लॉकडाउन – पेट के लिए बेबस मजदूर

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मुरली मनोहर श्रीवास्तव

मजदूर और उनके दर्द को समझ पाना हर किसी के वश की बात नहीं है। कोरोना वायरस के फैलने के बाद देश और दुनिया में मजदूरों के समक्ष भूखमरी की समस्या उत्पन्न हो गई है। अपनी मेहनत के बूते अपनों का पेट भरने वाला मजदूर आज खुद ही अपने पेट को पालने के लिए सरकार पर आश्रित है। इनके जीवन की नाव बीच मंझधार में फंस गई है। भले ही इनके लिए इंतजाम करने के दावे किए जाते हों मगर उन दरों दीवार की दहलीज के अंदर का पुरसाहाल किसे पता जहां एक रोटी में दो दिनों तक दिन गुजारनी पड़ रही है। मां का कलेजा उस वक्त दर्द से फट जाता है जब उसके मासूम को दूध तक नसीब नहीं हो पाता है। पर, करे भी तो क्या उसकी तकदीर में शायद यही लिखा है, इसे अपना नसीब मानकर जिंदगी के बचे दिन खुद को और अपने परिवार वालों को जिंदा रखने की जद्दोजहद में काट रहे हे। गए थे अपने परिवार के गुजर बसर के लिए परदेश कमाने मगर उन्हें क्या पता था कि चीन की गलती का खामियाजा उन्हें अपने देश में भूखमरी के साथ गुजारनी पड़ जाएगी। मगर ऐसा ही हुआ, सबकुछ बदल गया, देशवासियों को बचाने के लिए सरकार ने फैसला लिया लॉकडाउन का और देश का नजारा बदल गया। बंद हो गई फैक्ट्रियां, बंद हो गई दुकानें, बंद हो गई मजदूरी, फिर क्या दो-चार दिन तो किसी तरह कट गए मगर उसके बाद रोज कमाने खाने वालों के सामने बड़ी समस्या खाने की उत्पन्न हो गई। परदेश में अकेला पाकर अपने घर की तरफ कोई साधन नहीं मिला तो पैदल ही हजार किमी चल पड़े। कई राहों में जिंदगी को आखिरी सलाम कर गए तो बहुत बड़े पैमाने पर लोग अपने घऱ तक सही सलामत पैदल ही पहुंच गए। कल तक इन मजदूरों की कोई कीमत नहीं थी। लेकिन आज जब खेतों में अनाज सड़ने लगे, दुनिया का बोझ उठाने की जरुरत पड़ी तो इनकी अहमियत सभी को समझ आने लगी। जो पैसे के लिए हाय हाय किए रहते थे, वो आज खुद को भी हाशिए पर पा रहे हैं, कहते हैं कि जिंदगी रहेगी तभी तो यह पैसा काम आएगा। काश! वक्त रहते इसको समझ पाते लोग, लेकिन इसको कहां तक लोग समझ पाएंगे, कब समझ पाएंगे यह तो लॉकडाउन के खत्म होने के बाद जिंदगी के सलामती के बाद ही पता चल पाएगा। भारतीय शहरों में हमेशा से बाहरी मजदूर रहे हैं। मजदूर शहरों की कई जरूरतों को पूरा करने के लिए रहते हैं। शहरों के मध्य वर्ग के लिए ये घरेलू नौकर का भी काम करते हैं। मजदूर कितनी बुरी परिस्थितियों में प्रमुख शहरों में रहते हैं इसका हाल सभी जानते हैं मगर कोई इनके दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता। इनके उत्थान के लिए सरकारें वादा तो करती हैं मगर इन तक कितनी सुविधाएं पहुंचती हैं ये किसी से छूपी हुई नहीं है।
1 मई, 1886 को मजदूरों के सम्मान में एक दिन की छूट्टी का ऐलान हुआ, जिसे अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रुप में मनाया जाएगा। इसको अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस, श्रम दिवस या मई दिवस भी कहते हैं। इस दिवस को मनाने के पीछे उन मजदूर यूनियनों की हड़ताल है जो कि आठ घंटे से ज्यादा काम ना कराने के लिए की गई थी। मजदूर हमारे समाज का वह हिस्सा है जिसपर समस्त आर्थिक उन्नति टिकी हुई है। वर्तमान समय के मशीनी युग में भी उनकी महत्ता कम नहीं हुई है। श्रम बेचकर मजदूर अपना न्यूनतम मजदूरी कमाता है। इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ को बढ़ावा देने के लिये मजदूर दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने लगा। पारंपरिक तौर पर इसको यूरोप में गर्मी के अवकाश के रूप में घोषित किया गया था, इसीलिए पूरे विश्व में 1 मई को “अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस” मनाया जाता है। वैसे तो इसे दुनिया के 80 देशों में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। इस दिवस का मूल उद्देश्य “सामाजिक और आर्थिक प्रगति के लिए श्रमिकों को एकजुट करना” है। आठ घंटे के कार्यदिवस की जरुरत को बढ़ावा देने के अलावा मजदूरों और मालिकों के बीच संघर्ष को खत्म करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है। पहले मजदूरों के काम करने की स्थिति बहुत कष्टदायक और असुरक्षित थी। 10 से 16 घंटों तक काम करना पड़ता था। अमेरिकन संघ के द्वारा 1884 में श़िकागो के राष्ट्रीय सम्मेलन में मजदूरों के लिये काम के लिए वैधानिक समय के रूप में आठ घंटे निर्धारित किया गया। हलांकि भारत में 1 मई 1923 को श्रमिकों द्वारा “मद्रास दिवस” मनाया गया था। किसान मज़दूर पार्टी के नेता कामरेड “सिंगरावेलू चेट्यार” ने इसकी शुरूआत की थी और मद्रास हाईकोर्ट सामने इस दिन को पूरे भारत में “मजदूर दिवस” के रूप में मनाने का संकल्प लिया और छुट्टी का ऐलान किया था। कोरोना संक्रमण से जंग जीतने के बाद लॉकडाउन खुलेगा। उसके बाद की दुनिया बदलेगी, लोगों का जीवन फिर से पटरी पर लौटेगी। इस विषम परिस्थिति में सभी अपने तरीके से दर्द बांटने की कोशिश कर रहे हैं। मगर सोचने और विचारने का विषय यह है कि क्या इस भयावह दौर के गुजर जाने के बाद मजदूरों की जिंदगी बदलेगी ? क्या इनकी उम्मीदों पर दुनिया खरी उतरेगी ? या फिर इनके जीवन में मजदूरी का वही दर्द पिरोया हुआ मिलेगा। यह तो वक्त गुजरने के साथ खुद ही पता चल जाएगा।

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