दिल्ली की परिवहन प्रणाली में पोंटी चड्ढा की पहुंच

पोंटी चड्ढा के बारे में बहुत सारे लोग बहुत कुछ जानते होंगे लेकिन हाल में ही आपसी रंजिश का शिकार हुए शराब माफिया पोंटी चड्ढा के बारे में बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि दिल्ली की जन परिवहन सेवा में भी उसका बड़ा दखल हो गया था। पोन्टी चड्ढा ने दिल्ली के तीन बस क्लस्टरों को अपने नाम कर लिया था जिसके तहत वह छह सौ बसों का संचालन करने जा रहा था। उसकी मौत के बाद उन बसों का संचालन कौन करेगा यह तो पता नहीं लेकिन उसकी मौत से पहले ही सार्वजनिक बसों में यह निजी उपक्रम लडख़ड़ाने लगा था।

सार्वजनिक निजी साझेदारी (पीपीपी) मॉडल देश में लोकप्रियता हासिल कर रहा है। यहां महत्वपूर्ण है कि क्या हम अपेक्षाकृत गरीबों और मध्य वर्ग के लिए जरूरी सार्वजनिक ढांचा तैयार करने की अहमियत समझते हैं। दूसरे शब्दों में, हम निजी उद्यम के साथ कम लागत वाली सुविधाएं किस प्रकार मुहैया करा सकते हैं? उदाहरण के लिए बसों को ही लें। तमाम अन्य शहरों की तरह दिल्ली भी एक सुविधाजनक और कम लागत की परिवहन प्रणाली की आवश्यकता महसूस करती है। इसके बिना निजी वाहनों की वृद्धि दिल्ली की सड़कों को जाम से जकड़ लेगी और पहले से प्रदूषित यहां की आबोहवा और भी विषैली हो जाएगी। सवाल यह है कि इस प्रणाली का स्वरूप क्या होगा? भारत में सिटी बस परिवहन का संचालन मुख्यत: सार्वजनिक एजेंसियों के हाथों में है। मुंबई, बेंगलूर, कोलकाता, हैदराबाद और दिल्ली जैसे तमाम बड़े शहरों में सार्वजनिक परिवहन निगम यह महत्वपूर्ण सेवा उपलब्ध कराते हैं। किसी का काम दूसरे से थोड़ा अच्छा है और किसी का कुछ बुरा, किंतु इन तमाम एजेंसियों के बहीखाते खस्ताहाल हैं। परिचालन की ऊंची लागत और टिकट के कम दाम के कारण परिवहन निगम बदहाल हैं। बस के किराये को दुपहिया वाहनों की प्रति किलोमीटर परिचालन लागत से कम होना चाहिए, जो भारत में लगभग एक-दो रुपये प्रति किलोमीटर है। बस का किराया तभी बढ़ाया जा सकता है अगर स्थानापन्न विकल्पों के सामने तरह-तरह की बाधाएं खड़ी की जाएं।
उदाहरण के लिए निजी वाहनों के लिए पार्किग दरें बढ़ाने और अनधिकृत पार्किग पर भारी जुर्माना लगाने से लोग निजी वाहनों को त्याग कर सार्वजनिक परिवहन को अपनाने लगेंगे। छोटे शहर बसों के संचालन के लिए कम बजट रखते हैं और नई या आधुनिक बसों के ढांचे के लिए निवेश नहीं करते हैं। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए केंद्र की ओर से दिए जाने वाले अनुदान में भी संचालन का पूरा खर्च शामिल नहीं होता। केंद्र सिर्फ सड़कें और फ्लाईओवर बनाने में मदद करता है। नतीजतन, बसों में भीड़ बढ़ जाती है और उनकी सेवा का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जाता है। इस तरह सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दिल्ली की कुख्यात ब्लू लाइन सेवा की तरह सिर्फ गैर सरकारी अनौपचारिक बस सेवा रह जाती है। इस तरह सेवा के गिरते स्तर वाला पीपीपी मॉडल फलता-फूलता गया।
दूसरा विकल्प यह है कि असंगठित निजी बसों को कारपोरेट मॉडल में तब्दील कर दिया जाए, जिसमें चल रही बसों का ठेका सिर्फ एक ही संस्था के पास हो। दिल्ली ने कुछ साल पहले यही किया था। इसने शहर को कुछ समूहों में बांट दिया और तय किया कि हर इलाके में सिर्फ दो ही बस संचालक होंगे। एक दिल्ली परिवहन निगम और दूसरा निजी संचालक। इससे सेवा में प्रतिद्वंद्विता का माहौल बनेगा और उसमें सुधार आएगा। दिल्ली ने लोगों की सुविधा के लिए लो फ्लोर बसों में निवेश किया। इस तरह की तड़क-भड़क वाली बसों की महीने की किस्त 24 रुपये प्रति किलोमीटर है। यदि इससे थोड़ा सस्ता मॉडल लें तो यह किस्त इसकी आधी 12 रुपये प्रति किलोमीटर बैठती है।
इस आकलन का आधार यह है कि एक बस प्रतिदिन 200 किलोमीटर चलती है। इसके बाद बस सेवाओं को ईंधन, स्टाफ, रखरखाव, बीमा और टैक्स आदि का खर्च भी उठाना होता है। बेंगलूर सबसे प्रभावी संचालन कर रहा है, जहां संचालन खर्च 30 रुपये प्रति किलोमीटर है, जबकि मुंबई में यह खर्च करीब 60 रुपये प्रति किलोमीटर पड़ता है। इसमें इस पूरे ढांचे को खड़ा करने में होने वाला खर्च शामिल नहीं है। दिल्ली में संचालन का खर्च 28 रुपये प्रति किलोमीटर तय हुआ था। फिर प्रबंधन खर्च से इसमें 7-9 रुपये प्रति किलोमीटर बढ़ गए। इस पूरे खर्च में बस डिपो बनाने का खर्च शामिल नहीं है। भारत के आधुनिक और विकास की ओर अग्रसर शहरों के लिए मास्टर प्लान में भी इस जरूरी सुविधा को स्थान नहीं दिया जाता।
कुल मिलाकर दिल्ली में एक आधुनिक बस सेवा प्रदान करने का खर्च 50-60 रुपये प्रति किलोमीटर बैठ जाता है, इसमें से राज्य 10 रुपये प्रति किलोमीटर का ही खर्च उठाता है। इसका उद्देश्य टिकट की बिक्री से खर्च निकालना है। शहर सेवा के संचालन के लिए 37 रुपये प्रति किलोमीटर कमाता है और इसमें विज्ञापन से मिलने वाला राजस्व भी जोड़ा जा सकता है। किसी भी राजस्व वाले मॉडल में राजस्व घाटा भी होता है। यदि इसमें पूरी पूंजी को जोड़ दिया जाए तो खर्च आय से ज्यादा बैठता है, खास तौर पर सस्ते यातायात के विकल्प वाले बाजार में।
सेवा में जनहित सर्वोपरि होना चाहिए और वित्तीय प्रणाली में कुछ नयापन। पोंटी की कंपनी ने इसी मॉडल को अपनाया था, लेकिन सबकुछ ठीक नहीं रहा।
निजी संचालकों ने कम कमाई के साथ सेवा की मुश्किल परिस्थितियों में काम करने से किनारा करना बेहतर समझा। दिल्ली सरकार समझौते का उल्लंघन करने पर पोंटी के खिलाफ पहले ही पेनल्टी नोटिस जारी कर चुकी थी। शहर अब यहां से कहां जाने वाला है? जवाब जनता बेहतर तरीके से जानती है। सार्वजनिक परिवहन का कोई विकल्प नहीं है।

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