड़ी बात कि भारतीय पाठ्य पुस्तकों में इसे अंग्रेजो की एक उपलब्धियों में गिना जाता है ।

सबसे पहले आपको बताना चाहता हूँ कि भारतीय रेल भारत के इतिहास का सबसे बड़ा ब्रिटिश Scam था ।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेना के स्थानान्तरण और व्यापारिक सामानों के आवागमन के मद्देनज़र इसका निर्माण करवाया था ।

भारतीय रेल तो घोटाला ही था। जितना खर्च कनाडा-ऑस्ट्रेलिया में एक मील ट्रैक बनाने में आया उसका दोगुना भारत में लगा। ध्यान रहे कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भी ब्रिटिश शासन के अधीन थे ।

1843 में तत्कालीन गवर्नर जनरल हार्डिंग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था,

‘रेल हिंदुस्तान में ब्रिटिश व्यापार, सरकार और सेना और इस देश पर मज़बूत पकड़ के लिए सहायक होगी ।’

बाद में डलहौज़ी ने इसकी पैरवी करते हुए कहा था कि
इससे ब्रिटिश उत्पादों को पूरा हिंदुस्तान मिल जाएगा और खनिजों को बंदरगाह तक लाया जा सकेगा जहां से उन्हें इंग्लैंड भेजा जाएगा ।
तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड में निविदाएं जारी करके निवेशकों को इसकी तरफ आकर्षित किया था ।
लिहाज़ा, इसका निर्माण भी काफ़ी ऊंची कीमत पर हुआ ।
‘एन एरा ऑफ़ डार्कनेस’ में शशि थरूर लिखते हैं, ‘ज़्यादा ख़र्च करने पर ब्रिटिश कंपनियों को ज़्यादा मुनाफा होता ।

1850 से 1860 के बीच प्रति मील रेल की पटरी बिछाने की लागत तकरीबन 18 हज़ार पौंड थी । वहीं अमेरिका में यह आंकड़ा मात्र दो हज़ार पौंड था ।’

थरूर इसे तब का सबसे बड़ा घोटाला करार देते हैं । सारा मुनाफ़ा अंग्रेजों का और इसकी भरपाई भारतीय टैक्स देनदारों से हो रही थी।
चूंकि ग़ैर ब्रिटिश मानक स्टील इस्तेमाल में नहीं लिया जा सकता था, लिहाज़ा, पटरी से लेकर डिब्बों तक सब इंग्लैंड से मंगवाया गया ।

इतिहासकार विल दुरैंट भारतीय रेल का एक और आश्चर्यजनक पहलु खोलते हैं । उनके मुताबिक रेल का मकसद ब्रिटेन की सेना और उसके व्यापार को फ़ायदा पहुंचाना था, पर रेल को सबसे ज़्यादा आय अपने तीसरे दर्जे के डिब्बों में हिंदुस्तानियों के सफ़र करने से होती थी जिनमें आदमी भेड़-बकरियों की तरह ठूंस दिए जाते थे. उनके लिए कोई सहूलियतें नहीं दी जाती थीं ।
अंततः, रेलों के ज़रिये इंग्लैंड में बनाये गए सामानों की आवाजाही शुरू हो गयी ।
भारतीय कामगारों के उत्पाद इंग्लैंड के उत्पादों से टक्कर नहीं ले पाए और धीरे-धीरे घरेलु उद्योग बंद होने लग गए ।तब एक बांग्ला अखबार में छपे लेख में कहा गया था कि ये लोहे की पटरियां नहीं बल्कि ज़ंजीरें हैं जिन्होंने भारतीय उद्योगों के ठप्प कर दिए ।

दादा भाई नौरोजी ने भी अपनी किताब ‘पॉवर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में रेल से हिंदुस्तान को कम और अंग्रेजों को ज़्यादा फ़ायदा होने की बात कही है ।

महात्मा गांधी ने अपनी किताब ‘स्वराज’ में रेल को बंगाल में फैली प्लेग की महामारी के लिए ज़िम्मेदार माना था ।

बंगाल में जब रेल निर्माण किया गया तो गंगा और उसकी सहायक नदियों के पानी को जगह-जगह रोका गया ।

इससे खेती पर ज़बरदस्त असर पड़ा और अनाज की पैदावार कम हुई ।

1918 में बंगाल में आई बाढ़ का कहर रेल की वजह से कई गुना हो गया था ।

एक सच यह भी है कि जिन देशों में अंग्रेजो का राज्य नही था आज उन देशों में मैग्लेव और कैप्सूल रेल चलती है ।

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