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भारतीय संस्कृति

अर्थशास्त्र: वित्तीय घाटे की दिशा देखिए

सरकार की मंशा है कि भ्रष्टाचार चलता रहे और विकास भी हो, जिससे सत्ता पर पुन: काबिज हुआ जा सके। यह रणनीति सफल हो सकती है, क्योंकि विपक्ष के पास फिलहाल कोई प्लान नहीं है। रिटेल में विदेशी निवेश खोलने एवं दूसरे आर्थिक सुधारों को गति देने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने भारत को ‘संदिग्ध’ श्रेणी में रखा हुआ है. इसका मुख्य कारण है कि सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ता जा रहा है। टू-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को 40,000 करोड़ की आमदनी की अपेक्षा थी, परंतु 10,000 करोड़ से कम राजस्व की प्राप्ति हुई। इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटने की आशंका बनती है। ज्ञात हो कि सरकार की आय कम और खर्च अधिक हो, तो इस अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है। इस घाटे की भरपाई के लिए सरकार नोट छापती है या ऋण लेकर अपना काम चलाती है। मध्यधारा अर्थशास्त्रियों की मान्यता है कि नोट छापने से महंगाई बढ़ती है, मुद्रा का अवमूल्यन होता है, सरकारी फिजूलखर्ची बढ़ती है, निजी निवेशकों का विश्वास घटता है और विकास बाधित होता है। निजी निवेश बढ़ाने के लिए जरूरी है कि सरकार अपने कुल खर्च को नियंत्रण में रखे, ताकि नोट न छापना पड़े और निवेशकों का विश्वास बना रहे। इसी दृष्टि से भाजपा सरकार ने वित्तीय जिम्मेवारी एवं बजट प्रबंधन कानून बनाया था, जिसके अंतर्गत सरकार को अपना वित्तीय घाटा कम करना है। लेकिन सरकारी खर्चे के दूसरे सकारात्मक प्रभाव भी पड़ते हैं।
सड़क के निर्माण से ढुलाई का खर्च कम होता है और माल शीघ्र ही पहुंच जाता है। इस खर्च के लिए राजस्व जुटाना जरूरी हो जाता है। सर्वश्रेष्ठ रहता है कि टैक्स के माध्यम से इस निवेश के लिए राजस्व जुटाया जाये, परंतु ऐसा संभव न हो तो नोट छापने का सहारा लिया जा सकता है।
इस प्रकार वित्तीय घाटे के दो पक्ष सामने आते हैं। वित्तीय घाटे के नियंत्रण से निजी निवेश में वृद्घि होती है और इससे भी अर्थव्यवस्था में गति आती है। मान लीजिए सरकार नोट छाप कर सड़क बनाती है। इससे निवेश में वृद्घि होती है। यह नोट छापने का सार्थक पक्ष है। दूसरी तरफ नोट छापने का दुष्प्रभाव भी पड़ता है। नोट छापने से निजी निवेशक का अर्थव्यवस्था पर भरोसा उठ जाता है और वह दुबक जाता है। वह सोना आदि खरीद कर बैंक लॉकर में रख देता है और उद्यम लगाने का जोखिम अपने सिर नहीं लेता है।
वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखने की पैरवी करनेवालों का कहना है कि ऐसा न हुआ तो नकारात्मक प्रभाव ज्यादा गहरा होगा और सरकारी निवेश में वृद्घि का सकारात्मक प्रभाव न्यून होगा। इसलिए वे वित्तीय घाटे पर नियंत्रण पर ज्यादा जोर देते हैं। इसके विपरीत सरकारी खर्चो की पैरवी करनेवालों के आकलन में सड़क बनाने का सकारात्मक प्रभाव ज्यादा होगा। इसलिए वे सरकारी योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने पर ज्यादा जोर देते हैं।
जाहिर है कि प्रश्न सरकारी खर्च के प्रभाव का है। सरकारी खर्च की क्वालिटी ऐसी होनी चाहिए कि वह निजी निवेश को बढ़ाये। तब यह विरोधाभास समाप्त हो जाता है। सरकार यदि नोट छाप कर सड़क बनाती है तो इससे निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है। परंतु यदि सरकार नोट छाप कर अपने कर्मचारियों को अधिक वेतन देती है, तो निजी निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अत: यदि सरकारी खर्च की क्वालिटी अच्छी है, तो नोट छापना अच्छा है। सही बात यह है कि सरकारी खर्च की क्वालिटी आंकने का वर्तमान मापदंड खरा नहीं उतर रहा है। साधारणत: सरकार द्वारा किये जा रहे पूंजीगत खर्चो को उत्तम एवं चालू खर्चो को निकृष्ट माना जाता है। परंतु इसमें समस्या है। कुछ प्रकार के चालू खर्च भी उत्तम होते हैं, जैसे पुरानी सड़क की मरम्मत। प्रचलित मानदंड के अनुसार यह चालू खर्च में गिना जायेगा और ‘निकृष्ट’ कहलायेगा। इस विसंगति के कारण अकसर देखा जाता है कि पुरानी सड़क एक करोड़ रुपये के अभाव में टूटी पड़ी रहती है, जबकि नयी सड़क बनाने के लिए सौ करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं। अथवा कानून व्यवस्था पर किये जानेवाले खर्च को लें। पश्चिम बंगाल में अस्सी एवं नब्बे के दशक में वामपंथी नेतृत्व में, बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व में एवं महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व में कानून व्यवस्था चरमरा गयी थी।
फलस्वरूप इन राज्यों से पूंजी का भारी पलायन हुआ। बिहार के घनाढ्य लोग दिल्ली में कोठियां खरीद रहे थे। बिहार के श्रमिक ही इन कोठियों को बना रहे थे। पूंजी भी बिहार की और श्रमिक भी बिहार का, परंतु बिहार में कानून व्यवस्था गड़बड़ होने के कारण इन दोनों का पटना में संयोग नहीं बन पा रहा था। अर्थात् कानून व्यवस्था पर किया जानेवाला चालू खर्च भी उत्पादक होता है। इसी प्रकार की समस्या रोजगार गारंटी पर किये जानेवाले खर्च में है। रोजगार गारंटी कार्यक्रम के अंतर्गत अकसर अनुत्पादक कार्य किये जाते हैं, जैसे सामूहिक भूमि पर वृक्षारोपण करना, जिसे पानी देने की कोई व्यवस्था नहीं की जाती है।
समझ आता है कि सरकारी खर्च की अच्छी और निकृष्ट क्वालिटी के निर्धारण में अस्पष्टता है, इसलिए वित्त मंत्री का सरकारी खर्च कम करने पर जोर देना उचित है। जब यह संदिग्ध हो कि बेटा ट्यूशन पढऩे जायेगा अथवा गुंडागर्दी करने, तो उसे घर में ही रखना अच्छा है। परंतु इस नीति से बात नहीं बनती, क्योंकि आवश्यक निवेश नहीं होता है। समाधान है कि सरकारी खर्चो की गुणवत्ता में सुधार किया जाये। नोट छाप कर सड़क बनाना लाभकारी है, लेकिन नोट छाप कर भ्रष्टाचार के माध्यम से रकम को स्विस बैंक भेजना हानिप्रद है। दुर्भाग्य है कि सरकार का ध्यान इस ओर नहीं है। बल्कि कैग द्वारा भ्रष्टाचार पर जो उंगली उठायी जा रही है, सरकार उसका पलटवार करने में लगी रहती है। सरकार की मंशा है कि भ्रष्टाचार चलता रहे और किसी तरह विकास भी हो, जिससे सत्ता पर पुन: काबिज हुआ जा सके। इसलिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है और सरकारी खर्चो की गुणवत्ता सुधारने की ओर कम। सरकार समझ रही है कि खुदरा बिक्री में विदेशी निवेश के माध्यम से निजी निवेश में वृद्घि होगी और अर्थव्यवस्था चल पड़ेगी। टू-जी स्पेक्ट्रम से मिली रकम के सहारे सरकारी राजस्व की लूट भी जारी रह सकेगी। अतिरिक्त राजस्व के एक हिस्से का उपयोग वोट खरीदने के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार सत्ता पर काबिज रहने, भ्रष्टाचार जारी रखने एवं आर्थिक विकास में गति लाने के सभी उद्देश्य पूरे हो सकते हैं। यूपीए सरकार की यह रणनीति सफल हो सकती है, क्योंकि विपक्ष के पास आम आदमी के लिए कोई प्लान नहीं है। यदि आम आदमी ने पेंशन, मध्याह्न् भोजन, बीपीएल को मिलनेवाले सस्ते अनाज आदि को ज्यादा महत्व दिया और भ्रष्टाचार को कम, तो यूपीए सरकार फिर सत्ता हासिल करने में सफल होगी।

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